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bookmark_borderसर्वाइकल कैंसर के लक्षण कारण और बचाव

सर्वाइकल कैंसर के लक्षण कारण और बचाव

Dr. Shama Batra
Dr. Shama Batra

सर्वाइकल कैंसर मुक्त भारत अभियान” के अन्तर्गत इसके लक्षण, कारण और इससे बचाव के सन्दर्भों में पूछे गए बहुत से प्रश्नों के उत्तर दे रही हैं डॉ शमा बत्रा… बहुत ही उपयोगी वार्ता… अवश्य पढ़ें… MBBS, MD (OBG), FICOG डॉ शमा बत्रा पटेल हॉस्पिटल में Medical Superintendent हैं… Also, she is Former Secretary of Indian Medical Association (EDB), Former Fin. Secretary of Indian Medical Association (EDB), Co-chairperson Women Doctor’s Welfare Association, Secretary of WDW (IMA), Delhi, Executive Member of EDGF/EDB, Chairperson of IMA Mission Pink Health, Delhi Member of FOGSI, AOGD, FEMGENCON, ISAR, FETAL Medicine, HEALTHY INDIA TRUST and is a part of many social organizations… लेख के साथ दिए गए चित्र डॉ बत्रा और उनकी होनहार सुपुत्री दिशा बत्रा ने बनाए हैं… एक अच्छी जानकारी के लिए एक बार अवश्य पढ़ें इस लेख को… डॉ पूर्णिमा शर्मा…

  • सवाल : सर्विक्स कैंसर क्या है ?

सर्विक्स बच्चेदानी के मुंह का कैंसर है | यह महिलाओं में सबसे ज्यादा पाया जाता है | एचपीवी वायरस का संक्रमण कारण होता है | त्वचा से त्वचा के सम्पर्क, कई लोगों से संबंध से होता है | यह संक्रमण रोकने के उपाय न करने से होता है |

  • सवाल : इसके लक्षण क्या हैं ?

    Cervical Cancer
    Cervical Cancer

एचपीवी वायरस के संक्रमण के लक्षण तो नहीं दिखते हैं | इससे अनियमित रक्तस्राव, संबंध के दौरान रक्तस्राव, व्हाइट डिस्चार्ज जैसा होना, भूख कम लगती है |

  • सवाल : किन कारणों से होता है ?

ब्रेस्ट कैंसर के बाद महिलाओं में यह सबसे ज्यादा होता है | सही तरीके से जननांग की सफाई न करना, असुरक्षित यौन संबंध और धूम्रपान भी इसके प्रमुख कारण है |

  • सवाल : किन जांचों से पहचानते हैं ?

21-40 वर्ष तक पैपस्मीयर, एचपीवी डीएनए टेस्ट कराना चाहिए | रिपोर्ट में गड़बड़ी पर काल्पोस्कोपी (दूरबीन आधारित जांच), बायोप्सी करते हैं |

  • सवाल : एचपीवी इंफेक्शन क्या है ?

ह्यूमन पैपीलोमा वायरस (एचपीवी) द्वारा संक्रमण इस कैंसर का प्रमुख कारण है | इस वायरस के कई प्रकार होते है | इस संक्रमण से बचाव के लिए  टीके उपलब्ध हैं | टीका चार प्रकार के वायरस एचपीवी (06, 11, 16, 18) से बचाता है | इसकी तीन खुराक होती है | 10-45 की उम्र की महिलाएं ये टीका लगवा सकती हैं | शादी या संबंध स्थापित होने से पहले लगवाने से ज्यादा सुरक्षित रह सकते हैं |

  • सवाल : बचाव के लिए क्या करें ?

गर्भाशय के मुंह के कैंसर से बचाव के लिए 10-45 की उम्र तक एचपीवी वैक्सीन लगवाएं | इसकी तीन डोज होती है, यह छह माह में लगती है | 21 वर्ष के बाद हर महिला को स्क्रीनिंग करानी चाहिए | स्क्रीनिंग से कैंसर की शुरुआती अवस्था में पहचान से इलाज आसान होता है | 30 से 65 की उम्र के बीच पैप स्मीयर व एचपीवी, डीएनए टेस्ट

Cervical Cancer Free India
Cervical Cancer Free India

किया जाता है | यदि दोनों टेस्ट सामान्य है तो महिला की स्क्रीनिंग पांच वर्ष बाद करते हैं |

