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Padmashree Harekala Hajabba

Gunjan Khandelwal
Gunjan Khandelwal

पद्मश्री हरेकला हजब्बा: अक्षरसंथ

इतिहास के पन्नों में न खो जाएँ – गुँजन खण्डेलवाल

सूती लुंगी व साधारण सी कमीज़ पहने, गले में गमछा डाले हजब्बा जब अपनी चप्पल उतारकर राष्ट्रपति कोविंद जी से अवॉर्ड लेने पहुंचे तो दर्शकों को कौतूहल और विस्मय हुआ | “सामने राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और कई बड़े बड़े लोग बैठे थे, मैं भला उनके सामने चप्पल कैसे पहन सकता हूं”, ऐसा विनम्रता की प्रतिमूर्ति हजब्बा का कहना था |

कर्नाटक के मंगलुरू के समीप न्यूपाडपु गांव के हजब्बा प्रतिदिन उधारी से संतरे लेकर बस डिपो पर बेचा करते थे | करीब 30 वर्ष पहले की एक छोटी सी घटना ने उनके मन पर गहरा प्रभाव डाला | एक विदेशी ने उनसे अंग्रेज़ी में संतरे का दाम पूछा, वे समझ नही पाए और चुप रह गए | अपने पढ़े लिखे नहीं होने की शर्मिंदगी को उन्होंने एक पॉजिटिव मिशन के रूप में लिया और अपने विद्यालय रहित गांव में स्कूल बनाने की ठान ली ताकि वे वहां के निर्धन बच्चों को शिक्षित कर सकें | अपनी स्वयं की बहुत मामूली बचत और अन्यों से सहयोग लेकर उन्होंने ये स्वप्न साकार किया | एक मस्जिद में छोटे बच्चो का पहला स्कूल बना जो आज बढ़ते बढ़ते बड़ा विद्यालय बन गया है |

Selling Oranges on the Street Harekala Hajabba
Selling Oranges on the Street Harekala Hajabba

हजब्बा के इस बिग ड्रीम को साकार करने में लोगों का बहुत सहयोग रहा | कृतज्ञता स्वरूप उनकी नाम पट्टिका स्कूल में लगवाई गई है | उन्हें अपने इस मिशन से संबंधित प्रत्येक घटना व व्यक्ति आज भी याद है | उनका एक कक्ष देश विदेश से प्राप्त अवार्डों से सज्जित है पर प्राप्त धनराशि वे स्कूल की ही मानते हैं |

शिक्षा का धर्म अन्य धर्मों से बड़ा है, संभवतः इसी लिए हर जाति के लोगों से उन्हें मदद मिली |

अल्जाइमर से ग्रस्त बीमार पत्नी, दो विवाह योग्य बेटियों और ‘पेड लेबरर’ बेटे के पिता हजब्बा प्रति दिन ये सब भूल कर स्वयं स्कूल के कक्ष खोलते हैं और भीतर जाने के पूर्व चप्पल उतरना नहीं भूलते और फिर निकल जाते हैं आज भी संतरे बेचने के काम पर, आंखों में अपने विद्यालय को कॉलेज बनता देखने का स्वप्न लिए जो कल साकार होगा |

स्वयं अशिक्षित होने पर भी, अन्यों को शिक्षित करने का हज्जबा का जज़्बा और विश्वास समाज सेवा के रूप में मिसाल बन गया है | इसी निश्चय और प्रयत्नों ने लोगों को उन्हें मदद देने को प्रेरित किया है |

“मैं तो अकेले ही चला था जानिब – ए मंज़िल मगर लोग साथ आते गए और कारवां बनता गया” | जय हिंद… गुँजन खण्डेलवाल

