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A tribute to Veteran Singer Lata Mangeshkar

from some of our Friends

अभी कल ही की तो बात है जब WOW India और साहित्य मुग्धा दर्पण द्वारा आयोजित वसन्तोत्सव में WOW India की अध्यक्ष डॉ लक्ष्मी ने लता जी का फिल्म “स्वप्न सुन्दरी” के लिया गाया कोयल के जैसा मधुर गीत “कुहू कुहू बोले कोयलिया” गाकर सुनाया था और हम सबने उनके शीघ्र स्वास्थ्य लाभ के लिए ईश्वर से प्रार्थना की थी… लेकिन ऐसा सम्भव न हो सका और लगभग एक महीने का जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष – और अन्त में विजय मृत्यु की हुई – जीवन हार गया – आज सुबह ही समाचार मिला कि लगभग एक महीने तक स्वास्थ्य लाभ के लिए संघर्ष कर रही स्वर कोकिला भारत रत्न लता मंगेशकर जी परम धाम को प्रस्थान कर गई हैं… वास्तव में सभी की आँखें नम हैं इस समाचार से… ऐसा लगता है जैसे भारत की आवाज़ ही कहीं गुम हो गई है… आजीवन स्वर की साधना में लीन रही लता मंगेशकर जी का निधन वास्तव में देश की कला और संस्कृति के लिए एक अपूरणीय क्षति है… किन्तु ये भी सत्य है कि ऐसी महान आत्माएँ कभी मरती नहीं… लता जी अपने स्वरों के माध्यम से सदा जीवित रहेंगी… नाम गुम जाएगा, चेहरा ये बदल जाएगा, मेरी आवाज़ ही पहचान है… ऐसे ही कला के साधकों के लिए लिखा गया है… वास्तव में समझ नहीं आ रहा कि माँ सरस्वती के प्रादुर्भाव के दूसरे दिन ही वाग्देवी की वरद पुत्री लता मंगेशकर जी के पार्थिव का पञ्चतत्व में विलीन हो जाना मात्र एक संयोग कहें या क्या कहें…? अश्रुपूरित नेत्रों से विदा देते हुए हमारे कुछ साथियों ने श्रद्धा सुमन समर्पित किये हैं दिवंगत आत्मा के प्रति…

सरस्वती विसर्जन वाले दिन ही आज की सरस्वती का निधन एक संयोग मात्र है या कोई ईश्वरीय तय घटना..🙏… सरिता रस्तोगी

 

Veteran Lata ji passed away on such an auspicious day of maà Saraswati s visarjan… RIP🙏🏻🙏🏻How symbolic… she was maà Saraswati ji herself…. सुनन्दा श्रीवास्तव

 

थम गई गीत की सुर सरिता

लय टूट गई, गति हुई मन्द

छन्दों  का मान करें अब क्या

हो गया बन्द हर पद्यबन्ध

माँ वाणी की वीणा निस्तब्ध

सूनी है गोद भारती की

कोकिला सदा के लिए सुप्त

कैसी आई ये ऋतु वसन्त

पर सदा प्रवाहित वह धारा

निःसृत जो कण्ठ से थी उसके

और सदा करेगा मान जगत

उस सरगम को जो हुई रुद्ध

माँ वाणी की मानस पुत्री कोकिलकण्ठी स्वर साम्राज्ञी भारत रत्न लता मंगेशकर जी को अश्रुपूर्ण भावभीनी श्रद्धांजलि…. डॉ पूर्णिमा शर्मा

 

माँ सरस्वती का पूजन कल, आज लता जी कर गई विकल।

स्वर कोकिला भी गईं निकल, श्रद्धा में नत हो खड़े सकल।

आँख में नीर भी भर लेना, वतन के लोगों ठहर लेना।

सुर साम्राज्ञी थी भर लेना, याद को उनकी लहर देना।

भारत रत्न वही पुरस्कार, शोभा उनसे मिलती अपार।

वो भी उनको रहता निहार, स्वर, गीत, ताल का कर विचार।

श्रद्धा से अर्पण करे फूल, सुर सागर की बनी मस्तूल।

संगीत के वन की शार्दूल, वो अमर गीत दे बनीं धूल।

करबद्ध हुए, दिल आहत है, शान्त ईश्वर करे, चाहत है।

दुख है पर नहीं मसाहत है, वो गीत बचे ये राहत है।

आँखों से बहा हर काजल है, सुर पर अब छाया बादल है।

शेखर दुख ये दावानल है, ये अश्रुपूर्ण श्रद्धा जल है।

डॉ हिमांशु शेखर, पुणे

 

लता ताई संगीत की पहचान थी

वह तो वाणी वीणा की प्राण थी

पीढ़ी दर पीढ़ी का मधुर गान थी

हर ह्रदय बसी स्वर लहरी तान थी

उनकी आवाज देश की पहचान थी

भोर की पहली किरण जिस स्वर से हमे जागती थी

दोपहर की धूप जिनकी तान से शीतलता बांट जाती थी

जिसके सतरंगी गीतों से सज के सांझ उतर आती थी

जिनकी मीठी लोरियों से अखियों में नींद पसर जाती थी

थकी देह जिनके गीतों को सुनके सुकून से सुस्ताती थी

थम गई मधुर आवाज जो हर मन उमंग जगाती थी

सर्द रातों में जिनके गीतों से गरमाहट सी आ जाती थी

रिमझिम बारिश को जो आवाज ख़ुशगवार बना जाती थी

वो प्यार का तराना वो माँ की लोरी के गीतों की थाती थी

वो देश को समर्पित वो भाई बहन के रिश्तों को जगाती थी

अर्चना आरती वो संदेशो के गीतों से मन मे उतर जाती थी

जिनकी स्वर लहरी बुझते रिश्तों मे भी उम्र बढ़ाती थी

जिनके गीत उम्र के आखरी पड़ाव को जवां बना जाती थी

थम गई वह आवाज जो हर उम्र उमंग जगाती थी

नीरज सक्सेना, ग़ाज़ियाबाद

 

शारदा विसर्जन का दिन है

संग चली गईं, सुर साम्राज्ञी,

चिन्मयी कोकिला कंठ दिव्य

मृणमयी माते की अनुरागी।

तुम कितना भी दूर रहो,

दीदी! न तुम्हें हम भूलेंगे

जब भी गूंजेंगे तुम्हारे स्वर

हम नमन तुम्हें कर छू लेंगे।

🙏भावभीनी श्रद्धांजलि🙏

पी एन मिश्रा, कोलकाता

 