Cervical Cancer Mukta Bharat

Let’s join WHO”s global movement of 90%,70%,90%

to eliminate Cervical Cancer

So let’s join Together we can achieve🤝🤝

@DrShamaBatra

🙏😊🙏

bookmark_borderसर्वाइकल कैंसर मुक्त भारत

सर्वाइकल कैंसर मुक्त भारत

Dr. Chanderlata
Dr. Chanderlata

सर्विक्स यानी गर्भाशय का सबसे निचला भाग – जिसे गर्भाशय कि ग्रीवा भी कहा जाता है – उसमें होने वाला कैंसर “सर्वाईकल कैंसर” कहलाता ही | यह एक बहुत घातक कैंसर है | WOW India और DGF द्वारा चलाए जा रहे “सर्वाइकल कैंसर मुक्त भारत” अभियान

के अन्तर्गत WOW India के Doctors Group की सदस्य डॉ चन्दरलता – जो EDGF की भी सदस्य हैं और पिछले 38 वर्षों से मरीजों कि सेवा में रत एक जानी मानी Obst. & Gynaecologist हैं – का लेख प्रस्तुत है… एक बार पढ़ें अवश्य… डॉ पूर्णिमा शर्मा…

सर्वाइकल कैंसर मुक्त भारत” अभियान

गर्भाशय के मुंह का है ये कैंसर, महिलाओं में नम्बर 2 का है ये कैंसर

हमारी महिलाओं को इसके कारणों और जांच का नहीं है ज्ञान, हमें उन्हें देना है,सरल भाषा में इसका ज्ञान

किशोरावस्था जीवन का, सबसे नाज़ुक मोड़ है

जिज्ञासा और बेचैनी का कैसा अद्भुत जोड़ है   

संभल संभल कर चलना ये जीवन अनमोल है , इस लिए 9-45 की उम्र में सर्वाइकल कैंसर का टीकाकरण भी अनमोल है

ह्उमन पैपिलोमा वायरस, करता है —99% संक्रमण

इससे बचने का सरल उपाय —90%

 टीकाकरण

सरल जांच है पैप समियर, महिलाओं को समझाना है बारम्बार

करवा लें गर 70% महिलाएं ये जांच

Cervical Cancer
Cervical Cancer

सर्वाइकल कैंसर भागे उल्टे पांव

पैप समियर देता है डाक्टर को, शीघ्र कैंसर का संज्ञान

फिर सर्वाइकल कैंसर का होता पूर्ण निदान

समय पर टीकाकरण, पैप समियर और शीघ्र इलाज

इस जागरूकता से बना सकेंगे, सर्वाइकल कैंसर मुक्त समाज

चलो मिलकर फैलाएं सर्वाइकल कैंसर मुक्त अभियान चहूं ओर

गलती से ना छूटे जिंदगी की कोई डोर

आओ मिलकर संकल्प लें, जागरूकता अभियान चलायेंगे

भारत को शीघ्र ही सर्वाइकल कैंसर मुक्त बनायेंगे

डॉक्टर  चन्द्र लता

        🌹🌹🤝🤝🤝🤝🤝🌹🌹

bookmark_borderआप वैसे नहीं हैं

आप वैसे नहीं हैं 

आज के हमारे इस लेख का विषय है “आप वैसे नहीं हैं”…

Katyayani Dr. Purnima Sharma
Katyayani Dr. Purnima Sharma

आपने अक्सर लोगों को कहते सुना होगा कि हमें गुस्सा नहीं आता, लेकिन जब कोई कुछ ग़लत बात बोल देता है तो हम अपना टेम्पर लूज़ कर जाते हैं | यानी लोग अपने गुस्से का इलज़ाम दूसरों पर डाल देते हैं कि ये तो दूसरे लोग हैं जिनके कारण हमें गुस्सा आता है | या कभी ऐसा भी होता है कि कोई बोल देता है “तुम बेवकूफ हो” और हम उसे सच मान बैठते हैं | हमारे मन में हीन भावना आ जाती है | हम अपने आपको निरर्थक समझने लगते हैं | ऐसा नहीं होना चाहिए |