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Humour – Backbiting

आओ ज़रा सा हँस भी लें

Rekha Asthana
Rekha Asthana

हास्य रस – निंदा रस – रेखा अस्थाना 

जी हाँ निंदा रस… बहुत परिश्रम से किसी किसी के पास ही होता है, पर सौभाग्य  स्त्री को इसका मिलता है | पुरुष क्या जाने इसका स्वाद ? स्त्रियाँ जब इस रस की वार्ता में व्यस्त  हो जाती हैं उनका हृदय आनंद से सराबोर हो जाता है | अपना ध्यान सारा का सारा बोझिल कर्तव्यों से हटाकर बस निंदा रस के आनंद में मगन हो श्वेत पंख सी हल्की हो आकाश में विचरण करने लगती हैं | अंतर की सारी बेकार की बातें निकाल फेंकती हैं | चाहे वह सास, नन्द या पड़ोसी जो भी हो जिसको स्त्रियाँ पसन्द नहीं करती बस अपनी सखी से उसकी निंदा करना शुरू देती हैं | सच मानिए, तब उनका चेहरा कमल की तरह खिल उठता है 😊

अरे जनाब आप पुरुषों में ये गुण कहाँ जो हम स्त्रियों में है |

अब बोलो हमें इसी कारण हार्ट अटैक की संभावना भी कम होती है | जब हमारे पास निंदा रस है तो हम क्यों सेवन करें बीटरूट जूस, एलोवेरा जूस 😊

हम तो बस एक दो  टे टहलते हुए या जैसा भी माहौल हो जी भर के निंदा रस में मशगूल हो उसका सेवन करने और कराने में लग जाते हैं और बिल्कुल तरोताजा हो घर पर आराम से काम करते हैं | खर्राटे मार कर सोते हैं | अरे ये तो ईश्वर के द्वारा दिया हुआ गुण है हमें, तो क्यों न इसका उपयोग कर स्वस्थ रहें हम 😊

और ये सब तो नीतिपरक स्लोगन पुरुष ही अपने ऊपर लागू करें | ठीक कहा न हमने 😊

जय राम जी की… रेखा अस्थाना…

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Padma Shree Manjamma Jogati

Gunjan Khandelwal
Gunjan Khandelwal

पद्मश्री मंजम्मा जोगती”

इतिहास के पन्नों में न खो जाएँ – गुँजन खण्डेलवाल

गुँजन खण्डेलवाल जी की आज की प्रस्तुति – मंजूनाथ यानी पद्मश्री मंजम्मा जोगती की मंजूनाथ से पद्मश्री मंजम्मा जोगती बनने तक की यात्रा की कहानी…

हम और आप विस्मयपूर्वक उस क्षण को निहार रहे थे जब मंजम्मा जोगती जी ने गरीमापूर्वक नृत्य मुद्रा में राष्ट्रपति कोविद जी का अभिवादन किया | बाद में उन्होंने बताया कि मैंने उनकी बुरी नजर उतारने का भी उपक्रम किया |

जी हां इन ट्रांसजेंडर्स को प्रायः शादी ब्याह या बच्चों के जन्म होने पर कुछ पैसे की मांग करते हुए पहचानते आए हैं | मंजूनाथ से मंजम्मा जोगती बनने की यात्रा बहुत बहुत कष्टप्रद थी | ट्रांसजेंडर्स सबसे पहले घर, फिर समाज में हमेशा से नकारे गए हैं |

मंजम्मा बताती हैं कि स्कूल के प्रारंभिक दिनों से, अपने हाव भाव से उपहास का पात्र बनती रहीं | यहां तक कि उन्होंने आत्महत्या तक का प्रयास किया | पर शायद उन्हें बहुत ऊपर उठना था | ऐसे ही एक बार, एक पिता पुत्र की जोड़ी ने उनका ध्यान आकर्षित किया, जिसमें पिता गायन करते व पुत्र नृत्य कर रहा था | ये था जोगप्पा समुदाय द्वारा किया जाने वाला देवी येलम्मा को प्रसन्न करने हेतु जोगती नृत्य |

Manjamma Jogati during a performance
Manjamma Jogati during a performance

मंजम्मा जी की नृत्य में रुचि बढ़ी तो उन्हें कालव्वा नाम के बड़े लोक कलाकार से मिलवाया गया | उनके सान्निध्य में वे मंझती गई | ज्योति नृत्य की आज सबसे बड़ी पहचान मंजम्मा ही है, पर वे कहती हैं सच पूछिए तो ये नृत्य मैंने इसलिए नही सीखा कि मेरा बहुत मन था वरन इसलिए कि अपनी भूख से लड़ सकूं |

