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bookmark_borderउम्र या सिर्फ नंबर

उम्र या सिर्फ नंबर

पूजा भरद्वाज
पूजा भरद्वाज

बच्चा जब जन्म लेता है तो वह एक मासूम सा प्यारा सा बच्चा होता है | हर परेशानियों से दूर जिम्मेदारियों से मुक्त बचपन जब बच्चा बड़ा होता है, स्कूल जाता है, खेलता है और लंच तो ब्रेक से पहले ही खत्म हो जाता है और, उनका दिल साफ, उड़ने के लिए तैयार, आसमान को छूने को तैयार, तब तक यह सिर्फ नंबर ही होते हैं | बड़े होते हैं | नए दोस्त, पढ़ाई का बोझ, वह केवल नंबर होते हैं इस तरह बचपन खुशनुमा मस्ती भरा, थोड़ा हैवी और बहुत सारी यादों के साथ बचपन का नंबर उम्र में बदलना शुरू होता है |

तब शुरू होती है एक उम्र कई जिम्मेदारियों परेशानियों के साथ अपने प्यार को पाने, के लिए भी एक अच्छे कॉलेज में एडमिशन, एक अच्छी नौकरी की | और इस भाग दौड़ में हम जीते हैं अपनी सिर्फ एक उम्र, जिसमें होते हैं कई सवाल | जैसे इतनी उम्र में एक घर, उतनी उम्र में शादी और एक मुकाम इस बीच में रह जाती है | सिर्फ केवल एक उम्र | कुछ लोग तो सिर्फ एक उम्र ही जीते हैं | ना उनकी कोई ख्वाहिश होती है ना दिल में उमंग | उन्हें याद ही नहीं रहता कि वह आखिरी बार दिल खोलकर कब हंसे थे | कब आखिरी बार बारिश में भीगे थे | कई लोग तो इतने बोर होते हैं जैसे वह अपनी जिंदगी बोझ की तरह जी रहे हैं | वे ना उम्र जीते हैं और ना ही नंबर,…….

कुछ लोगों की किस्मत साथ देती है फिर भी पैसे कमाने की होड़ में लग जाते हैं और वह इस होड़ में इतनी दूर आ जाते हैं कि उन्हें पता ही नहीं चलता कि कितने सालों से उनकी साथी कई तरह की दवाइयां बन चुकी है | कई बार तो इतनी देर हो जाती है और उन्हें पता चलता है कि उन्हें कोई गंभीर बीमारी है | फिर उनकी आखिरी समय तक रह जाता है हॉस्पिटल का एक बेड चार बाय चार का कमरा, एक गर्म पानी की बोतल, और बिना स्वाद वाला खाना, और कई सवाल – क्यों मैंने एक पिंजरे में बंद पक्षी की तरह जिंदगी जी – क्यों मैंने एक उम्र जी – क्यों मैं उसे नंबर में नहीं बदल सका…

इसलिए उठो… थोड़ा सोचो… ज्यादा देर हो जाए उससे पहले स्वयं को पहचानो… तुम्हें क्या पसंद है… और शुरूआत करो एक सफर की उम्र को नंबर में बदलने की…

सुबह उठकर 5 मिनट पसंदीदा गाने पर अपने पांव को थिरकाओ | चाहे उम्र 90 की क्यों ना हो फिर भी जिंदादिली से अपनी इच्छाओं को पूरा करो और एक बार अपना बचपन फिर जी लो | हर वह काम करो जो कहीं किसी दिल में कोने में दब गया था | एक बार फिर बचपन जी लो बच्चों के साथ बच्चे बनकर दिल खोलकर हंसो और 90 की उम्र में भी एक गोल्ड मेडल जीतो | हर वह काम करो कि मरने का अफसोस ना रहे और ना कोई सवाल, हो तो एक चेहरे पर बड़ी मुस्कान… एक खुशी… और मन की शांति कि मैंने केवल उम्र नहीं जी… मैंने अपनी उम्र को रोक दिया है सिर्फ नंबर में… और हर पल की एक सेल्फी लो… जब उसे देखो तो मन खुश हो जाए और चेहरे पर आ जाए बड़ी मुस्कान कि हमने अपनी उम्र को नंबर मैं रोक दिया,………,🙏😊😊

         पूजा भारद्वाज

(पूजा भारद्वाज ने दिल्ली के हंसराम कॉलेज से आर्ट्स में ग्रेजुएशन किया है | वर्तमान में ये अपने पति के साथ मिलकर financial consultancy services देती हैं | इस सबके साथ ही इन्हें पेंटिंग का तथा कुकिंग का शौक़ है | साथ में लिखने का भी शौक़ है | ये WOW India की इन्द्रप्रस्थ विस्तार ब्रांच की सदस्य हैं…) डॉ पूर्णिमा शर्मा…

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मानसिक तनाव और अवसाद

हम जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सफल रहें और हमें किसी प्रकार का मानसिक तनाव न हो इसके लिए हमें जीवन भर कहीं न कहीं से कोई न कोई सलाह मिलती ही रहती है – यह करो, वह न करो – इत्यादि इत्यादि, और आप स्वयं को इस सुझावों के चक्रव्यूह में घिरा अनुभव करने लगते हैं | पर क्या आज के समय में ऐसा कोई व्यक्ति है जो तनाव रहित जीवन जी रहा हो ? कभी कभी तो लगता है कि ये तनाव मनुष्य के जीवन का अभिन्न अंग हैं | इनसे भागा नहीं जा सकता, हाँ इन्हें कम अवश्य किया जा सकता है | बहुत से तनाव तो ऐसे होते हैं कि जिनका कोई औचित्य ही नहीं होता | अनावश्यक रूप से हमने उन तनावों को ओढ़ लिया होता है |

इसलिए सबसे पहली आवश्यकता है कि हम अपने जीवन का, अपनी भावनाओं का और अपने परिवेश का अच्छी तरह आकलन करें | इससे हमें उन वस्तुओं, उन परिस्थितियों, उन सम्बन्धों को पहचानने में सहायता प्राप्त होगी जिनके कारण हमें तनाव होता है | उन बातों की एक सूची तैयार करें जिनके कारण हमें तनाव होता है | अब इस सूची में से उन बातों को खोजें जो हमारे लिए निरर्थक हैं और जिन्हें हम सरलता से अपने जीवन से निकाल सकते हैं | अब ईमानदारी के साथ इन्हें अपने जीवन से निकालने का प्रयास करें | इनमें से कुछ टेंशन तो ऐसी होंगी जिन्हें हम अपनी जीवनशैली यानी लाइफ स्टाइल में सुधार करके दूर कर सकते हैं |