कोई दूसरा आपके विषय में क्या सोचता है आप पर इस बात से कोई असर क्यों पड़े ? क्यों आप दूसरों की बातों से प्रभावित होते हैं ? आप जो हैं – जैसे भी हैं – वैसे ही हैं | किसी दूसरे के आपको बेवकूफ कहने से आप बेवकूफ नहीं हो जाते | ये उन दूसरे लोगों की धारणा है आपके विषय जो बहुत से कारणों से बन सकती है – सम्भव है किसी अन्य व्यक्ति ने उन्हें बेवकूफ़ कहा हो और उसका बदला लेने के लिए वे आपको बेवकूफ़ बोल रहे हैं | या फिर उनकी अपनी हीन भावना या कुछ भी हो सकता है | तो उस सबका असर आप पर होना ही नहीं चाहिए | आप जो हैं – जैसे भी हैं – वैसे ही हैं – और दूसरा व्यक्ति जैसा है वैसा है |

आप वैसे नहीं हैं जैसा दूसरे आपको देखना चाहते हैं | आप एक व्यक्तित्व हैं | आप दूसरों से बिल्कुल अलग हैं | कोई भी दो लोग एक जैसे नहीं हो सकते – न शक्ल सूरत में, न स्वभाव में, न गुणों में – जुड़वां बच्चों की बात अलग है – लेकिन उनके स्वभाव भी प्रायः एक जैसे नहीं होते | और कहा तो यहाँ तक जाता है कि एक ही शक्ल के सात लोग संसार के किसी भी कोने में हो सकते हैं – तो ये एक अलग बात है | कहने का मतलब यही है कि आपकी अपनी एक अलग पहचान है | आवश्यकता है अपनी उस पहचान को समझने की | आवश्यकता है अपना मूल्य जानने की | आप अपने महत्त्व खुद ही समझने लग जाएँगे तो दूसरे आपके विषय में उलटा सीधा बोलना बन्द कर देंगे और आपकी योग्यता को पहचानने लग जाएँगे |

एक प्रयोग करके देखिये | अगर कोई आपके लिए कुछ ग़लत बोलता है या आपको नीचा दिखाने की कोशिश करता है तो एक लम्बी साँस लीजिये और मन में संकल्प कीजिए कि “हम पर कोई असर इस बात का नहीं पड़ता | हम इस बात पर कोई प्रतिक्रिया नहीं देंगे – कुछ भी रिएक्ट नहीं करेंगे – हम बिल्कुल शान्त रहेंगे…” और ऐसा संकल्प लेकर मुस्कुराइए और आगे बढ़ जाइए | विश्वास कीजिए, ऐसा करके आपको स्वयं अनुभव होगा कि अपने प्रति आपकी सारी हीन भावना – दूसरों के प्रति आपकी सारी नकारात्मकता एक ही बार में दूर हो जाएगी | और निरन्तर इस अभ्यास को करते रहने से कभी आप पर किसी की नकारात्मक बातों का असर होना ही बन्द हो जाएगा | एक बार करके तो देखिये ऐसा प्रयास…

तो अन्त में बस यही कहेंगे कि अपने प्रति उदार बनिए… दूसरों के अनुसार खुद को बदलने का प्रयास मत कीजिए… क्योंकि आप वैसे नहीं हैं जैसा दूसरे आपको देखना चाहते हैं या जैसे दूसरे हैं… आप स्वयं में एक व्यक्तित्व हैं…

आज के लिए बस इतना ही… अगली बार किसी दूसरे विषय के साथ आपके समक्ष होंगे… तब तक के लिए नमस्कार…

कात्यायनी………..

 

bookmark_borderहरियाली तीज और आज़ादी का अमृत महोत्सव

हरियाली तीज और आज़ादी का अमृत महोत्सव

Katyayani Dr. Purnima Sharma
Katyayani Dr. Purnima Sharma

24 जुलाई को इन्द्रप्रस्थ विस्तार स्थित आईपैक्स भवन में महिलाओं के सर्वांगीण स्वास्थ्य की दिशा में प्रयासरत संस्था WOW India ने अपनी Sister Organization DGF और 6 Organics तथा श्री लक्ष्मणदास चैरिटेबल ट्रस्ट के साथ मिलकर हरियाली तीज और आज़ादी के अमृत महोत्सव का आयोजन किया | कार्यक्रम दिन में दो बजे Lunch के साथ आरम्भ हुआ | तीन बजे श्री कबीर शर्मा द्वारा लिखित, डॉ पूर्णिमा शर्मा द्वारा स्वरबद्ध किया तथा रूबी शोम और अमज़द खान द्वारा गाया हुआ वीरों की शौर्य गाथा को दर्शाता गीत “रणबाँकुरों तुम्हें नमन तुम्हें प्रणाम है” प्रस्तुत किया गया | उसके बाद विधिवत कार्यक्रम का आरम्भ हुआ |