कर्नाटक के कल्लूकंब गांव में इनका जन्म हुआ, पर इनके ट्रांसजेंडर होने का पता लगते ही इन्हें घर से निकल कर भीख तक मांगनी पड़ी जिसको भी कई बार छीन लिया जाता था | एक दिन छह लोगों द्वारा उनके साथ दुष्कर्म की भी घटना हुई | पर उस पौराणिक पक्षी फीनिक्स की तरह, जो पूरा जल जाने के बाद अपनी ही राख से पुनर्जीवित हो उठता है, मंजम्मा ने कभी हार नहीं मानी |

Manjamma Jogati an inspiration
Manjamma Jogati an inspiration

पिछले 35 वर्षों में वे एक हजार से अधिक नृत्य प्रस्तुतियां दी चुकी हैं | 2019 में वो कर्नाटक जनपद अकादमी की पहली ट्रांस वुमन प्रेसिडेंट बनी | अभावों, तिरस्कार और सोशल स्टिग्मा के दायरे से बाहर आना और पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित होना निःसंदेह गौरवपूर्ण है | आज उनकी बायोग्राफी ‘नाडुवे सुलिवा हेन्नु’ हावेरी जिले के स्कूलों व कर्नाटक विश्वविद्यालय के सिलेबस का अंग है | थिएटर कलाकार, नृत्यांगना, गायन व सोशल एक्टिविस्ट के रूप में अनेक पुरस्कारों से सम्मानित मंजम्मा चाहती हैं ट्रांसजेंडर लोगों के प्रति समाज की सोच व रवैये में बदलाव और साथ ही उनके जैसे लोगों के लिए नौकरी व काम करने की सुविधाएं |

इकबाल के कहे शेर ‘ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले, ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है’, का ख़याल हो आया! जय हिन्द!

गुँजन खण्डेलवाल…

bookmark_borderMehrangarh Fort Jodhpur

Mehrangarh Fort Jodhpur

Sunanda Shrivastava
Sunanda Shrivastava

जोधपुर का मेहरानगढ़ क़िला

इतिहास के पन्नों से – सुनन्दा श्रीवास्तव

कुतुबमीनार से ऊँचा है यह किला, राजा की चिता पर बैठकर रानी ने दी थी जान

जोधपुर का मेहरानगढ़ किला 120 मीटर ऊंची एक चट्टान पहाड़ी पर निर्मित है | इस तरह से यह किला दिल्ली के कुतुबमीनार की ऊंचाई (73मीटर) से भी ऊंचा है | किले के परिसर में सती माता का मंदिर भी है | 1843 में महाराजा मान सिंह का निधन होने के बाद उनकी पत्नी ने चिता पर बैठकर जान दे दी थी | यह मंदिर उसी घटना की

Inside the Mehrangarh Fort
Inside the Mehrangarh Fort

स्मृति में बनाया गया था | .

आसमान से कुछ यूं नज़र आता है जोधपुर का ये खूबसूरत क़िला

Aerial view of Mehrangarh Fort
Aerial view of Mehrangarh Fort

मेहरानगढ़ किला एक पहाड़ी पर बनाया गया जिसका नाम ‘भोर चिड़िया’ बताया जाता है | ये क़िला अपने आप में जोधपुर का इतिहास देख चुका है, इसने युद्ध देखे हैं और इस शहर को बदलते भी देखा है | .

10 किलोमीटर में फैली है किले की दीवार

इस किले के दीवारों की परिधि 10 किलोमीटर तक फैली है | इनकी ऊंचाई 20 फुट से 120 फुट तथा चौड़ाई 12 फुट से 70 फुट तक है | इसके परकोटे में दुर्गम रास्तों वाले सात आरक्षित दुर्ग बने हुए थे | घुमावदार सड़कों से जुड़े इस किले के चार द्वार हैं | किले के अंदर कई भव्य महल, अद्भुत नक्काशीदार दरवाजे, जालीदार खिड़कियां हैं | .