साथ ही, सम्बन्धों के प्रति ईमानदार रहें | कुछ सम्बन्ध ऐसे भी होंगे जो हमारे लिए निरर्थक या हम पर बोझ होंगे और उनके कारण हमें निरन्तर तनाव का – नकारात्मकता का अनुभव होता होगा | उन सम्बन्धों को यदि छोड़ा भी नहीं जा सकता है तो कम से कम उनसे विनम्रता पूर्वक इतनी दूरी अवश्य बनाई जा सकती है कि वे आपको प्रभावित न कर सकें | सम्बन्ध परस्पर सम्मान की भावना पर आधारित होने चाहिएँ और उनमें किसी प्रकार की अपेक्षा दोनों ही ओर से नहीं होनी चाहिए | साथ ही, यदि आप विवाहित हैं, तो ध्यान रहे – विवाहेतर सम्बन्ध सदैव तनाव का कारण होते हैं |

अपने जीवन मूल्यों और अपने कार्य के प्रति निष्ठावान रहें | और अपने प्रति भी निष्ठावान रहें | ऐसा करने से आपका बहुत से तनाव स्वतः ही दूर हो जाएगा | बहुत से तनाव तो इसलिए भी उत्पन्न होते हैं कि हमें वो कार्य करने पड़ते हैं जिनमें हमारी रुचि नहीं होती | माता पिता या रिश्तेदारों ने कहा ये कोर्स कर लो, ये काम कर लो, उसमें रूचि है या नहीं – लेकिन करना पड़ जाता है | ऐसे में न तो उस कार्य में मन लगेगा और न ही उसमें पूर्ण कुशलता प्राप्त हो पाएगी | और यही सबसे कारण बन जाएगा मानसिक तनाव का – मानसिक अवसाद का | इसलिए प्रयास ऐसा करना चाहिए की आपकी शिक्षा दीक्षा यानी एजुकेशन और आपका व्यवसाय यानी प्रोफेशन आपकी रुचि का हो | केवल पैसा कमाने के लिए काम करेंगे तो तनाव स्वाभाविक है | और इस बात को आपके परिवारजनों को भी समझना आवश्यक है | भले ही आपको सपरिवार इसके लिए काउंसलिंग ही क्यों न लेनी पड़े | ऐसा करके आपको उचित दिशा निर्देश प्राप्त होगा और आप सफलतापूर्वक बिना किसी तनाव के अपना कार्य करने में सक्षम हो सकेंगे |

ध्यान रहे हमारे पास दिन भर में 24 घण्टे ही होते हैं, लेकिन हम सारे संसार को प्रसन्न रखना चाहते हैं – जिसके लिए 48 घण्टे भी कम पड़ जाते हैं और हम मानसिक तनाव में आ जाते हैं | इसलिए सोच समझ कर अपनी सामर्थ्य के अनुसार कार्य करना चाहिए |

यदि जीवन शैली और सोच इस प्रकार की होगी तो सरलता से एक ईमानदार, सत्यता से युक्त, आनन्दमय लेकिन सादा जीवन जी सकते हैं |

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2020/06/27/mental-stress-and-depression/

 

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जीवन में वास्तविक रूप से सफल व्यक्ति की पहचान

जीवन संघर्षों का नाम है | संघर्षों से लड़ते हुए जो व्यक्ति बिना धैर्य खोए आगे बढ़ता रहता है वही व्यक्ति जीवन में सफल होता है – अपने लक्ष्य को प्राप्त करता है | जो

Dr. Purnima Sharma
Dr. Purnima Sharma

व्यक्ति संकटों और संघर्षों से घबराता नहीं, बाधाओं के उपस्थित होने पर अपना धैर्य नहीं खोने देता उसी व्यक्ति की सफलता की कहानियों को लोग युगों युगों तक याद करते रहते हैं |

“भय बाधा से हार मानकर आगे पीछे क़दम बढ़ाना
यह इस पथ की रीत नहीं, ना कर्मयोगी का है यह बाना |”

लेकिन सफलता किसी को भी यों ही प्राप्त नहीं हो जाती | सफलता प्राप्ति के लिए तथा उस सफलता के अहंकार से बचने के लिए और विनम्र भाव से हर किसी की सहायता करते रहने के लिए व्यक्ति में कुछ विशेष गुणों का होना भी आवश्यक है |

सबसे पहली आवश्यकता है सकारात्मक सोच | व्यक्ति की सोच सकारात्मक होगी तो वह कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी साहस के साथ मार्ग बनाकर आगे बढ़ सकता है | साथ ही जो व्यक्ति जीवन में सफल हो जाता है – जिसे कुछ उपलब्धि हो जाती है – ऐसे व्यक्ति का दृष्टिकोण पूर्ण रूप से सकारात्मक हो जाता है | किसी प्रकार की नकारात्मकता के लिए वहाँ कोई स्थान नहीं रहता न ही किसी दूसरे व्यक्ति की आलोचना की सोच उसके मन में आने पाती है | अपितु अन्य व्यक्तियों के समक्ष वह अपने प्रतिद्वन्द्वियों की भी हृदय से प्रशंसा ही करता है | क्योंकि उस व्यक्ति के मन में समभाव – समत्व बुद्धि – आ जाती है |

व्यक्ति को बड़े से बड़े अवॉर्ड क्यों न मिल जाएँ उसकी योग्यताओं के कारण, कितनी भी सम्पन्नता क्यों न प्राप्त हो जाए उसकी समझदारी और परिश्रम के बल पर, किन्तु यदि उसकी सोच में तनिक भी नकारात्मकता है – अहंकार है – दूसरों की अस्वस्थ आलोचना (स्वस्थ भाव से की गई आलोचना व्यक्ति को भूल सुधार का अवसर प्रदान करती है) करने का स्वभाव है – वह व्यक्ति बाहर से सफल होते हुए भी भीतर से बिल्कुल रीता है – अपूर्ण है – असन्तुष्ट है |

इसके साथ ही आवश्यकता है कि व्यक्ति को समाधान बनने का प्रयास करना चाहिए न की यह कि वह स्वयं ही समस्या बन जाए – समस्या का कारण बन जाए | जो व्यक्ति हर बात में – हर परिस्थिति में केवल समस्याएँ ही देखता है उसे कोई भी बड़ा उत्तरदायित्व सौंपने से बचता है | उसकी बातों को भी लोग गम्भीरता से नहीं लेते | जो लोग समस्या में भी समाधान खोज लेते हैं वही प्रगति के मार्ग पर अग्रसर होकर अपना लक्ष्य प्राप्त करते हैं और सफल होते हैं तथा दूसरों के लिए उदाहरण प्रस्तुत करते हैं | ऐसे व्यक्ति दूसरों की समस्याओं का भी समाधान कर सकने में सक्षम होते हैं |