संस्था की चेयरपर्सन डॉ शारदा जैन ने इस अवसर पर बोलते हुए कहा कि सभी को आज़ादी के महत्त्व को समझना चाहिए | संस्था की महासचिव डॉ पूर्णिमा शर्मा ने अपने वक्तव्य में कहा कि जब आज़ादी मिलती है तो बहुत सारे उत्तरदायित्व भी साथ में लाती है – विशेष रूप से महिलाओं का उत्तरदायित्व यही है कि वे स्वयं अपने स्वास्थ्य पर ध्यान दें ताकि अपनी सन्तानों के स्वास्थ्य पर भी दे सकें – उन्हें अच्छे संस्कार दें ताकि स्वस्थ और संस्कारित भावी पीढ़ी का निर्माण हो सके – और हमारे वीर शहीदों के बलिदान सार्थक सिद्ध हो सकें |

कार्यक्रम में डॉ दीपाली भल्ला का गीत “चलो पेड़ लगाएँ” भी रिलीज़ किया गया | साथ ही WOW India की सभी शाखाओं के सदस्यों के द्वारा रंगारंग कार्यक्रम प्रस्तुत किये गए |

नृत्य और गीतों के साथ ही एक प्रभावशाली प्रस्तुति रही सूर्य नगर शाखा की सदस्यों द्वारा प्लास्टिक के दुष्प्रभावों के सन्दर्भ में प्रस्तुत लघु नाटिका – जिसका लेखन और निर्देशन किया था अनुभा पाण्डेय ने… महिलाओं से सम्बन्धित वस्तुओं के स्टाल्स भी लगाए गए जिनमें महिलाओं ने अपनी पसन्द की वस्तुओं की ख़रीदारी भी की |

कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण रहा “Teej Queen Contest” जिसमें तीज क्वीन बनीं WOW India की इन्द्रप्रस्थ विस्तार की सदस्य ऋतु भार्गव… इन्हें ही Best Ramp Walk का अवार्ड भी मिला… रनर अप और बेस्ट स्माइल का अवार्ड मिला डॉ मंजु बारिक को… बेस्ट हेयर का अवार्ड मिला डॉ आभा शर्मा को… 

Teej Queen & Best Ramp Walk
Teej Queen & Best Ramp Walk

 

 

Runner up & Best Smile
Runner up & Best Smile
Best Hair
Best Hair

 

 

 

इसके अतिरिक्त रूबी शोम को “रणबाँकुरों” गाने के लिए Excellence award दिया गया, रुक्मिणी नायर को Appreciation award दिया आर्ट्स एंड क्राफ्ट्स के लिए, प्रीति नागपाल को Wow Woman Entrepreneur का अवार्ड दिया गया… WOW India की Cultural Secretary लीना जैन ने बहुत प्रभावशाली ढंग से मंच का संचालन किया…

डॉ पूर्णिमा शर्मा, Secretary General, WOW India

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bookmark_borderकाव्य सन्ध्या आज़ादी का अमृत महोत्सव 

काव्य सन्ध्या आज़ादी का अमृत महोत्सव 

WOW India ने साहित्य मुग्धा दर्पण के साथ मिलकर आज़ादी के अमृत महोत्सव के उपलक्ष्य में 12 अगस्त को सायं साढ़े चार बजे से एक काव्य संगोष्ठी का आयोजन किया डिज़िटल प्लेटफ़ॉर्म ज़ूम पर | जिसकी अध्यक्षता की अर्चना गर्ग ने | संगोष्ठी में WOW India और साहित्य मुग्धा दर्पण की कवयित्रियों ने काव्य पाठ प्रस्तुत किया… संगोष्ठी का सफलतापूर्ण संचालन किया WOW India की Cultural Secretary लीना जैन ने… प्रस्तुत है संगोष्ठी की वीडियो रिकॉर्डिंग…

https://youtu.be/H5QJqXqdkvg

bookmark_borderकाव्य संगोष्ठी आज़ादी का अमृत महोत्सव

काव्य संगोष्ठी आज़ादी का अमृत महोत्सव

WOW India साहित्य मुग्धा दर्पण के साथ मिलकर आज़ादी के अमृत महोत्सव के उपलक्ष्य में 12 अगस्त को दिन में 12 बजे से एक काव्य संगोष्ठी का आयोजन किया डिज़िटल प्लेटफ़ॉर्म ज़ूम पर | जिसकी अध्यक्षता की सुप्रसिद्ध साहित्यकार डॉ रमा सिंह ने | संगोष्ठी में प्रसिद्ध कवि/कवयित्रियों ने काव्य पाठ प्रस्तुत किया… संगोष्ठी का सफलतापूर्ण संचालन किया WOW India की Cultural Secretary लीना जैन ने… प्रस्तुत है संगोष्ठी की वीडियो रिकॉर्डिंग…

https://youtu.be/FhdjUCiZesY

 