500 साल से पुराना है यह किला

जोधपुर शासक राव जोधा ने 12 मई 1459 को इस किले की नींव डाली और महाराज जसवंत सिंह (1638-78) ने इसे पूरा किया | इस किले में बने महलों में से उल्लेखनीय हैं मोती महल, फूल महल, शीश महल, सिलेह खाना, दौलत

View from Mehrangarh Fort
View from Mehrangarh Fort

खाना आदि | इन महलों में भारतीय राजवंशों के साज सामान का विस्मयकारी संग्रह निहित है | .

1965 के युद्ध में देवी ने की थी इसकी रक्षा

राव जोधा को चामुंडा माता में अथाह श्रद्धा थी | चामुंडा जोधपुर के शासकों की कुलदेवी रही हैं | राव जोधा ने 1460 में मेहरानगढ़ किले के समीप चामुंडा माता का मंदिर बनवाया और मूर्ति की स्थापना की | माना जाता है कि 1965 के भारत-पाक युद्ध के दौरान सबसे पहले जोधपुर को टारगेट बनाया गया | माना जाता है कि इस दौरान माता के कृपा से यहां के लोगों का बाल भी बांका नहीं हुआ था | .

किले के छत पर रखे तोपों से होती थी 6 किलोमीटर के क्षेत्र की रक्षा

Handprints of Sati in Mehrangarh Fort
Handprints of Sati in Mehrangarh Fort

इस किले के दीवारों पर रखे भीमकाय तोपों से आस-पास का छह किलोमीटर का भू-भाग सुरक्षित रखा जाता था | किले के दूसरे दरवाजे पर आज भी पिछले युद्धों के दौरान बने तोप के गोलों के निशान मौजूद हैं | .

आज भी मौजूद हैं रानियों के आत्मदाह के निशान

अंतिम संस्कार स्थल पर आज भी सिंदूर के घोल और चांदी की पतली वरक से बने

हथेलियों के निशान पर्यटकों को उन राजकुमारियों और रानियों की याद दिलाते हैं |

__________सुनन्दा श्रीवास्तव

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Recipe of Amle ka Halwa

Rekha Asthana
Rekha Asthana

आँवले का हलवा और कार्तिक पूर्णिमा – रेखा अस्थाना

आँवले के गुणों के विषय में तो हम सभी जानते हैं | और ठण्ड के मौसम में जब ताज़ा ताज़ा आँवला आता है तब तो कई तरह से उसे काम में लिया जाता है | इसी तरह से आज हम बनाते हैं आँवले का हलवा… स्वास्थ्यवर्द्धक भी और खाने में स्वाद भी…

  • सामग्री :
  • आधा किलो आँवला
  • चीनी आधा किलो (पर यह आपके स्वाद पर भी निर्भर करता है)
  • एक टुकड़ा दालचीनी
  • एक छोटी इलायची
  • एक लौंग लें पीस कर पाउडर बना कर रख लें
  • एक बड़ा चम्मच देसी घी |
  • विधि :
  • आँवले को थोड़ा पानी डालकर स्टीम दें | तीन स्टीम के बाद उतार कर, ठण्डा होने पर उसकी गुठली अलग कर उसे मिक्सी में पीस लें | कढ़ाई गर्म कर उसमें घी डालें और पीसे आँवले को खूब भूनें |
  • इधर चीनी की एक तार की चाशनी बनाकर तैयार रखें | जब आँवले का पानी सूख जाए तब उस चाशनी को आँवले के पेस्ट में डालकर चलाएँ | फिर चुटकी भर जो आपने मसाला बनाया था डालकर खूब चलाएँ | सूखने पर उतार लें |
  • बर्फी की विधि :

अब अगर आप इसी पेस्ट में भुना हुआ सिंघाड़े का आटा मिला देंगे तो यह थोड़ा कड़ा पड़ जाएगा | इन दोनों को अच्छे से मिलाएँ | उसे आप थाली में घी लगा कर जमाकर बर्फी का आकार दे सकती हैं | ऊपर से ड्राईफ्रूट्स से डेकोरेट भी कर सकती हैं |