सफल व्यक्तियों का स्वभाव होता है कि वे सदा अपने कार्य का सम्मान करते हैं तथा दूसरों के कार्यों में हस्तक्षेप नहीं करते | क्योंकि जो व्यक्ति अपने कार्य का सम्मान करता है कार्य भी उसका सम्मान करता है | साथ ही जो व्यक्ति दूसरों के कार्यों में बिना कहे हस्तक्षेप नहीं करते दूसरे व्यक्ति भी उनका सम्मान करते हैं और इस प्रकार उन्हें अपना लक्ष्य प्राप्त करने में भी सहायता प्राप्त होती है | साथ ही, सफल व्यक्ति कभी भी किसी दूसरे व्यक्ति के कार्य में व्यवधान उत्पन्न करने का प्रयास नहीं करते अपितु जितना सम्भव हो उस व्यक्ति को आगे बढ़ाने में उसकी सहायता ही करते हैं |

और सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि – जैसा आरम्भ में ही लिखा है – सफलता की कामना करने वाला व्यक्ति धैर्य और उत्साह से परिपूर्ण होता है | अपनी स्वयं की भूलों से सीख लेकर साहस के साथ आगे बढ़ता है और सफलता का आनन्द उठता है | ऐसे सफल व्यक्ति अपने कथनों और कार्यों के माध्यम से बिना किसी स्वार्थ के दूसरों का भी धैर्य और साहस बढ़ाने में सहयोग देते हैं… डॉ पूर्णिमा शर्मा 

 

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सूर्य ग्रहण

रविवार आषाढ़ कृष्ण अमावस्या को प्रातः दस बजकर बीस मिनट के लगभग सूर्य ग्रहण का आरम्भ होगा जो भारत के कुछ भागों में कंकणाकृति अर्थात वलयाकार दिखाई

Dr. Purnima Sharma
Dr. Purnima Sharma

देगा तथा कुछ भागों में आंशिक रूप से दिखाई देगा और दिन में 1:49 के लगभग समाप्त हो जाएगा | बारह बजकर दो मिनट के लगभग ग्रहण का मध्यकाल होगा | ग्रहण की कुल अवधि 3 घंटे 28 मिनट 36 सेकेंड्स की है | ग्रहण का सूतक शनिवार 20 जून को रात्रि नौ बजकर बावन मिनट से आरम्भ होगा | किन्तु जो लोग बीमार हैं उनके लिए, बच्चों के लिए तथा गर्भवती महिलाओं के लिए 21 जून की प्रातः पाँच बजकर चौबीस मिनट यानी सूर्योदय काल से सूतक का आरम्भ माना जाएगा | यह ग्रहण मिथुन राशि पर है जहाँ सूर्य, चन्द्र और राहु के साथ बुध भी गोचर कर रहा है | सूर्य, चन्द्र और राहु मृगशिर नक्षत्र में हैं | साथ ही इस दिन से भगवान भास्कर दक्षिण दिशा की ओर प्रस्थान आरम्भ कर देते हैं और दिन की अवधि धीरे धीरे कम होनी आरम्भ हो जाती है, इसीलिए इस दिन को ग्रीष्मकालीन सबसे बड़ा दिन भी माना जाता है | किन्तु ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार कर्क संक्रान्ति को सूर्यदेव का दक्षिण दिशा में प्रस्थान आरम्भ होता है जिसे निरयण दक्षिणायन कहा जाता है – जो 16 जुलाई को होगी |

ग्रहण के विषय में हम पूर्व में भी बहुत कुछ लिख चुके हैं | अतः पौराणिक कथाओं के विस्तार में नहीं जाएँगे | हमारे ज्योतिषियों की मान्यता है कि ग्रहण की अवधि में उपवास रखना चाहिए, बालों में कंघी आदि नहीं करनी चाहिए, गर्भवती महिलाओं को न तो बाहर निकलना चाहिए, न ही चाकू कैंची आदि से सम्बन्धित कोई कार्य करना चाहिए, अन्यथा गर्भस्थ शिशु पर ग्रहण का बुरा प्रभाव पड़ता है (यद्यपि इसका कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है) तथा ग्रहण समाप्ति पर स्नानादि से निवृत्त होकर दानादि कर्म करने चाहियें | साथ ही जिन राशियों के लिए ग्रहण का अशुभ प्रभाव हो उन्हें विशेष रूप से ग्रहण शान्ति के उपाय करने चाहियें | इसके अतिरिक्त ऐसा भी माना जाता है कि पितृ दोष निवारण के लिए, मन्त्र सिद्धि के लिए तथा धार्मिक अनुष्ठानों के लिए ग्रहण की अवधि बहुत उत्तम होती है |

जैसा कि हम सभी जानते हैं कि ये सब खगोलीय घटनाएँ हैं और खगोल वैज्ञानिकों की खोज के विषय हैं क्योंकि ग्रहण के आध्यात्मिक महत्त्व के साथ ही संसार भर के वैज्ञानिकों के लिए यह अवसर किसी उत्सव से कम नहीं होता जब वे सौर मण्डल में हो रहे परिवर्तनों का अध्ययन करते हैं | तो इस विषय पर हम नहीं जाएँगे | क्योंकि विज्ञान और आस्था में भेद होता है | हम यहाँ बात करते हैं हिन्दू धार्मिक मान्यताओं और आस्थाओं की | भारतीय हिन्दू मान्यताओं तथा भविष्य पुराण, नारद पुराण आदि पौराणिक मान्यताओं के अनुसार सूर्य और चन्द्र ग्रहण अत्यन्त अद्भुत ज्योतिषीय घटनाएँ हैं जिनका समूची प्रकृति पर तथा जन जीवन पर प्रभाव पड़ता है |