अपूर्णीय क्षति, हमारे देश की कोकिला कंठी का जाना हृदय शोक से भर गया। अत्यंत दुखद ,उनकी कमी कोई नहीं पूरी कर पाएगा , परन्तु उनकी आवाज अजर,अमर रहेगी। ईश्वर उनकी आत्मा को श्री चरणों में स्थान दें।🙏

ॐ शांति 🙏नूतन शर्मा, दिल्ली

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Padmashree Harekala Hajabba

Gunjan Khandelwal
Gunjan Khandelwal

पद्मश्री हरेकला हजब्बा: अक्षरसंथ

इतिहास के पन्नों में न खो जाएँ – गुँजन खण्डेलवाल

सूती लुंगी व साधारण सी कमीज़ पहने, गले में गमछा डाले हजब्बा जब अपनी चप्पल उतारकर राष्ट्रपति कोविंद जी से अवॉर्ड लेने पहुंचे तो दर्शकों को कौतूहल और विस्मय हुआ | “सामने राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और कई बड़े बड़े लोग बैठे थे, मैं भला उनके सामने चप्पल कैसे पहन सकता हूं”, ऐसा विनम्रता की प्रतिमूर्ति हजब्बा का कहना था |

कर्नाटक के मंगलुरू के समीप न्यूपाडपु गांव के हजब्बा प्रतिदिन उधारी से संतरे लेकर बस डिपो पर बेचा करते थे | करीब 30 वर्ष पहले की एक छोटी सी घटना ने उनके मन पर गहरा प्रभाव डाला | एक विदेशी ने उनसे अंग्रेज़ी में संतरे का दाम पूछा, वे समझ नही पाए और चुप रह गए | अपने पढ़े लिखे नहीं होने की शर्मिंदगी को उन्होंने एक पॉजिटिव मिशन के रूप में लिया और अपने विद्यालय रहित गांव में स्कूल बनाने की ठान ली ताकि वे वहां के निर्धन बच्चों को शिक्षित कर सकें | अपनी स्वयं की बहुत मामूली बचत और अन्यों से सहयोग लेकर उन्होंने ये स्वप्न साकार किया | एक मस्जिद में छोटे बच्चो का पहला स्कूल बना जो आज बढ़ते बढ़ते बड़ा विद्यालय बन गया है |

Selling Oranges on the Street Harekala Hajabba
Selling Oranges on the Street Harekala Hajabba

हजब्बा के इस बिग ड्रीम को साकार करने में लोगों का बहुत सहयोग रहा | कृतज्ञता स्वरूप उनकी नाम पट्टिका स्कूल में लगवाई गई है | उन्हें अपने इस मिशन से संबंधित प्रत्येक घटना व व्यक्ति आज भी याद है | उनका एक कक्ष देश विदेश से प्राप्त अवार्डों से सज्जित है पर प्राप्त धनराशि वे स्कूल की ही मानते हैं |

शिक्षा का धर्म अन्य धर्मों से बड़ा है, संभवतः इसी लिए हर जाति के लोगों से उन्हें मदद मिली |

अल्जाइमर से ग्रस्त बीमार पत्नी, दो विवाह योग्य बेटियों और ‘पेड लेबरर’ बेटे के पिता हजब्बा प्रति दिन ये सब भूल कर स्वयं स्कूल के कक्ष खोलते हैं और भीतर जाने के पूर्व चप्पल उतरना नहीं भूलते और फिर निकल जाते हैं आज भी संतरे बेचने के काम पर, आंखों में अपने विद्यालय को कॉलेज बनता देखने का स्वप्न लिए जो कल साकार होगा |

स्वयं अशिक्षित होने पर भी, अन्यों को शिक्षित करने का हज्जबा का जज़्बा और विश्वास समाज सेवा के रूप में मिसाल बन गया है | इसी निश्चय और प्रयत्नों ने लोगों को उन्हें मदद देने को प्रेरित किया है |

“मैं तो अकेले ही चला था जानिब – ए मंज़िल मगर लोग साथ आते गए और कारवां बनता गया” | जय हिंद… गुँजन खण्डेलवाल

bookmark_borderHumour – Backbiting

Humour – Backbiting

आओ ज़रा सा हँस भी लें

Rekha Asthana
Rekha Asthana

हास्य रस – निंदा रस – रेखा अस्थाना 

जी हाँ निंदा रस… बहुत परिश्रम से किसी किसी के पास ही होता है, पर सौभाग्य  स्त्री को इसका मिलता है | पुरुष क्या जाने इसका स्वाद ? स्त्रियाँ जब इस रस की वार्ता में व्यस्त  हो जाती हैं उनका हृदय आनंद से सराबोर हो जाता है | अपना ध्यान सारा का सारा बोझिल कर्तव्यों से हटाकर बस निंदा रस के आनंद में मगन हो श्वेत पंख सी हल्की हो आकाश में विचरण करने लगती हैं | अंतर की सारी बेकार की बातें निकाल फेंकती हैं | चाहे वह सास, नन्द या पड़ोसी जो भी हो जिसको स्त्रियाँ पसन्द नहीं करती बस अपनी सखी से उसकी निंदा करना शुरू देती हैं | सच मानिए, तब उनका चेहरा कमल की तरह खिल उठता है 😊

अरे जनाब आप पुरुषों में ये गुण कहाँ जो हम स्त्रियों में है |

अब बोलो हमें इसी कारण हार्ट अटैक की संभावना भी कम होती है | जब हमारे पास निंदा रस है तो हम क्यों सेवन करें बीटरूट जूस, एलोवेरा जूस 😊

हम तो बस एक दो  टे टहलते हुए या जैसा भी माहौल हो जी भर के निंदा रस में मशगूल हो उसका सेवन करने और कराने में लग जाते हैं और बिल्कुल तरोताजा हो घर पर आराम से काम करते हैं | खर्राटे मार कर सोते हैं | अरे ये तो ईश्वर के द्वारा दिया हुआ गुण है हमें, तो क्यों न इसका उपयोग कर स्वस्थ रहें हम 😊