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मेरी सहेली और गुरु गौरैया

Gunjan Khandelwal
Gunjan Khandelwal

(On World Sparrow Day)

गुँजन खण्डेलवाल

चींचीं का शोर बहुत सवेरे मुझे उठा देता और गौरैया व उसकी सखियाँ मेरे छोटे से बगीचे में फुदकने लगतीं | इधर वो दाने, कीड़े आदि चुनकर सफाई करतीं की मैं घर बुहार लेती | उसमें  और मेरी माँ में मुझे समानता लगती | कभी ना थकती कभी ना रूकती की तर्ज़ पर माँ के काम चलते जाते और ये गौरैया भी दाना पानी की जुगत में लगी रहती | सामने की झाड़ी में उसे चोंच में भर कभी तिनके, सींक और रूई लेकर जाते देख लगा कि घोंसला बना रही है | जैसे माँ स्वेटर बुनती लगभग वैसे ही गौरैया ने अपना घोंसला तैयार कर लिया | कुछ दिन बाद मुझे उसमें गोल, सफेद अंडे दिखाई दिए | अब मेरी सखी गौरैया का स्वभाव बदल रहा था | ज़्यादातर वह अपने घोंसले में चौकन्नी रहती अपनी गर्दन घुमाती रहती | उस दिन तो उसने शोर मचाकर और पंख फड़फड़ा कर दुश्मन पंछी को भगा कर ही दम लिया | कुछ दिन बाद मुझे पंख विहीन, मरियल चूज़े दिखाई दिए |

गौरैया की व्यस्तता बढ़ती जा रही थी | आसपास की बड़ी इमारतों और सड़कों के कारण उसे दाना चुगने दूर जाना पड़ता था | उससे मेरी घनिष्ठता इस तरह बढ़ी की अब मैं कुछ गेहूं – चावल के दाने और एक सकोरे में पानी रोज छत पर रखने लगी | मुझे देखकर अब वो एक दम उड़ती नहीं थी वरन  पास पड़े दाने चुनते रहती | गौरैया को देख उसके बच्चे चोंच खोल देते और वो उसमें दाना डाल देती | समय अपनी गति से चल रहा था | उस दिन गौरैया घोंसले में नहीं थी | पता नहीं कैसे उसका एक बच्चा नीचे गिर पड़ा | इस से पहले बिल्ली उसको झपट लेती मैंने उसे सुरक्षित घोंसले में पहुंचा दिया | देर शाम तक गौरैया चींचीं करती मेरे घर के चक्कर काटती रही | अब किसी भी माँ की तरह वो भी अपने बच्चों को दुनिया दारी के लिए तैयार कर रही थी | बच्चे थोड़ी उड़ान भरने लगे थे | वो बड़ी  भयावह शाम थी | गर्मी में बरामदे का पंखा  तेजी से घूम रहा था | गौरैया का एक बच्चा पता नहीं कब उस ओर उड़ते हुए आया और एक पल में पंखे से टकरा कर गिर गया | उस रात मेरे आंसू और गौरैया की चीं चीं वाली चीख़ आपस में घुल मिल गईं |

समय ने गति पकड़ ली थी | मेरे बच्चे दूसरे शहरों में पढ़ने चले गए | मेरी उदासी गहरा रही थी | उस दिन मैंने देखा गौरैया के बच्चे पेड़ों के एकाध चक्कर लगा कर उड़ गए | कभी ना वापस आने के लिए | मैं निराश हो गई | पर ये क्या?गौरैया अगली सभी सुबह खुशी खुशी चहकती आ धमकती और पुरानी दिनचर्या में व्यस्त हो गई | उसके चहचहाने से मुझे सीख मिल गई कि बच्चों को अपना भविष्य बनाने जाना ही है इसलिए उसमें बाधा न बनो और गौरैया की तरह अपेक्षा न रखते हुए अपने कर्तव्य पूर्ण खुशी खुशी करते रहो | मेरी सहेली गौरैया ने मुझे एक साथ यानि समाज से जुड़ने का संदेश दिया | आत्म निर्भरता, आत्म रक्षा और पर्यावरण संरक्षण जैसे सबक भी जाने अनजाने सिखा दिए | अब  मैं उसे सहेली के साथ गुरु भी मानने लगी हूँ |