  • फायदे :
  • इसमें प्रचुर मात्रा में आयरन, कैल्शियम, व विटामिन सी होता है | इसे आप रोटी, पराठे या फिर ब्रेड में लगाकर बच्चों को दे सकती हैं | यह रक्त की कमी की पूर्ति कर आँखों की रोशनी के लिए भी फायदेमंद है | नियमित उपयोग से बाल झड़ने बंद हो जाते हैं |

    Different uses of Amla
    Different uses of Amla
  • थोड़ा कसैला अवश्य रहता है पर गुणकारी सोने के समान है |
  • शुगर पेशेंट्स चीनी का उपयोग सोच समझ कर करें |
  • बुजुर्गों की कहावत :

बुजुर्गों का कहा और आँवले का खाया बाद में नजर आता है |

  • सामाजिक दायित्व :
  • कार्तिक मास भर संपन्न व्यक्ति को किसी न किसी रूप में आँवले का दान गरीबों को अवश्य करें क्योंकि वे खरीद कर नहीं खा पाते | छठपूजा में भी आँवला चढ़ता है और प्रसाद रूप में सभी को दिया भी जाता है |
  • एक आँवले का गुण एक तोले सोने के समान है |

किसी भी प्रकार की मेरी त्रुटि के लिए क्षमा👏हम फिर मिलेंगे आँवले के साथ किसी अन्य रूप में |

रेखा अस्थाना

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Mrs. Tulsi Gowda Padma Shri

इतिहास के पन्नों में न खो जाएँ – गुँजन खण्डेलवाल

वैतूल निवासी गुँजन खण्डेलवाल जी WOW India की ऐसी सदस्य हैं जो वैतूल में रहते हुए भी संस्था से जुडी हुई हैं और संस्था के Online कार्यक्रमों में नियमित रूप से

Gunjan Khandelwal
Gunjan Khandelwal

भाग लेती रहती है… English Scholar और अंग्रेज़ी की ही प्रोफ़ेसर होने के साथ ही हिन्दी भाषा में गहरी रूचि रखती हैं और हिन्दी भाषा की बहुत अच्छी और प्रभावशाली कवयित्री होने के साथ ही एक सुलझी हुई लेखिका भी हैं… बहुत से सम सामयिक विषयों पर अपनी सुलझी हुई राय रखती हैं… कुछ ऐसे व्यक्तित्वों के विषय में इन्होंने लिखना आरम्भ किया है जो जन मानस पर गहरी छाप छोड़ जाते हैं… इससे पहले की ये कहीं इतिहास के पन्नों में गुम हो जाएँ… ताकि हम और आप इनसे कुछ प्रेरणा प्राप्त कर सकें… इनसे कुछ सीख सकें… प्रस्तुत है इनकी ये रचना… यद्यपि इस महान व्यक्तित्व के विषय में आज बहुत लोग परिचित हैं, किन्तु आज हम इसके विषय में गुँजन जी की दृष्टि से देखने का प्रयास करेंगे… डॉ पूर्णिमा शर्मा…

क्यों भई तुम्हारी कलम को भी कोरोना हो गया था क्या ? कब तक ‘क्वारनटाइन’ रहेगी ?”

बात उपहास में पूछी गई, पर लगा शायद पिछले दहशत भरे वक्त का ‘कोरोना इफेक्ट’ तन मन और सभी एक्टिविटीज को कहीं न कहीं प्रभावित तो कर ही गया है | इस बार दीपावली कुछ कुछ उत्साह भरी रही की अपनों से मिलना जुलना हुआ, पर कितने घरों की शोक की पहली दीपावली मन को व्यथित कर गई | खैर…

जीवन तो आगे बढ़ता ही है | ऐसे में सन 2021 के पद्म पुरस्कारों की सूची के कुछ नाम और परिचय बहुत प्रेरक लगे | साथ ही इन पुरस्कारों की ‘क्रेडिबिलिटी’ को बढ़ा गए | महिलाएँ जहाँ कहीं की भी हों, जो भी हासिल करती हैं वो उनके लिए सदा से धारा के विपरीत तैरने जैसा होता है | ये बहुत कंट्रोवर्शियल हो सकता है पर…