यदि व्यावहारिक रूप से देखें तो इसे इस प्रकार समझना चाहिए कि जिस प्रकार वर्षाकाल में जब सूर्य को मेघों का समूह ढक लेता है उस समय प्रायः बहुत से लोगों की भूख प्यास कम हो जाती है, पाचन क्रिया भी दुर्बल हो जाती है, शरीर में आलस्य की सी स्थिति हो जाती है | इसका कारण है कि सूर्य समस्त चराचर जगत की आत्मा है – परम ऊर्जा और चेतना का स्रोत है | बादलों से ढका होने के कारण सूर्य से प्राप्त वह ऊर्जा एवं चेतना जीवों तक नहीं पहुँच पाती और उनमें इस प्रकार के परिवर्तन आरम्भ हो जाते हैं | इसी प्रकार यद्यपि चाँद घटता बढ़ता रहता हैं, किन्तु जब बादलों के कारण आकाश में चन्द्रमा के दर्शन नहीं होते तब भी समूची प्रकृति पर भावनात्मक प्रभाव पड़ना आरम्भ हो जाता है | ग्रहण में भी यह स्थिति होती है |

सूर्य और चन्द्रमा के मध्य जब पृथिवी आ जाती है और चन्द्रमा पर पृथिवी की छाया पड़ने लगती है तो उसे चन्द्र ग्रहण कहा जाता है, और जब सूर्य तथा पृथिवी के मध्य चन्द्रमा आ जाता है तो सूर्य का बिम्ब चन्द्रमा के पीछे कुछ समय के लिए ढक जाता है – इसे सूर्य ग्रहण कहा जाता है | चन्द्र ग्रहण के समय चन्द्रमा की शीतल किरणें प्राणियों तक नहीं पहुँच पातीं | ज्योतिषीय सिद्धान्तों के अनुसार चन्द्रमा को मन का कारक माना गया है | अतः चन्द्रग्रहण का मन की स्थिति पर व्यापक प्रभाव माना जाता है | तथा सूर्य ग्रहण के समय सूर्य की किरणें पूर्णतः स्वच्छ रूप में प्राणियों तक नहीं पहुँच पातीं | जिसका मनुष्यों के पाचन क्षमता, उनकी कार्य क्षमता आदि पर व्यापक प्रभाव माना जाता है | यही कारण है ग्रहण की स्थिति में कुछ भी भोजन आदि तथा अन्य कार्यों के लिए मना किया जाता है | क्योंकि न तो इस अवधि में किया गया भोजन पचाने में हमारी पाचन प्रणाली सक्षम होती है और न ही इस अवधि में उतनी अधिक कुशलता से कोई कार्य सम्भव हो पाता है | आपने देखा भी होगा कि जब पूर्ण सूर्य ग्रहण होता है – जब दिन में रात्रि के जैसा अन्धकार छा जाता है – तो मनुष्यों पर ही इसका प्रभाव नहीं पड़ता बल्कि सारी प्रकृति को रात का अनुभव होने लगता है और समूची प्रकृति मानो निद्रा देवी की गोद में समा जाती है – सारे पशु पक्षी तक अपने अपने घोसलों और दूसरे निवासों में छिप जाते हैं – क्योंकि उन्हें लगता है कि अब रात हो गई है और हमें सो जाना चाहिए | जब सारी प्रकृति ही ग्रहण के प्रति इतनी सम्वेदनशील है तो फिर मनुष्य तो स्वभावतः ही सम्वेदनशील होता है |

ज्योतिषीय दृष्टि से मिथुन राशि पर पड़ रहा यह सूर्य ग्रहण मिथुन राशि के लिए तो अनुकूल है ही नहीं – उन्हें अपने स्वास्थ्य के साथ साथ अपनी भावनाओं पर नियन्त्रण रखने की आवश्यकता है तथा भाई बहनों के साथ व्यर्थ के विवाद से बचने की भी आवश्यकता है, क्योंकि सूर्य उनका तृतीयेश है | साथ ही कर्क राशि के लिए सूर्य द्वितीयेश होकर धन तथा वाणी का कारक है और उनकी राशि से बारहवें भाव में होने के कारण इस राशि के जातकों के लिए भी इस ग्रहण को अच्छा नहीं कहा जाएगा – उन्हें अपने स्वास्थ्य तथा दुर्घटना और व्यर्थ की धनहानि के प्रति सावधान रहने की आवश्यकता होगी | वृश्चिक राशि के जातकों के लिए सूर्य दशमेश है तथा ग्रहण उनके अष्टम भाव में आ रहा है अतः उन्हें भी विशेष रूप से अपने स्वास्थ्य तथा कार्य स्थल पर गुप्त शत्रुओं की ओर से सावधान रहने की आवश्यकता होगी | मीन राशि के जातकों के लिए सूर्य षष्ठेश है और इस समय उनके चतुर्थ भाव – परिवार तथा अन्य प्रकार की सुख सुविधाओं का भाव – में गोचर कर रहा है – उनके लिए भी इसे शुभ नहीं कहा जा सकता – पारिवारिक क्लेश न होने पाए इसका प्रयास करते रहने की आवश्यकता होगी |

किन्तु साथ ही हमारा अपना यह भी मानना है कि ग्रहण जैसी आकर्षक खगोलीय घटना से भयभीत होने की अपेक्षा इसके सौन्दर्य को निहार कर प्रकृति के इस सौन्दर्य की सराहना करने की आवश्यकता है… क्योंकि इन सब बातों का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है, केवल जन साधारण की अपनी मान्यताओं, निष्ठाओं तथा आस्थाओं पर निर्भर करता है…

बहरहाल, मान्यताएँ और निष्ठाएँ, आस्थाएँ जिस प्रकार की भी हों और विज्ञान के साथ उनका सम्बन्ध स्थापित हो या नहीं, हमारी तो यही कामना है कि सब लोग स्वस्थ तथा सुखी रहें, दीर्घायु हों ताकि भविष्य में भी इस प्रकार की भव्य खगोलीय घटनाओं के साक्षी बन सकें… डॉ पूर्णिमा शर्मा…

 

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मानसिक शान्ति

मानसिक शान्ति – जिसकी आजकल हर किसी को आवश्यकता है – चाहे वह किसी भी व्यवसाय से जुड़ा हो, गृहस्थ हो, सन्यासी हो – विद्यार्थी हो – कोई भी हो – हर किसी

Dr. Purnima Sharma
Dr. Purnima Sharma

का मन किसी न किसी कारण से अशान्त रहता है | और हम अपनी मानसिक अशान्ति का दोष अपनी परिस्थितियों तथा अपने आस पास के व्यक्तियों पर – समाज पर – मढ़ देते हैं | कितना भी ब्रह्म मुहूर्त में प्राणायाम, योग और ध्यान का अभ्यास कर लिया जाए, कितना भी चक्रों को जागृत कर लिया जाए – मन की अशान्ति, क्रोध, चिड़चिड़ापन और कई बार उदासी यानी डिप्रेशन भी – जाता ही नहीं | किन्तु समस्या यह है कि जब तक व्यक्ति का मन शान्त नहीं होगा तब तक वह अपने कर्तव्य कर्म भी सुचारु रूप से नहीं कर पाएगा, क्योंकि मन एक स्थान पर – एक लक्ष्य पर स्थिर ही नहीं रह पाएगा | हमने ऐसे लोग देखें हैं जो नियमित ध्यान का अभ्यास करते हैं, प्राणायाम, ध्यान और योग सिखाते भी हैं – लेकिन उनके भीतर का क्रोध, घृणा, लालच, दूसरों को नीचा दिखाने की उनकी प्रवृत्ति में कहीं किसी प्रकार की कमी नहीं दिखाई देती |