और ये सब तो नीतिपरक स्लोगन पुरुष ही अपने ऊपर लागू करें | ठीक कहा न हमने 😊

जय राम जी की… रेखा अस्थाना…

bookmark_borderMrs. Tulsi Gowda Padma Shri

Mrs. Tulsi Gowda Padma Shri

इतिहास के पन्नों में न खो जाएँ – गुँजन खण्डेलवाल

वैतूल निवासी गुँजन खण्डेलवाल जी WOW India की ऐसी सदस्य हैं जो वैतूल में रहते हुए भी संस्था से जुडी हुई हैं और संस्था के Online कार्यक्रमों में नियमित रूप से

Gunjan Khandelwal
Gunjan Khandelwal

भाग लेती रहती है… English Scholar और अंग्रेज़ी की ही प्रोफ़ेसर होने के साथ ही हिन्दी भाषा में गहरी रूचि रखती हैं और हिन्दी भाषा की बहुत अच्छी और प्रभावशाली कवयित्री होने के साथ ही एक सुलझी हुई लेखिका भी हैं… बहुत से सम सामयिक विषयों पर अपनी सुलझी हुई राय रखती हैं… कुछ ऐसे व्यक्तित्वों के विषय में इन्होंने लिखना आरम्भ किया है जो जन मानस पर गहरी छाप छोड़ जाते हैं… इससे पहले की ये कहीं इतिहास के पन्नों में गुम हो जाएँ… ताकि हम और आप इनसे कुछ प्रेरणा प्राप्त कर सकें… इनसे कुछ सीख सकें… प्रस्तुत है इनकी ये रचना… यद्यपि इस महान व्यक्तित्व के विषय में आज बहुत लोग परिचित हैं, किन्तु आज हम इसके विषय में गुँजन जी की दृष्टि से देखने का प्रयास करेंगे… डॉ पूर्णिमा शर्मा…

क्यों भई तुम्हारी कलम को भी कोरोना हो गया था क्या ? कब तक ‘क्वारनटाइन’ रहेगी ?”

बात उपहास में पूछी गई, पर लगा शायद पिछले दहशत भरे वक्त का ‘कोरोना इफेक्ट’ तन मन और सभी एक्टिविटीज को कहीं न कहीं प्रभावित तो कर ही गया है | इस बार दीपावली कुछ कुछ उत्साह भरी रही की अपनों से मिलना जुलना हुआ, पर कितने घरों की शोक की पहली दीपावली मन को व्यथित कर गई | खैर…

जीवन तो आगे बढ़ता ही है | ऐसे में सन 2021 के पद्म पुरस्कारों की सूची के कुछ नाम और परिचय बहुत प्रेरक लगे | साथ ही इन पुरस्कारों की ‘क्रेडिबिलिटी’ को बढ़ा गए | महिलाएँ जहाँ कहीं की भी हों, जो भी हासिल करती हैं वो उनके लिए सदा से धारा के विपरीत तैरने जैसा होता है | ये बहुत कंट्रोवर्शियल हो सकता है पर…

Mrs. Tulsi Gowda
Mrs. Tulsi Gowda

जाने भी दीजिए ना ! पर इस समय जिस सम्मान और तालियों की गड़गड़ाहट के बीच जंगल की पगडंडियों से चल कर राष्ट्रपति भवन के ‘रेड कार्पेट’ तक नंगे पांव जिन्होंने ये सफ़र तय किया है वे हैं श्रीमती तुलसी गौड़ा जी | कर्नाटक में हलक्की जनजाति से संबंध रखने वाली तुलसी गौड़ा जी होनाली गांव के बेहद ही गरीब परिवार की हैं | यहां तक की वो कभी विद्यालय भी नहीं जा सकीं | प्रकृति के प्रति अधिक लगाव होने के कारण उनका अधिक समय जंगल में ही बीता और उनका पौधों और जड़ी बूटियों का ज्ञान विस्तृत होता गया | आज 77 वर्ष की आयु में वो ‘इनसाइक्लोपीडिया ऑफ फॉरेस्ट’ के रूप में विख्यात हैं | पिछले 60 वर्षों में उन्होंने तीस हजार से अधिक वृक्ष लगाए हैं | उनके प्रयासों को पहले भी इंदिरा प्रियदर्शिनी वृक्ष मित्र अवॉर्ड, राज्योत्सव अवॉर्ड और कविता मेमोरियल जैसे अवार्डो द्वारा सराहना मिल चुकी है | वे वन विभाग में कार्यरत हैं जहां वे लगातार पौधों के बीज एकत्र करती रहती हैं, गर्मी तक उनका रखरखाव करते हुए उपयुक्त समय पर जंगल में बो देती हैं |

अपने पारंपरिक सूती आदिवासी वस्त्र में राष्ट्रपति कोविद जी से पुरस्कार ग्रहण करने वाली तुलसी गौड़ा जी अपनी सादगी और पर्यावरण मित्र के रूप में नई पीढ़ी से उत्साह पूर्वक अपना ज्ञान और अनुभव बांटती है | आशा है उनके द्वारा रोपित ये बीज आगे भी अंकुरित व पल्लवित होते रहेंगे | जय हिंद |

bookmark_borderWriters Building Kolkata

Writers Building Kolkata

Sunanda Shrivastava
Sunanda Shrivastava

Writer’s Building, Kolkata

Going Back to the History with Sunanda Shrivastava

Built in 1777, the Writer’s Building was meant to accommodate junior servants, or ‘writers’ as they were called, of the East India Company. When it was leased to the company in 1780 for this purpose, it was described as looking like a ‘shabby hospital, or poor-house ‘. After several structural changes over the next couple of decades, Fort William College set up camp there, training writers in languages such as Hindi and Persian, until around 1830. In the years that succeeded, the dwelling was used by private individuals and officials of the British Raj as living quarters and for shopping.

Writer's Building, Kolkata
Writer’s Building, Kolkata

Extensive remodelling and renovations have occurred most of the times the building was switched between hands. Today, there are 13 blocks; six of which were added after India won independence from British rule. The 150-metre-long structure has a distinct Greco-Roman style, with several statues of Greek gods as well as a sculpture of Roman goddess Minerva commanding attention from the pediment.