Mrs. Tulsi Gowda
Mrs. Tulsi Gowda

जाने भी दीजिए ना ! पर इस समय जिस सम्मान और तालियों की गड़गड़ाहट के बीच जंगल की पगडंडियों से चल कर राष्ट्रपति भवन के ‘रेड कार्पेट’ तक नंगे पांव जिन्होंने ये सफ़र तय किया है वे हैं श्रीमती तुलसी गौड़ा जी | कर्नाटक में हलक्की जनजाति से संबंध रखने वाली तुलसी गौड़ा जी होनाली गांव के बेहद ही गरीब परिवार की हैं | यहां तक की वो कभी विद्यालय भी नहीं जा सकीं | प्रकृति के प्रति अधिक लगाव होने के कारण उनका अधिक समय जंगल में ही बीता और उनका पौधों और जड़ी बूटियों का ज्ञान विस्तृत होता गया | आज 77 वर्ष की आयु में वो ‘इनसाइक्लोपीडिया ऑफ फॉरेस्ट’ के रूप में विख्यात हैं | पिछले 60 वर्षों में उन्होंने तीस हजार से अधिक वृक्ष लगाए हैं | उनके प्रयासों को पहले भी इंदिरा प्रियदर्शिनी वृक्ष मित्र अवॉर्ड, राज्योत्सव अवॉर्ड और कविता मेमोरियल जैसे अवार्डो द्वारा सराहना मिल चुकी है | वे वन विभाग में कार्यरत हैं जहां वे लगातार पौधों के बीज एकत्र करती रहती हैं, गर्मी तक उनका रखरखाव करते हुए उपयुक्त समय पर जंगल में बो देती हैं |

अपने पारंपरिक सूती आदिवासी वस्त्र में राष्ट्रपति कोविद जी से पुरस्कार ग्रहण करने वाली तुलसी गौड़ा जी अपनी सादगी और पर्यावरण मित्र के रूप में नई पीढ़ी से उत्साह पूर्वक अपना ज्ञान और अनुभव बांटती है | आशा है उनके द्वारा रोपित ये बीज आगे भी अंकुरित व पल्लवित होते रहेंगे | जय हिंद |

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Writers Building Kolkata

Sunanda Shrivastava
Sunanda Shrivastava

Writer’s Building, Kolkata

Going Back to the History with Sunanda Shrivastava

Built in 1777, the Writer’s Building was meant to accommodate junior servants, or ‘writers’ as they were called, of the East India Company. When it was leased to the company in 1780 for this purpose, it was described as looking like a ‘shabby hospital, or poor-house ‘. After several structural changes over the next couple of decades, Fort William College set up camp there, training writers in languages such as Hindi and Persian, until around 1830. In the years that succeeded, the dwelling was used by private individuals and officials of the British Raj as living quarters and for shopping.

Writer's Building, Kolkata
Writer’s Building, Kolkata

Extensive remodelling and renovations have occurred most of the times the building was switched between hands. Today, there are 13 blocks; six of which were added after India won independence from British rule. The 150-metre-long structure has a distinct Greco-Roman style, with several statues of Greek gods as well as a sculpture of Roman goddess Minerva commanding attention from the pediment.

Among the many notable events that occurred during the building’s lifetime, the most memorable one perhaps was the assassination of Lt Col NS Simpson, the infamous Inspector General of Prisons. Three Bengali revolutionaries – Benoy Basu, Badal Gupta and Dinesh Gupta – disguised themselves as Westerners to get inside the Writers’ Building and shot the colonel, who was notorious for his brutal oppression of Indian prisoners. It is from the names of these freedom fighters that BBD Bagh – the central business district of Kolkata (and the location of Writers’ Building) – gets its name.