अस्तु, मन को शान्त करने के क्रम में सबसे पहला अभ्यास है मन को – अपने ध्यान को – उन बातों से हटाना जिनके कारण व्यवधान उत्पन्न होते हैं या मन के घोड़े इधर उधर भागते हैं | जब तक इस प्रकार की बातें मन में रहेंगी – मन का शान्त और स्थिर होना कठिन ही नहीं असम्भव भी है | इसीलिए पतंजलि ने मनःप्रसादन की व्याख्या दी है |

महर्षि पतंजलि ने ऐसे कुछ भावों के विषय में बताया है जो इस प्रकार की बाधाओं को दूर करने में सहायक होते हैं | ये हैं – मित्रता, करुणा या संवेदना और धैर्य तथा समभाव | निश्चित रूप से यदि मनुष्य इन प्रवृत्तियों को अपने दिन प्रतिदिन के व्यवहार में अपना लेता है तो नकारात्मक विचार मन में आने ही नहीं पाएँगे | किसी भी व्यक्ति के किसी विषय में व्यक्तिगत विचार हो सकते हैं | यदि उसके उन विचारों से किसी को कोई हानि नहीं पहुँच रही है तो हमें इसकी आलोचना करने का या उसे टोकने का कोई अधिकार नहीं | ऐसा करके हम अपना मन ही अशान्त नहीं करते, वरन अपनी साधना के मार्ग में व्यवधान उत्पन्न करके लक्ष्य से बहुत दूर होते चले जाते हैं |

अतः जब भी और जहाँ भी कुछ अच्छा – कुछ आनन्ददायक – कुछ सकारात्मक ऊर्जा से युक्त दीख पड़े – हमें सहज आनन्द के भाव से उसकी सराहना करनी चाहिए और यदि सम्भव हो तो उसे आत्मसात करने का प्रयास भी करना चाहिए, ताकि हमारे मन में वह आनन्द का अनुभव दीर्घ समय तक बना रहे – न कि अपनी व्यक्तिगत ईर्ष्या, दम्भ, अहंकार आदि के कारण उस आनन्ददायक क्षण से विरत होकर उदासी अथवा क्रोध की चादर ओढ़कर एक ओर बैठ जाया जाए | ऐसा करके आप न केवल उस आनन्द के क्षण को व्यर्थ गँवा देंगे, बल्कि चिन्ताग्रस्त होकर अपनी समस्त सम्भावनाओं को भी नष्ट कर देंगे | आनन्द के क्षणों में कुछ इतर मत सोचिए – बस उन कुछ पलों को जी लीजिये | इसी प्रकार जब कभी कोई प्राणी कष्ट में दीख पड़े हमें उसके प्रति दया, करुणा, सहानुभूति और अपनापन दिखाने में तनिक देर नहीं करनी चाहिए | आगे बढ़कर स्नेहपूर्वक उसे भावनात्मक अवलम्ब प्रदान चाहिए |

इस प्रकार चित्त प्रसादन के उपायों का पालन करके कोई भी व्यक्ति मानसिक स्तर पर एकाग्र तथा प्रसन्न अवस्था में रह सकता है | यदि हमारा व्यवहार ऐसा होगा – यदि इन दोनों बातों का अभ्यास हम अपने नित्य प्रति के जीवन में करेंगे – तो हमारा चित्त प्रसन्न रहेगा – और विश्वास कीजिये – इससे बड़ा ध्यान का अभ्यास कुछ और नहीं हो सकता | इस अभ्यास को यदि हम दोहराते रहते हैं तो कोई भी विषम परिस्थिति हमारा चित्त अशान्त नहीं कर पाएगी – किसी भी प्रकार का नकारात्मक विचार हमारे मन में नहीं उत्पन्न होने पाएगा और हमारा मन आनन्दमिश्रित शान्ति का अनुभव करेगा… डॉ पूर्णिमा शर्मा 

 

bookmark_borderहम क्या हैं

हम क्या हैं

प्रायः हम अपने मित्रों से ऐसे प्रश्न कर बैठते हैं कि हमें तो अभी तक यही समझ नहीं आ रहा है कि हम हैं क्या अथवा हमारे जीवन का उद्देश्य क्या है ? हम इस माया मोह के चक्र से मुक्त होना चाहते हैं, किन्तु निरन्तर जाप करते रहने के बाद भी हम इस चक्रव्यूह को भेद नहीं पा रहे हैं | समझ नहीं आता क्या करें | इस प्रकार की बातों पर एक छोटी से कहानी का स्मरण हो आता है जो कभी अपनी माँ से सुनी थी | आज आपको भी सुना ही दें |

कहानी कुछ इस तरह से है कि एक चिड़िया का एक छोटा सा बच्चा था, जिसे वो चिड़िया उड़ना सिखा रही थी | हर दिन माँ अपने बच्चे को कोई न कोई नई बात सिखाती खुले आकाश में उड़ने के लिए – कोई न कोई नई तकनीक उसे करके दिखाती ताकि वह बच्चा उस तकनीक को सीख कर इस विशाल और असीम आकाश में जितनी दूर और जितनी ऊँची चाहे उड़ान भर सके | बहुत समय तक बच्चा अपनी माँ के साथ उड़ने का अभ्यास करता रहा | एक दिन जब माँ को लगा कि अब उसका बच्चा इतना सीख चुका है कि उसे अब अकेले आकाश नापने के लिए भेजा जा सकता है तो उसने बच्चे को उड़ान भरने की आज्ञा दे इ | जब वो घोसले से बाहर निकलने लगा तो माँ ने समझाया “बेटा पहली बार अकेले जा रहे हो और अब हर दिन अपना दाना चुग्गा चुनने अकेले ही जाया करोगे, क्योंकि अब तुम बड़े हो गए हो और आत्मनिर्भर बन सकते हो | लेकिन बेटा सदा ही कुछ बातों का ध्यान अवश्य रखना | एक तो शाम को घर जल्दी वापस लौट आना – सूर्यास्त से पहले ही, देर मत करना | दूसरे, रास्ते में कहीं व्यर्थ में ही मत रुकना, आजकल पंछियों को जाल में फँसाने की ताक में लोग बैठे रहते हैं और दाने का लालच देते रहते हैं | साथ ही मन में बस एक ही मन्त्र का जाप करते रहोगे कि “मैं किसी लालच में नहीं पडूँगा और शिकारियों से सावधान रहूँगा |” तो ये बात तुम्हारे मन में बैठ जाएगी और तुम सदा शिकारियों की ओर से सावधान रहोगे…” माँ ने बार बार इस मन्त्र का जाप बच्चे से कराया और बच्चा खुले आकाश में उड़ान भरने लगा |