Among the many notable events that occurred during the building’s lifetime, the most memorable one perhaps was the assassination of Lt Col NS Simpson, the infamous Inspector General of Prisons. Three Bengali revolutionaries – Benoy Basu, Badal Gupta and Dinesh Gupta – disguised themselves as Westerners to get inside the Writers’ Building and shot the colonel, who was notorious for his brutal oppression of Indian prisoners. It is from the names of these freedom fighters that BBD Bagh – the central business district of Kolkata (and the location of Writers’ Building) – gets its name.

Sunanda Shrivastava

bookmark_borderपिपरहवा इतिहास के पन्नों से

पिपरहवा इतिहास के पन्नों से

इतिहास के पन्नों से – सुनन्दा श्रीवास्तव

बात तीस साल पहले की है | 1988 में बस्ती जिले के उत्तरी भाग को अलग कर उत्तर प्रदेश में सिद्धार्थ नगर जिले की स्थापना हुई थी | इसका कारण यह था कि पुरातत्व

उत्खनित बौद्ध स्तूप पिपरहवा
उत्खनित बौद्ध स्तूप पिपरहवा

विभाग ने वास्तविक कपिलवस्तु की पुरातात्विक पहचान कर ली थी और कपिलवस्तु गौतम बुद्ध उर्फ सिद्धार्थ की नगरी थी | इसलिए जिले का सिद्धार्थ नगर नाम इतिहास के प्रामाणिक तथ्यों पर आधारित है |

आज सिद्धार्थ नगर जिले में जो पिपरहवा है, वही सिद्धार्थ की नगरी कपिलवस्तु है | पिपरहवा की पहली जानकारी एक ब्रिटिश इंजीनियर तथा पिपरहवा क्षेत्र के जमींदार डब्ल्यू. सी. पेपे को मिली थी और वो जमीन पेपे के पास थी |

वो जनवरी का महीना था और 1898 का साल था, जब पिपरहवा में विशाल स्तूप की खोज हुई थी | स्तूप से एक पत्थर का कलश मिला | कलश पर ब्राह्मी में अभिलेख था, जिस पर लिखा था – सलिलनिधने बुधस्भगवते अर्थात अस्थि – पात्र भगवत बुध का है | 19 जनवरी, 1898 को डब्ल्यू. सी. पेपे ने नोट बनाकर इस अभिलेख को समझने के लिए वी. ए. स्मिथ को भेजा था | पहली तस्वीर पिपरहवा के विशाल स्तूप की है और दूसरी तस्वीर में वो अभिलेखित कलश है |

दिन, महीने, साल बीते | बात 1970 के दशक की है | पुरातत्व विभाग ने पिपरहवा की क्रमबद्ध खुदाई कराई | फिर तो विशाल स्तूप के अगल – बगल चारों ओर पूरब, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण में अनेक संघाराम मिले | पूर्वी संघाराम, पश्चिमी संघाराम, उत्तरी संघाराम, दक्षिणी संघाराम इसे तस्वीरों में आप देख सकते हैं | पूरा पिपरहवा संघारामों से पटा हुआ था | यह कपिलवस्तु का धार्मिक – शैक्षणिक क्षेत्र था |

अभिलेखित धातु मंजूषा
अभिलेखित धातु मंजूषा

यह कपिलवस्तु है और वास्तविक कपिलवस्तु है | इसका पुरातात्विक प्रमाण भी मिल गया | खुदाई में मिली मिट्टी की मुहरों पर लिखा है कि कपिलवस्तु का विहार यही है | आप उन मिट्टी की मुहरों को तस्वीर में देख सकते हैं | कहीं कपिलवस्तु और कहीं महा कपिलवस्तु लिखा है |

आप देख रहे हैं कि पिपरहवा का क्षेत्र विहारों, स्तूपों से भरा है तो फिर कपिलवस्तु के लोग कहाँ रहते थे? बस पिपरहवा से कोई 1 कि. मी. की दूरी पर गनवरिया है | यह कपिलवस्तु का रिहायशी क्षेत्र था | यहीं गणराज्य के लोग रहते थे | आखिरी तस्वीर उसी गनवरिया की आवासीय संरचना की है |

पिपरहवा जो कपिलवस्तु का धार्मिक क्षेत्र था, बोधिवृक्ष पीपल नाम को सार्थक करता है और गनवरिया जो कपिलवस्तु का रिहायशी क्षेत्र था, गण नाम को सार्थक करता है | यह पूरबी बोली के नाम हैं, जिसमें ” ल ” का उच्चारण ” र ” और ” ण ” का उच्चारण ” न ” होता है | इसीलिए पीपल / पीपर से पिपरहवा/ पिपरिया संबंधित है और ( शाक्य ) गण / गन से गनवरिया संबंधित है |

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Tomb of Bahadur Shah Zafar

Sunanda Srivastava
Sunanda Srivastava

Back to the History with Sunanda Srivastava

 

On this day in the year 1862, last Mughal King Bahadur Shah ‘Zafar’ died in exile in Rangoon. Ghalib, who had been his ustad, received the news much later, only through the newspapers. He wrote a simple epitaph in a letter dated 16 December 1862, to his friend Mir Mahdi ‘Majruh’: 

“7 November 14 jamadi ul awwal, saal e haal, jumme ke din, Abu Zafar Sirajuddin Bahadur Shah qaid e firang o qaid e jism se riha hue”.

 ‘On Friday, the 7th of November, Abu Zafar Sirajuddin Bahadur Shah was freed of the bonds of the British and the bonds of the flesh’

In a bid to ensure that Bahadur Shah Zafar’s resting place would not become a site of pilgrimage for both Hindus and Muslims, that would

Bahadur Shah Zafar
Bahadur Shah Zafar

potentially incite another freedom struggle in the memory of the Emperor, the British hastily buried the deceased Emperor in a secret location.

However, by chance, in the year 1991, the burial site of the last Emperor was discovered, leading to the construction of a tomb to honour the last Emperor of Hindustan.

Today, the resting site of Bahadur Shah Zafar is maintained as a Sufi dargah, with locals visiting the tomb on a daily basis as Bahadur Shah Zafar was recognised as a Sufi Pir during his reign as Emperor of Hindustan.

Post text Credit: Mughal Imperial Archives – by Sunanda Shrivastava

bookmark_borderAbout award function

Dear all,

This is to inform you that we at WOW India, only held our annual award function in the name of Mr. A P J Abdul Kalam and we do not charge any single penny as the entry fees from the awardees.