Sunanda Shrivastava

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Amla ki Chutney

कार्तिक, अगहन और पूस

Rekha Asthana
Rekha Asthana

खाओ आँवले की चटनी और पीयो तरकारी का गर्म सूप

प्रकृति – वह भी भारत देश की – जहाँ नाना प्रकार की साग सब्जियाँ व फल होते हैं जो शरीर के लिए औषधि का कार्य करते हैं पर हमें सही जानकारी न होने के कारण हम इनका इस्तेमाल कम करते हैं | हमारे बुजुर्ग कहा करते थे कि अगर हम केवल मौसमी फलों और साग सब्ज़ियों का ही भोजन में प्रयोग करें तो रोगों से कोसों दूर रह सकते हैं | आजकल आँवलो पर बहार आई हुई है… जी हाँ, आँवलों का मौसम चल रहा है और आँवले स्वास्थ्य के लिए कितने अधिक उपयोगी होते हैं ये हम सभी जानते हैं | कई तरह से आँवलों का प्रयोग किया जाता है | और अगर उनकी चटनी बनाकर खाई जाती है तब तो सेहत के साथ साथ खाने का स्वाद भी दोगुना बढ़ जाता है… तो आइये आज मैं आपको आँवले की चटनी प्रतिदिन खाने के लिए बनाने की विधि बता रही हूँ…

  • सामग्री
  • आँवले चार – काटकर गुठली अलग करें व बारीक टुकड़ों में काट लें
  • हरी धनिया पचास ग्राम
  • लहसुन यदि खाते हों तो पाँच कली छीलकर
  • हरी मिर्च सात या आठ या फिर स्वादानुसार
  • दो चम्मच सफेद सूखे तिल (तवे में हल्के लाल कर हल्का सा पीस लें)

    Recipe of Amla ki Chutney
    Recipe of Amla ki Chutney
  • एक चम्मच ऑलिव ऑइल यदि हो तो
  • नमक स्वादानुसार
  • विधि— इस सारी सामग्री को अच्छी प्रकार धोकर मिक्सी में पीसकर एक छोटे जार में रखें फिर उसमें भुने दरबराए तिल व ऑलिव ऑइल को मिलाकर रखें | प्रतिदिन अपने प्रियजन को प्रेम से परोसें |
  • फायदे— आपको सर्दी-जुकाम से दूर रखे, इम्यून सिस्टम ठीक रखेगा, शरीर में आयरन व कैल्शियम की कमी को पूरा करेगा । बाल आँखों के लिए  हितकर |

रोज खाइए और खिलाइए | क्योंकि यह बिना बताए पुण्य का बैलेंस बढ़ाता जाता है | जब हम स्वस्थ रहेंगे तो देश पर बोझ नहीं बनेंगे न |

“बुजुर्गों की गाथा व आँवले का खाया” बाद में पता चलता है |

और हाँ, त्रुटि के लिए क्षमा करियेगा क्योंकि डाक्टर हमसे अधिक  जानते हैं।👏😊

रेखा अस्थाना

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Dwarkadhish Temple in Gujrat

Sunanda Shrivastava
Sunanda Shrivastava

Back to the History with Sunanda Shrivastava

Dwarkadhish Temple also known as the Jagat Mandir in Dwarka, Gujarat is believed to have been established more than 2500 years ago by Bhagawan Shri Krishna’s great grandson, Vajranabh.

The ancient Temple has been renovated several times, especially leaving imprints of 16th and 19th centuries. The temple stands on a small hill accessed by 50 plus steps, with heavily sculptured walls that cocoon the sanctum with the main Krishna Murti. Around the complex lie other smaller shrines. The walls have intricately carved puranic characters and legends.

The impressive 43 m high spire is topped with a flag made from 52 yards of cloth that flutters in the soft breeze from the Arabian Sea behind the temple.

There are two doors (Swarga and Moksha) for the entry and exit of the Temple.