एक दिन बहुत देर हो गई, सूर्यदेव छिप गए, लेकिन बच्चा नहीं लौटा | माँ को चिन्ता होनी स्वाभाविक थी | चिन्तित माँ बच्चे की खोज में निकली | कुछ दूर जाने पर क्या देखती है कि उसका बच्चा किसी शिकारी के जाल में फँसा हुआ है और माँ के दिए मन्त्र का जाप किये जा रहा है “मैं किसी लालच में नहीं पडूंगा और शिकारियों से सावधान रहूँगा |”

हमारा जीवन भी ऐसा ही है | हम निरन्तर अपने गुरुजनों द्वारा दिए गए इसी मन्त्र का जाप करते रहते हैं कि अपनी स्वतन्त्रता अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए हम किसी लालच में नहीं फँसेंगे, किन्तु केवल वाणी से “जाप” भर करते हैं | इस मन्त्र का अर्थ जानते भी हैं, किन्तु उस अर्थ को “समझने” का प्रयास नहीं करते | सब कुछ जानते हुए भी प्रायः हम अपनी ही अभिलाषाओं और अहंकार के जाल में फँसते चले जाते हैं और उन्हीं के अनुरूप कर्म और प्रयास करते रहते हैं | तो सबसे बड़ी समस्या यहीं पर है | हम स्वयं इस तथ्य की खोज में असफल रहते हैं कि हम वास्तव में चाहते क्या हैं और बहुत शीघ्र ही बहुत छोटी छोटी सारहीन बातों और वस्तुओं की ओर आकर्षित होकर मान बैठते हैं कि यही तो हमें चाहिए | कुछ दिनों के बाद उससे उकता जाते हैं और फिर किसी नवीन वस्तु की ओर आकर्षित हो जाते हैं | और यही क्रम जीवन भर चलता रहता है |

इसलिए, हमें बड़ी सावधानी से इस तथ्य को समझने का प्रयास करना चाहिए कि हमारे जीवन का उद्देश्य क्या है, उसके लिए हम कितना प्रयास कर रहे हैं और उन प्रयासों से हमारी क्या अपेक्षाएँ हैं | पूरी निष्ठा तथा विश्वास के साथ यदि ऐसा करेंगे तो कर्म भी अनुकूल दिशा में करेंगे जिनके कारण सफलता अवश्य प्राप्त होगी, क्योंकि निष्ठा और विश्वास ही मूर्त रूप में परिणत होते हैं | जैसा कि भगवान श्री कृष्ण ने गीता में कहा भी है कि सभी मनुष्यों की श्रद्धा उनके सत्त्व अर्थात स्वभाव और संस्कार के अनुरूप होती है | मनुष्य स्वभाव से ही श्रद्धावान है, इसलिए जो व्यक्ति जिस श्रद्धा वाला है वह स्वयं भी वैसा ही है अर्थात् जैसी जिसकी श्रद्धा होगी वैसा ही उसका रूप, गुण, धर्म होगा तथा उसी के अनुरूप उसका कर्तव्य कर्म तथा प्रयास होगा…

सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत |
श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः ||17/3||

इसलिए हमें अपने स्वयं के प्रति ईमानदार होने की आवश्यकता है कि हम अपने विषय में क्या सोचते हैं, क्या करना चाहते हैं | कोई अन्य न तो यह जानना चाहेगा कि हम स्वयं अपने विषय में क्या सोचते हैं न ही वह हमें यह बता पाने में समर्थ ही होगा | हमें स्वयं ही स्वयं के समक्ष यह सिद्ध करना होगा कि हमने किसी लालच के फँसे बिना कितनी निष्ठा और कितने विश्वास के साथ प्रयास किया है स्वयं को जानने का… तभी हम अपने जीवन का उद्देश्य समझ पाएँगे, तभी अनुकूल कर्म करते हुए अपने प्रयासों में सफल हो पाएँगे और तभी हमारी स्वयं के प्रयासों से जो अपेक्षाएँ हैं वे सन्तुष्ट हो पाएँगी…

डॉ पूर्णिमा शर्मा 

 

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Bachpan ki yadein

बचपन की यादें

सुनीता अरोड़ा
सुनीता अरोड़ा

बचपन की वो यादें आज ताज़ा हो गईं |

रात को जब सोते हुए आसमां के तारे गिना करते थे,

और देखते ही देखते गहरी नींद सो जाया करते थे तो,

आज बाहर आकर आसमां की ओर देखा / तो तारे देख,

बचपन की वो यादें ताज़ा हो गईं |

मम्मी पापा के साथ मिलकर काम करते हुए जो खुशी महसूस होती थी,

फिर से वही सब करते हुए उसी खुशी का अनुभव हुआ

और बचपन की वो यादें ताज़ा हो गईं |

परिवार के साथ मिलकर लूडो खेलना,

TV देखना, कैरम बोर्ड खेलना,

फिर से लौट आए,

और बचपन की वो यादें ताज़ा हो गईं |

मम्मी के साथ रसोईघर में हाथ बंटाना,

और देखते ही देखते सब कुछ सीख जाना,

आज अपने बच्चों को देख वह याद आ गया

और बचपन की वो यादें ताज़ा हो गईं |

परिवार के साथ रहकर खुशी को महसूस करना

अपने सुख-दुख को बांटना आनंदित कर गया

और बचपन की वो यादें ताज़ा हो गईं |

सुनीता अरोड़ा

(ये रचना सुनीता अरोड़ा ने लिखी है | सुनीता अरोड़ा WOW India की इन्द्रप्रस्थ ब्रांच की Treasurer होने के साथ ही समाज सेवा के क्षेत्र से भी जुडी हुई हैं | साथ ही ये Haley Star Public School की Principal भी हैं | लिखने का शौक़ रखती हैं, जो इस रचना से पता ही चल रहा है…)