Regards:

Dr. Sharda Jain, Chairperson WOW India

Dr. S Lakshmi Devi, President WOW India

Dr. Purnima Sharma, Secretary General WOW India

bookmark_borderHappy Buddha Purnima

Happy Buddha Purnima

Katyayani Dr. Purnima Sharma
Katyayani Dr. Purnima Sharma

बुद्ध पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएँ 

“स्त्री तब तक “चरित्रहीन” नहीं हो सकती, जब तक पुरुष “चरित्रहीन” न हो | आज हम जो कुछ भी हैं वो हमारी आज तक की सोच का परिणाम है | इसलिए अपनी सोच ऐसी बनानी चाहिए ताकि क्रोध न आए | क्योंकि हमें अपने क्रोध के लिए दण्ड नहीं मिलता, अपितु क्रोध के कारण दण्ड मिलता है | क्रोध एक ऐसा जलता हुआ कोयला है जो दूसरों पर फेंकेंगे तो पहले हमारा हाथ ही जलाएगा | यही कारण है कि हम कितने भी युद्धों में विजय प्राप्त कर लें, जब तक हम स्वयं को वश में नहीं कर सकते तब तक हम विजयी नहीं कहला सकते | इसलिए सर्वप्रथम तो अपने शब्दों पर ध्यान देना चाहिए | भले ही कम बोलें, लेकिन ऐसी वाणी बोलें जिससे प्रेम और शान्ति का सुगन्धित समीर प्रवाहित हो | हम कितनी भी आध्यात्म की बातें पढ़ लें या उन पर चर्चा कर लें, कितने भी मन्त्रों का जाप कर लें, लेकिन जब तक हम उनमें निहित गूढ़ भावनाओं को अपने जीवन का अंग नहीं बनाएँगे तब तक सब व्यर्थ है | इस सबके साथ ही हमें अपने अतीत के स्मरण और भविष्य की चिन्ताओं को भुलाकर अपना वर्तमान सुखद बनाने का प्रयास करना चाहिए | क्योंकि संसार दुखों का घर है, दुख का कारण वासनाएँ हैं, वासनाओं को मारने से दुख दूर होते हैं, वासनाओं को मारने के लिए मानव को अष्टमार्ग अपनाना चाहिये, अष्टमार्ग अर्थात – शुद्ध ज्ञान, शुद्ध संकल्प, शुद्ध वार्तालाप, शुद्ध कर्म, शुद्ध आचरण, शुद्ध प्रयत्न, शुद्ध स्मृति और शुद्ध समाधि”…

इस प्रकार की जीवनोपयोगी और व्यावहारिक शिक्षाएँ देने वाले भगवान बुद्ध का आज वैशाख पूर्णिमा को जन्मदिवस (जो सिद्धार्थ गौतम के रूप में था) भी है, बुद्धत्व प्राप्ति (जिस दिन दीर्घ तपश्चर्या के बाद सिद्धार्थ गौतम बुद्ध बने) का दिन भी है और महानिर्वाण (मोक्ष) दिवस भी है | यों कल प्रातः सूर्योदय के बाद 6:38 पर पूर्णिमा तिथि का आगमन हो चुका है, इसलिए उपवास की पूर्णिमा कल थी, किन्तु उदया तिथि होने के कारण बुद्ध पूर्णिमा का पर्व आज मनाया जा रहा है | सर्वप्रथम बुद्ध पूर्णिमा की सभी को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ | बुद्ध न केवल बौद्ध सम्प्रदाय के ही प्रवर्तक हैं अपितु भगवान विष्णु के नवम अवतार के रूप में भी भगवान बुद्ध की पूजा अर्चना की जाती है |

अब हम बुद्ध के उपरोक्त कथन पर बात करते हैं | व्यक्ति के आत्मिक, सामाजिक और आध्यात्मिक विकास के लिए बुद्ध ने शुद्ध ज्ञान, शुद्ध संकल्प, शुद्ध वार्तालाप, शुद्ध कर्म, शुद्ध आचरण, शुद्ध प्रयत्न, शुद्ध स्मृति और शुद्ध समाधि के अष्टमार्ग के साथ साथ पाँच बातें और कही हैं कि मनसा वाचा कर्मणा अहिंसा का पालन करना चाहिए, जब तक कोई अपनी वस्तु प्रेम और सम्मान के साथ हमें न दे तब तक उससे पूछे बिना वह वस्तु नहीं लेनी चाहिए, किसी भी प्रकार के दुराचार अथवा व्यभिचार से बचना चाहिए, असत्य सम्भाषण नहीं करना चाहिए और मादक पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए |

इन उपदेशों के पीछे भावना यही थी कि व्यक्ति को एक ऐसा मार्ग दिखा सकें जिस पर चलकर वह सांसारिक कर्तव्य करते हुए आत्मोत्थान के मार्ग पर अग्रसर होकर मोक्ष अर्थात पूर्ण ज्ञान की स्थिति को प्राप्त हो जाए | व्यक्ति को स्वयं ही उसके देश-काल-परिस्थिति का पूर्ण सत्यता और ईमानदारी से आकलन करके यह निश्चित करना होगा कि क्या उसके लिए उचित है और क्या अनुचित | किन्तु इतना अवश्य है कि बुद्ध के उपदेशों की आत्मा को यदि मानवमात्र ने आत्मसात कर लिया तो हर प्रकार के छल, कपट, युद्ध आदि से संसार को मुक्ति प्राप्त हो सकेगी और शान्त तथा आनन्दित हुआ मानव अध्यात्म मार्ग पर अग्रसर हो सकेगा – अध्यात्म मार्ग अर्थात स्वयं अपने भीतर झाँकने का मार्ग – स्वयं अपनी आत्मा से साक्षात्कार करने का मार्ग | और समस्त भारतीय दर्शनों की मूलभूत भावना यही है |

उदाहरण के लिए बुद्ध ने कायिक, वाचिक, मानसिक किसी भी प्रकार की हिंसा को अनुचित माना है | लेकिन जो लोग सेना में हैं – देश की सुरक्षा के लिए जो कृतसंकल्प हैं – आततायियों को नष्ट करने का उत्तरदायित्व जिनके कन्धों पर है – उनके लिए उस प्रकार की हिंसा ही उचित और कर्तव्य कर्म है, यदि वे पूर्ण रूप से अहिंसा का मार्ग अपना लेंगे तो न केवल वे कायर कहलाएँगे, बल्कि देश की सुरक्षा भी नहीं कर पाएँगे |