Dwarkadhish
Dwarkadhish

 

Idol in the Temple

Idol in the Temple

Dwarkadhish Temple
Dwarkadhish Temple

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पिपरहवा इतिहास के पन्नों से

इतिहास के पन्नों से – सुनन्दा श्रीवास्तव

बात तीस साल पहले की है | 1988 में बस्ती जिले के उत्तरी भाग को अलग कर उत्तर प्रदेश में सिद्धार्थ नगर जिले की स्थापना हुई थी | इसका कारण यह था कि पुरातत्व

उत्खनित बौद्ध स्तूप पिपरहवा
उत्खनित बौद्ध स्तूप पिपरहवा

विभाग ने वास्तविक कपिलवस्तु की पुरातात्विक पहचान कर ली थी और कपिलवस्तु गौतम बुद्ध उर्फ सिद्धार्थ की नगरी थी | इसलिए जिले का सिद्धार्थ नगर नाम इतिहास के प्रामाणिक तथ्यों पर आधारित है |

आज सिद्धार्थ नगर जिले में जो पिपरहवा है, वही सिद्धार्थ की नगरी कपिलवस्तु है | पिपरहवा की पहली जानकारी एक ब्रिटिश इंजीनियर तथा पिपरहवा क्षेत्र के जमींदार डब्ल्यू. सी. पेपे को मिली थी और वो जमीन पेपे के पास थी |

वो जनवरी का महीना था और 1898 का साल था, जब पिपरहवा में विशाल स्तूप की खोज हुई थी | स्तूप से एक पत्थर का कलश मिला | कलश पर ब्राह्मी में अभिलेख था, जिस पर लिखा था – सलिलनिधने बुधस्भगवते अर्थात अस्थि – पात्र भगवत बुध का है | 19 जनवरी, 1898 को डब्ल्यू. सी. पेपे ने नोट बनाकर इस अभिलेख को समझने के लिए वी. ए. स्मिथ को भेजा था | पहली तस्वीर पिपरहवा के विशाल स्तूप की है और दूसरी तस्वीर में वो अभिलेखित कलश है |

दिन, महीने, साल बीते | बात 1970 के दशक की है | पुरातत्व विभाग ने पिपरहवा की क्रमबद्ध खुदाई कराई | फिर तो विशाल स्तूप के अगल – बगल चारों ओर पूरब, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण में अनेक संघाराम मिले | पूर्वी संघाराम, पश्चिमी संघाराम, उत्तरी संघाराम, दक्षिणी संघाराम इसे तस्वीरों में आप देख सकते हैं | पूरा पिपरहवा संघारामों से पटा हुआ था | यह कपिलवस्तु का धार्मिक – शैक्षणिक क्षेत्र था |

अभिलेखित धातु मंजूषा
अभिलेखित धातु मंजूषा

यह कपिलवस्तु है और वास्तविक कपिलवस्तु है | इसका पुरातात्विक प्रमाण भी मिल गया | खुदाई में मिली मिट्टी की मुहरों पर लिखा है कि कपिलवस्तु का विहार यही है | आप उन मिट्टी की मुहरों को तस्वीर में देख सकते हैं | कहीं कपिलवस्तु और कहीं महा कपिलवस्तु लिखा है |

आप देख रहे हैं कि पिपरहवा का क्षेत्र विहारों, स्तूपों से भरा है तो फिर कपिलवस्तु के लोग कहाँ रहते थे? बस पिपरहवा से कोई 1 कि. मी. की दूरी पर गनवरिया है | यह कपिलवस्तु का रिहायशी क्षेत्र था | यहीं गणराज्य के लोग रहते थे | आखिरी तस्वीर उसी गनवरिया की आवासीय संरचना की है |

पिपरहवा जो कपिलवस्तु का धार्मिक क्षेत्र था, बोधिवृक्ष पीपल नाम को सार्थक करता है और गनवरिया जो कपिलवस्तु का रिहायशी क्षेत्र था, गण नाम को सार्थक करता है | यह पूरबी बोली के नाम हैं, जिसमें ” ल ” का उच्चारण ” र ” और ” ण ” का उच्चारण ” न ” होता है | इसीलिए पीपल / पीपर से पिपरहवा/ पिपरिया संबंधित है और ( शाक्य ) गण / गन से गनवरिया संबंधित है |