 

bookmark_borderप्रगति का सोपान सकारात्मकता

प्रगति का सोपान सकारात्मकता

व्यक्ति के लिए हर दिन – हर पल एक चुनौती का समय होता है | और आजकल के समय में जब सब कुछ बड़ी तेज़ी से बदल रहा है – यहाँ तक कि प्रकृति के परिवर्तन भी बहुत तेज़ी से ही रहे हैं – इस सारे बदलाव और जीवन की भागम भाग के चलते मनुष्य के मन में बहुत सी शंकाएँ अपने वर्तमान और भविष्य को लेकर घर करती जा रही हैं | इन्हीं शंकाओं के कारण हम सब अनेक प्रकार की नकारात्मकताओं के शिकार भी होते जा रहे हैं |

किन्तु इस सबसे घबराकर निष्कर्मण्य होकर बैठ रहना, किसी तनाव का शिकार होकर बैठ रहना या अपने आप पर से विश्वास उठा लेना – कि नहीं, हमसे ये नहीं होगा – ये सब स्वस्थ मानसिकता के लक्षण नहीं हैं | हमें साहस और समझदारी के साथ हर चुनौती का सामना करते हुए आगे बढ़ते रहने का प्रयास करना चाहिए – क्योंकि जीवन गतिशीलता का ही नाम है | और इसका एक ही उपाय है – आशावान बने रहकर हर परिस्थिति में से कुछ सकारात्मक खोजने का प्रयास किया जाए | सकारात्मकता का एक सिरा भी यदि हाथ में आ गया तो उसके सहारे आगे बढ़ने का और उस परिस्थिति या व्यक्ति के अन्य सकारात्मक पक्षों को ढूंढ निकालने का कार्य किया जा सकता है | और यदि अधिक सकारात्मकता नहीं भी दीख पड़ती है – क्योंकि हम स्वयं बहुत सी शंकाओं से घिरे हुए हैं – तो जो सिरा हाथ आया है उसे ही मजबूत बनाने का प्रयास करेंगे तो अन्य नकारात्मकताएँ सकारात्मकता में परिणत होती जाएँगी |

इसका अर्थ यह नहीं हुआ कि परिस्थिति की नकारात्मकताओं के साथ समझौता किया जाए | नहीं, बल्कि उन्हें सकारात्मक बनाने का प्रयास करना है | क्योंकि जीवन में कभी भी सब कुछ सकारात्मक या मनोनुकूल नहीं उपलब्ध होता है | और नकारात्मकताओं के धागे इतने एक दूसरे से बँधे हुए होते हैं कि एक धागे को खींचेंगे तो सारा का सारा आवरण उधड़ता चला जाएगा और तब सारे तार ऐसे उलझ जाएँगे कि उन्हें सुलझाना असम्भव हो जाएगा |

इसीलिए हमारे मनीषियों ने कहा है कि सुख और दुःख, सफलता और असफलता सबमें समभाव रहते हुए कर्तव्य कर्म करते रहना चाहिए | मन को शान्त करने का अभ्यास करते रहना चाहिए | अच्छा बुरा सब पानी के बुलबुले के समान है जो नष्ट होना ही है | हम सबका ध्येय वो बुलबुला नहीं है, उसके पीछे का वो गहरा और अथाह समुद्र है जिसकी हलचल इस सबका कारण है – जिसकी सतह पर ये बुलबुले दीख पड़ते हैं |

सकारात्मकता और नकारात्मकता के फेर में पड़कर हमारी खोज प्रायः उन वस्तुओं या परिस्थितियों पर केन्द्रित होकर रह जाती है जो वास्तविक नहीं हैं और इसी कारण असंतुष्टि का भाव बना रहता है – जो मानसिक तनाव का सबसे बड़ा कारण है |

वास्तव में जिन्हें हम सकारात्मक और नकारात्मक कहते हैं, सफलता और असफलता कहते हैं – उनमें से कुछ भी वास्तविक नहीं है | केवल मात्र हमारे स्वयं के “अहं” – जिसे ईगो कहा जाता है – की सन्तुष्टि और असन्तुष्टि की उपज होती है | या फिर हमारे परिवार, गुरुजनों, समाज आदि ने हमारे मन में कहीं बहुत गहराई में इसे आरोपित कर दिया होता है | जिस दिन हम इस यथार्थ को समझ गए उस दिन न केवल हमारा मन शान्त हो जाएगा, बल्कि हम हर वस्तु, हर व्यक्ति और हर परिस्थिति में समभाव रहकर केवलमात्र सकारात्मक विचारों और भावों के साथ जीना सीख जाएँगे | यह कार्य कठिन हो सकता है, किन्तु अभ्यास करेंगे तो असम्भव भी नहीं होगा…

हम सभी हर परिस्थिति में सकारात्मकता बनाए रखें यही कामना है… क्योंकि जीवन में प्रगति का एक सोपान यही है…

https://shabd.in/post/113630/pragati-ka-sopan-sakaratmakata

 

bookmark_borderआओ मिलकर कोरोना से लडें

आओ मिलकर कोरोना से लडें

आज प्रथम नवरात्र के साथ ही विक्रम सम्वत 2077 और शालिवाहन शक सम्वत 1942 का आरम्भ हो रहा है । सभी को नव वर्ष, गुडी पर्व और उगडी की हार्दिक शुभकामनाएँ…

कोरोना जैसी महामारी से सारा ही विश्व जूझ रहा है – एक ऐसा शत्रु जिसे हम देख नहीं सकते, छू नहीं सकते – पता नहीं कहाँ हवा में तैर रहा है और कभी भी किसी पर भी आक्रमण कर सकता है । और एक बात, जो बेचारा ग़रीब फुटपाथ पर सो रहा है उसके लिए ये वायरस शायद इतना ख़तरनाक नहीं है जितना मध्यम और उच्च वर्ग के लोगों के लिए हो सकता है । कारण ?