बुद्ध ने दुराचार और व्यभिचार से बचने की बात कही | आज जिस प्रकार से महिलाओं – यहाँ तक कि छोटी बच्चियों – के साथ दुराचार और व्यभिचार की दिल दहला देने वाली घटनाएँ सामने आ रही हैं – यदि अपने घरों में ही हम परिवार का केन्द्र बिन्दु – समाज की आधी आबादी – नारी शक्ति का सम्मान करना सीख जाएँ तो इस समस्या से छुटकारा पाया जा सकता है | यहाँ बुद्ध की एक कथा का उदाहरण प्रस्तुत है कि एक बार भ्रमण करते हुए बुद्ध एक गाँव में पहुँचे तो वहाँ एक स्त्री उनसे मिलने के लिए आई और बोली “आप देखने में तो राजकुमार लगते हैं लेकिन वस्त्र आपने सन्यासियों के पहने हैं | इसका कारण ?”

बुद्ध ने उत्तर दिया “हमारा यह युवा और आकर्षक शरीर क्यों बीमार और वृद्ध होकर अन्त में काल के गाल में समा जाता है इसी प्रश्न का उत्तर ढूँढने के लिए मैंने सन्यास लिया है…” स्त्री उनकी बातों से प्रभावित हुई और उन्हें अपने घर भोजन के लिए निमन्त्रित किया | ग्रामवासियों को जब इस बात का पता लगा तो उन्होंने बुद्ध से कहा कि वे उस स्त्री के घर भोजन के लिए न जाएँ क्योंकि वह चरित्रहीन है | बुद्ध ने जब प्रमाण माँगा तो गाँव के मुखिया ने कहा “मैं शपथ लेकर कहता हूँ यह स्त्री चरित्रहीन है…” बुद्ध ने मुखिया का एक हाथ पकड़ लिया और उसे ताली बजाने को कहा | मुखिया ने कहा “मैं एक हाथ से ताली कैसे बजा सकता हूँ ?” तब बुद्ध ने कहा “अगर तुम एक हाथ से ताली नहीं बजा सकते तो फिर यह स्त्री अकेली कैसे चरित्रहीन हो सकती है | किसी भी स्त्री को चरित्रहीन बनाने के लिए पुरुष उत्तरदायी है | यदि पुरुष चरित्रवान होगा तो भला स्त्री कैसे चरित्रहीन हो सकती है ?” यही बात यदि हम अपने घर के बच्चों को संस्कार के रूप में सिखाना आरम्भ कर दें तो महिलाओं के प्रति अत्याचार जैसी भयावह स्थिति से बहुत सीमा तक मुक्ति प्राप्त हो सकती है |

बुद्ध ने मदाक पदार्थों से बचने की बात कही – तो क्या केवल नशीली वस्तुओं का सेवन ही मादक पदार्थों का सेवन है ? दूसरों की चुगली करना, आत्मतुष्टि के लिए दूसरों के

Buddha Purnima
Buddha Purnima

कार्यों में विघ्न डालना इत्यादि ऐसी अनेकों बातें हैं कि जिनकी लत पड़ जाए तो कठिनाई से छूटती है – इस प्रकार के नशों का भी त्याग करने के लिए बुद्ध प्रेरणा देते हैं | हम सभी दोनों “कल” की चिन्ता करते रहते हैं और “आज” को लगभग भुला ही देते हैं | बीते “कल” का कुछ किया नहीं जा सकता, अतः हमें उसे भुलाकर “आज” पर गर्व करना सीखना होगा… विश्वास कीजिए, आने वाला “कल” स्वतः ही अनुकूल हो जाएगा…

तो, देश काल और परिस्थिति के अनुसार व्यक्ति को अपने लिए उचित-अनुचित का निर्धारण करना चाहिए | हाँ, इतना प्रयास अवश्य करना चाहिए कि हमारे कर्म ऐसे हों कि जिन्हें करने के बाद हमारे मन में किसी प्रकार के अपराध बोध अथवा पश्चात्ताप की भावना न आने पाए | क्योंकि यदि हमारे मन में किसी बात के लिए अपराध बोध आ गया या किसी प्रकार के पश्चात्ताप की भावना आ गई तो हमें स्वयं से ही घृणा होने लगेगी और तब हम किस प्रकार सुखी रह सकते हैं ? स्वयं को दुखी करना भी एक प्रकार की हिंसा ही तो है | जो व्यक्ति स्वयं ही दुखी होगा वह दूसरे लोगों को सुख किस प्रकार पहुँचा सकता है ? जबकि बुद्ध के इन उपदेशों का मूलभूत उद्देश्य ही है मानव मात्र की प्रसन्नता – मानव मात्र का सुख…

अस्तु, बुद्धम् शरणम् गच्छामि, धम्मम् शरणम् गच्छामि, संघम् शरणम् गच्छामि ।।

बुद्ध अर्थात् अपनी चैतन्य आत्मा की साक्षी में रहते हुए, धर्म अर्थात अपने यथोचित कर्तव्यों का पालन करते हुए, संघ अर्थात समुदाय – समाज – देश – विश्व – समस्त ब्रह्माण्ड – इस समस्त चराचर जगत के प्रति उत्तरदायी रहकर सभी के हितों की चिन्ता करते हुए – सभी के प्रति समभाव रखते हुए – करुणा का भाव रखते हुए और बुद्ध के दिखाए मार्ग पर चलते हुए हम सभी सुखी रहें, शान्तचित्त रहें, सबके प्रति हमारा प्रेमभाव बना रहे, इसी भावना के साथ सभी को बुद्ध पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएँ…

____________कात्यायनी 

 

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Akshaya Tritiya

अक्षय तृतीया का अक्षय पर्व

Katyayani Dr. Purnima Sharma
Katyayani Dr. Purnima Sharma

ॐ ह्रीं श्रीं लक्ष्मीनारायणाभ्यां नमः

ॐ जमदग्न्याय विद्महे महावीराय धीमहि तन्नो परशुराम: प्रचोदयात

कल यानी शुक्रवार 14 मई को वैशाख शुक्ल तृतीय अर्थात अक्षय तृतीया का अक्षय पर्व है, जिसे भगवान् विष्णु के छठे अवतार परशुराम के जन्मदिवस के रूप में भी मनाया जाता है | तृतीया तिथि का आरम्भ प्रातः पाँच बजकर चालीस मिनट के लगभग होगा और पन्द्रह मई को प्रातः आठ बजे तक तृतीया तिथि रहेगी | तिथि के आरम्भ में गर करण और धृति योग है तथा सूर्य, शुक्र और शनि अपनी अपनी राशियों में गोचर कर रहे हैं | साथ ही चौदह मई को ही रात्रि में ग्यारह बजकर बीस मिनट के लगभग भगवान भास्कर भी वृषभ राशि में प्रस्थान कर जाएँगे | तो, सर्वप्रथम सभी को अक्षय तृतीया की हार्दिक शुभकामनाएँ…

यों तो हर माह की दोनों ही पक्षों की तृतीया जया तिथि होने के कारण शुभ मानी जाती है, किन्तु वैशाख शुक्ल तृतीया स्वयंसिद्ध तिथि मानी जाती है | पौराणिक ग्रन्थों के अनुसार इस दिन जो भी शुभ कार्य किये जाते हैं उनका अक्षत अर्थात कभी न समाप्त होने वाला शुभ फल प्राप्त होता है | भविष्य पुराण तथा अन्य पुराणों की मान्यता है कि भारतीय काल गणना के सिद्धान्त से अक्षय तृतीया के दिन ही सतयुग और त्रेतायुग का आरम्भ हुआ था जिसके कारण इस तिथि को युगादि तिथि – युग के आरम्भ की तिथि – माना जाता है |

साथ ही पद्मपुराण के अनुसार यह तिथि मध्याह्न के आरम्भ से लेकर प्रदोष काल तक अत्यन्त शुभ मानी जाती है | इसका कारण भी सम्भवतः यह रहा होगा कि पुराणों के अनुसार भगवान् परशुराम का जन्म प्रदोष काल में हुआ था | परशुराम के अतिरिक्त भगवान् विष्णु ने नर-नारायण और हयग्रीव के रूप में अवतार भी इसी दिन लिया था | ब्रह्मा जी के पुत्र अक्षय कुमार का अवतार भी इसी दिन माना जाता है | पवित्र नदी गंगा का धरती पर अवतरण भी इसी दिन माना जाता है | माना जाता है कि भगवान श्री कृष्ण ने पाण्डवों को वनवास की अवधि में अक्षत पात्र भी इसी दिन दिया था – जिसमें अन्न कभी समाप्त नहीं होता था | माना जाता है कि महाभारत के युद्ध और द्वापर युग का समापन भी इसी दिन हुआ था तथा महर्षि वेदव्यास ने इसी दिन महान ऐतिहासिक महाकाव्य महाभारत की रचना आरम्भ की थी |

जैन धर्म में भी अक्षय तृतीया का महत्त्व माना जाता है | प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ को उनके वर्षीतप के सम्पन्न होने पर उनके पौत्र श्रेयाँस ने इसी दिन गन्ने के रस के रूप में प्रथम आहार दिया था | श्री आदिनाथ भगवान ने सत्य व अहिंसा का प्रचार करने एवं अपने कर्म बन्धनों को तोड़ने के लिए संसार के भौतिक एवं पारिवारिक सुखों का त्याग कर जैन वैराग्य अंगीकार किया था | सत्य और अहिंसा के प्रचार करते करते आदिनाथ हस्तिनापुर पहुँचे जहाँ इनके पौत्र सोमयश का शासन था | वहाँ सोमयश के पुत्र श्रेयाँस ने इन्हें पहचान लिया और शुद्ध आहार के रूप में गन्ने का रस पिलाकर इनके व्रत का पारायण कराया | गन्ने को इक्षु कहते हैं इसलिए इस तिथि को इक्षु तृतीया अर्थात अक्षय तृतीया कहा जाने लगा | आज भी बहुत से जैन धर्मावलम्बी वर्षीतप की आराधना करते हैं जो कार्तिक कृष्ण पक्ष की अष्टमी से आरम्भ होकर दूसरे वर्ष वैशाख शुक्ल तृतीया को सम्पन्न होती है और इस अवधि में प्रत्येक माह की चतुर्दशी को उपवास रखा जाता है | इस प्रकार यह साधना लगभग तेरह मास में सम्पन्न होती है |

इस प्रकार विभिन्न पौराणिक तथा लोक मान्यताओं के अनुसार इस तिथि को इतने सारे महत्त्वपूर्ण कार्य सम्पन्न हुए इसीलिए सम्भवतः इस तिथि को सर्वार्थसिद्ध तिथि माना जाता है | किसी भी शुभ कार्य के लिए अक्षय तृतीया को सबसे अधिक शुभ तिथि माना जाता है : “अस्यां तिथौ क्षयमुर्पति हुतं न दत्तम्, तेनाक्षयेति कथिता मुनिभिस्तृतीया | उद्दिष्य दैवतपितृन्क्रियते मनुष्यै:, तत् च अक्षयं भवति भारत सर्वमेव ||”

सांस्कृतिक दृष्टि से इस दिन विवाह आदि माँगलिक कार्यों का आरम्भ किया जाता है | कृषक लोग एक स्थल पर एकत्र होकर कृषि के शगुन देखते हैं साथ ही अच्छी वर्षा के लिए पूजा पाठ आदि का आयोजन करते हैं | ऐसी भी मान्यता है इस दिन यदि कृषि कार्य का आरम्भ किया जाए जो किसानों को समृद्धि प्राप्त होती है | इस प्रकार प्रायः पूरे देश में इस पर्व को हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है | साथ ही, माना जाता है कि इस दिन जो भी कार्य किया जाए अथवा जो भी वस्तु खरीदी जाए उसका कभी ह्रास नहीं होता | किन्तु, वास्तविकता तो यह है कि यह समस्त संसार ही क्षणभंगुर है | ऐसी स्थिति में हम यह कैसे मान सकते हैं कि किसी भौतिक और मर्त्य पदार्थ का कभी क्षय नहीं होगा ? जो लोग धन, सत्ता, रूप-सौन्दर्य, मान सम्मान आदि के मद में चूर कहते सुने जाते थे “अरे हम जैसों पर किसी बीमारी से क्या फ़र्क पड़ना है… इतना पैसा आख़िर कमाया किसलिए है…? हमारी सात पीढ़ियाँ भी आराम से बैठकर खाएँ तो ख़त्म होने वाला नहीं… तो बीमारी अगर हो भी गई तो क्या है, अच्छे से अच्छे अस्पताल में इलाज़ करवाएँगे… पैसा किस दिन काम आएगा…?” आज वही लाखों रूपये जेबों में लिए घूम रहे हैं लेकिन किसी को अस्पतालों में जगह नहीं मिल रही, किसी को ऑक्सीजन नहीं मिल रही तो किसी को प्राणरक्षक दावों का अभाव हो रहा है और इस सबके चलते अपने प्रियजनों को बचा पाने में असफल हो रहे हैं | कोरोना ने तो सभी को यह बात सोचने पर विवश कर दिया है कि पञ्चतत्वों से निर्मित इस शरीर का तथा कितनी भी धन सम्पत्ति एकत्र करने का क्या प्रयोजन…?