पहली बात तो उस ग़रीब का इम्यून सिस्टम बड़ा स्ट्रॉन्ग होता है क्योंकि न तो वो हमारी आपकी तरह से आर ओ का पानी पीता है न बार बार हाथों पर सेनिटाइजर लगाता है । हर दिन पसीना बहाता है तब कहीं जाकर दो वक़्त की रोटी का जुगाड़ कर पाता है और इस पसीने के साथ शरीर के बहुत सा विष बाहर निकाल फेंकता है | हम जैसे लोगों ने आर ओ का पानी पी पीकर अपना इम्यून सिस्टम बहुत कमज़ोर कर लिया है । प्रकृति से दूर हो गए हैं । सुख सुविधाओं के इतने अधिक अभ्यस्त हो चुके हैं कि पसीना बहाना हमें आता नहीं – योग या कसरत भी करते हैं तो वो भी एयरकंडीशंड जिम या घरों के एयरकंडीशंड कमरों में – पसीना कहाँ से बहेगा | दूसरे, उस ग़रीब का कोई परिचित या सगा सम्बन्धी विदेश से वापस नहीं आया है । न ही उसे हम पास बैठाते हैं, न ही उससे हाथ मिलाते हैं कि उसे वायरस लग जाएगा । और हमारे जैसे समझदार लोग जनता कर्फ्यू के दौरान शाम को पाँच बजे घरों से बाहर निकल कर जुलूस निकालते हैं, भँगड़ा करते हैं – जैसे कोई उत्सव मना रहे हों । क्योंकि हम लोग स्वयं को अनुशासन में रखना जानते ही नहीं । इसी कारण से देश भर में लॉकडाउन करना पड़ा सरकार को । माना इसके परिणाम आर्थिक रूप से अच्छे नहीं होंगे, लेकिन अगर जीवन बच गया और स्वास्थ्य सही रहा तो अर्थ व्यवस्था फिर से सुधरनी आरम्भ हो जाएगी ।

हमारे कुछ प्रिय मित्रों ने कहा “आप जैसे ज्योतिषी कुछ कर सकते हैं…” बड़ी हँसी आई मैसेज पढ़कर | भैया, ज्योतिषी कोई भगवान नहीं होता | उसने जो कुछ अध्ययन किया है उन्हीं सूत्रों और अपने अनुभवों के आधार पर फल कथन करता है कि ग्रहों के गोचर इस प्रकार के हैं, दशाएँ इस प्रकार की हैं तो इन सबके ये मिले जुले परिणाम हो सकते हैं | इसीलिये बार बार दोहराते हैं कि किसी अन्धविश्वास का शिकार होने से कोई लाभ नहीं | समस्या सबको दीख पड़ रही है, और इस समस्या का समाधान भी हमारे विचार से इस लॉकडाउन में ही है | तो, इस लॉकडाउन से घबराएँ नहीं । हमें ये 21 दिन का समय मिला है कि बैठकर आत्ममन्थन करें, कुछ सकारात्मक और रचनात्मक कार्य करें । कुछ स्वाध्याय में मन लगाएँ और मन को शान्त रखने के लिए तथा Positivity बनाए रखने के लिए ध्यान का अभ्यास करें | साथ ही जैसा हमारे प्रिय प्रधानमन्त्री ने कहा, स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े लोग रात दिन एक किये दे रहे हैं इस बीमारी की रोक थाम के लिए | पुलिस के लोग न जाने कितने लोगों के संपर्क में आते होंगे, लेकिन बिना किसी भय के अपनी ड्यूटी का पालन मुस्तैदी से कर रहे हैं | मीडिया कर्मी हमें जागरूक बनाए रखने के लिए पल पल की रिपोर्ट हम तक पहुँचा रहे हैं | हमारे घरों में राशन, दूध और दवाएँ आदि ज़रूरत के सामान पहुँचाने वाले लोग जो बिना डरे अपना कार्य कर रहे हैं | इन सभी को हृदय से धन्यवाद देते रहें | और जब कभी मन में किसी प्रकार की निराशा का भाव उत्पन्न हो तो उन लोगों के विषय में सोचें जो रोज़ कुआँ खोद कर पानी पीते हैं – यानी रोज़ मज़दूरी करते हैं तब उनके घरों में चूल्हे जलते हैं । हम लोगों के घरों में और कुछ भी नहीं तो इतना तो निकल ही आएगा कि नमक से रोटी खा लें, लेकिन उन बेचारों के पास तो ये सुविधा भी नहीं है ।

नवरात्र आरम्भ हो गए हैं, आवश्यक नहीं कि पूरे सामान के साथ कलश स्थापना न कर पाने से दुःखी हुआ जाए, घर में बैठकर माँ भगवती का ध्यान करें, जाप करें, पाठ करें और प्रार्थना करें कि संसार को इस समस्या से मुक्ति प्राप्त हो ।

माँ भगवती अपने नौ रूपों के साथ सभी का कल्याण करें…

bookmark_borderA humble request to all WOW members

🙏😊 A humble request to all WOW members 🙏😊
🙏😊 WOW India के सभी सदस्यों से एक विनम्र निवेदन 🙏😊

आप सभी से निवेदन है कृपा करके कल घरों में ही रहें, और सम्भव हो तो घरों में आपकी सहायता के लिए आने वाली महिलाओं (यानी कामवाली बाई जिन्हें आमतौर पर बोलते हैं), ड्राइवरों, प्रेस वालों, कार साफ़ करने वालों आदि की भी हार्दिक धन्यवाद सहित कल छुट्टी कर दें – लेकिन उनका वेतन न काटें । ऐसा आप स्वयं के, परिवार के, समाज व देश सभी के स्वास्थ्य के लिए करेंगे । ये जनता कर्फ्यू” कोई ऐसा कर्फ्यू नहीं है जहाँ पुलिस आपके हमारे सिरों पर खड़ी रहेगी, ये एक जागरूकता के लिए चलाया गया अभियान है । हम सब मिलकर कोरोना को तीसरे स्तर पर पहुँचने से रोक सकते हैं । नहीं तो दूसरे देशों का हाल हम सबने देखा ही है – जहाँ की जनसंख्या भी हमारे देश के मुक़ाबले बहुत कम है लेकिन कितनी तेज़ी से वहाँ महामारी फैली, कितनी लोगों को संक्रमित किया और कितनों की जान ले ली । हमें उस स्तर पर नहीं पहुँचना है । हमारी केन्द्र सरकार और सभी राज्य सरकारें अपने अपने स्तर पर बहुत अच्छे प्रयास कर रही हैं इसे रोकने के लिए – हमें अपने स्तर पर प्रयास करने होंगे – पैनिक हुए बिना – डरे बिना । साथ ही हमें अपने डॉक्टर्स और नर्सेज़ का धन्यवाद करना भी नहीं भूलना है जो रात दिन जान हथेली पर लेकर किसी बॉर्डर पर तैनात सिपाही की तरह हम सबका स्वास्थ्य सुरक्षित रखने में जुटे हुए हैं, और ऐसा केवलमात्र कल ही नहीं करना, जीवन के इन रक्षकों को तो सदा ही धन्यवाद देना चाहिए…

डॉ. पूर्णिमा शर्मा 🙏😊

A humble request to all WOW members
A humble request to all WOW members