इसीलिए यह सोचना वास्तव में निरर्थक है कि अक्षय तृतीया पर हम जितना स्वर्ण खरीदेंगे वह हमारे लिए शुभ रहेगा, अथवा हम जो भी कार्य आरम्भ करेंगे उसमें दिन दूनी रात चौगुनी तरक्क़ी होगी | जिस समय हमारे मनीषियों ने इस प्रकार कथन किये थे उस समय का समाज तथा उस समय की आर्थिक परिस्थितियाँ भिन्न थीं | उस समय भी अर्थ तथा भौतिक सुख सुविधाओं को महत्त्व दिया जाता था, किन्तु चारित्रिक नैतिक आदर्शों के मूल्य पर नहीं | यही कारण था कि परस्पर सद्भाव तथा लोक कल्याण की भावना हर व्यक्ति की होती थी | इसलिए हमारे मनीषियों के कथन का तात्पर्य सम्भवतः यही रहा होगा कि हमारे कर्म सकारात्मक तथा लोक कल्याण की भावना से निहित हों, जिनके करने से समस्त प्राणिमात्र में आनन्द और प्रेम की सरिता प्रवाहित होने लगे तो उस उपक्रम का कभी क्षय नहीं होता अपितु उसके शुभ फलों में दिन प्रतिदिन वृद्धि ही होती है – और यही तो है जीवन का वास्तविक स्वर्ण | किन्तु परवर्ती जन समुदाय ने – विशेषकर व्यापारी वर्ग ने अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए इसे भौतिक वस्तुओं – विशेष रूप से स्वर्ण – के साथ जोड़ लिया | अभी हम देखते हैं कि अक्षय तृतीया से कुछ दिन पूर्व से ही हमारे विद्वान् ज्योतिषी अक्षय तृतीया पर स्वर्ण खरीदने का मुहूर्त बताने में लग जाते हैं | कोरोना के इस संकटकाल में भी – जब लगभग हर परिवार में यह महामारी अपना स्थान बना चुकी है – हमारे विद्वज्जन अपनी इस भूमिका का निर्वाह पूर्ण तत्परता से कर रहे हैं | लोग अपने आनन्द के लिए प्रत्येक पर्व पर कुछ न कुछ नई वस्तु खरीदते हैं तो वे ऐसा कर सकते हैं, किन्तु वास्तविकता तो यही है कि इस पर्व का स्वर्ण की ख़रीदारी से कोई सम्बन्ध नहीं है |

एक अन्य महत्त्व इस पर्व का है | यह पर्व ऐसे समय आता है जो वसन्त ऋतु के समापन और ग्रीष्म ऋतु के आगमन के कारण दोनों ऋतुओं का सन्धिकाल होता है | इस मौसम में गर्मी और उमस वातावरण में व्याप्त होती है | सम्भवतः इसी स्थिति को ध्यान में रखते हुए इस दिन सत्तू, खरबूजा, तरबूज, खीरा तथा जल से भरे मिट्टी के पात्र आदि दान देने की परम्परा है अत्यन्त प्राचीन काल से चली आ रही है | साथ ही यज्ञ की आहुतियों से वातावरण स्वच्छ हो जाता है और इस मौसम में जन्म लेने वाले रोग फैलाने वाले बहुत से कीटाणु तथा मच्छर आदि नष्ट हो जाते हैं – सम्भवतः इसीलिए इस दिन यज्ञ करने की भी परम्परा है |

अस्तु, ॐ श्री महालक्ष्म्यै च विद्महे विष्णु पत्न्यै च धीमहि तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात्, ऊँ नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि तन्नो विष्णु प्रचोदयात्… श्री लक्ष्मी-नारायण की उपासना के पर्व अक्षय तृतीया तथा परशुराम जयन्ती की सभी को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाओं के साथ एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण बात, इस समय किसी भी प्रकार का दिखावा अथवा नाम की इच्छा किये बिना जितनी हो सके दूसरों की सहायता करें… क्योंकि जिनकी सहायता हम करते हैं हमें उनके भी स्वाभिमान की रक्षा करनी है… इसीलिए तो गुप्त दान को सबसे श्रेष्ठ माना गया है… साथ ही जो लोग ऑक्सीजन, दवाओं तथा कोरोना से सम्बन्धित किसी भी वस्तु की जमाखोरी और कालाबाज़ारी में लगे हैं वे इतना अवश्य समझ लें कि यदि यह सत्य है कि इस अवसर पर किये गए शुभकर्मों के फलों में वृद्धि होती है तो हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि इस अवसर पर किये गए दुष्कर्मों के फलों में भी वृद्धि होगी… और साथ ही, कोरोना से बचने के उपायों जैसे मास्क पहनना, निश्चित दूरी बनाकर रखना तथा साफ़ सफाई का ध्यान रखना आदि का पूर्ण निष्ठा से पालन करें ताकि इनसे प्राप्त होने वाले शुभ फलों में वृद्धि हो और समस्त जन कोरोना को परास्त करने में समर्थ हो सकें… सभी के जीवन में सुख-समृद्धि-सौभाग्य-ज्ञान-उत्तम स्वास्थ्य की वृद्धि होती रहे तथा हर कार्य में सफलता प्राप्त होती रहे… यही कामना है…

_______________कात्यायनी…