 

bookmark_borderCertificate of Participation

Certificate of Participation

साँझ सकारे कोयल कूके, लो वसन्त आया |

रंग बिरंगे फूल खिलाता लो वसन्त आया ||

पाँच फरवरी को वसन्त पञ्चमी का उल्लासमय पर्व था… ऋतुराज वसन्त के स्वागत हेतु WOW India ने साहित्य मुग्धा दर्पण के साथ मिलकर डिज़िटल प्लेटफ़ॉर्म ज़ूम पर दो दिन काव्य संगोष्ठियों का आयोजन किया… द्वितीय कड़ी 5 फरवरी को आयोजित की गई जिसमें दोनों संस्थाओं के सदस्यों स्वरचित रचनाओं का पाठ किया… काव्य पाठ प्रस्तुत वाले वाले सदस्यों को सम्मानस्वरूप एक प्रशस्ति पत्र भी प्रदान किया गया है… सादर: डॉ पूर्णिमा शर्मा…

Anubha Pandey

 

 

 

 

bookmark_borderFestival of Hindi Poetry on Spring

Festival of Hindi Poetry on Spring

वसन्त पर हिन्दी कविताओं का उत्सव

नमस्कार ! WOW India के सदस्यों की योजना थी कि कुछ कवि और कवयित्रियों की वासन्तिक रचनाओं से वेबसाइट में वसन्त के रंग भरेंगे, लेकिन स्वर साम्राज्ञी भारत

Lata Mangeshkar
Lata Mangeshkar

कोकिला लता मंगेशकर जी के दिव्य लोक चले जाने के कारण दो दिन ऐसा कुछ करने का मन ही नहीं हुआ… जब सारे स्वर शान्त हो गए हों तो किसका मन होगा वसन्त मनाने का… लेकिन दूसरी ओर वसन्त भी आकर्षित कर रहा था… तब विचार किया कि लता दीदी जैसे महान कलाकार तो कभी मृत्यु को प्राप्त हो ही नहीं सकते… वे तो अपनी कला के माध्यम से जनमानस में सदैव जीवित रहते हैं…

नाम गुम जाएगा, चेहरा ये बदल जाएगा
मेरी आवाज़ ही पहचान है, गर याद रहे

और यही सब सोचकर आज इस कार्य को सम्पन्न कर रहे हैं… लता दीदी वास्तव में माता सरस्वती की पुत्री थीं… तभी तो उनका स्वर कभी माँ वाणी की वीणा जैसा प्रतीत होता है… कभी कान्हा की बंसी जैसा… तो कभी वासन्तिक मलय पवन संग झूलते वृक्षों के पत्रों के घर्षण से उत्पन्न शहनाई के नाद सरीखा… तभी तो नौशाद साहब ने अपने एक इन्टरव्यू में कहा भी था “लता मंगेशकर की आवाज़ बाँसुरी और शहनाई की आवाज़ से इस क़दर मिलती है कि पहचानना मुश्किल हो जाता है कौन आवाज़ कण्ठ से आ रही है और कौन साज़ से…” उन्हीं वाग्देवी की वरद पुत्री सुमधुर कण्ठ की स्वामिनी लता दीदी को समर्पित है इस पृष्ठ की प्रथम रचना… माँ वर दे… सरस्वती वर दे…
माँ वर दे वर दे / सरस्वती वर दे…
वीणा पर वह भैरव गा दे, जो सोए उर स्वतः जगा दे |
सप्त स्वरों के सप्त सिन्धु में सुधा सरस भर दे ||
माँ वर दे वर दे / सरस्वती वर दे…
गूँज उठें गायन से दिशि दिशि, नाच उठें नभ के तारा शशि |

Vasant Panchami
Vasant Panchami

पग पग में नूतन नर्तन की चंचल गति भर दे ||
माँ वर दे वर दे / सरस्वती वर दे…
तार तार उर के हों झंकृत, प्राण प्राण प्रति हों स्पन्दित |
नव विभाव अनुभाव संचरित नव नव रस कर दे ||
माँ वर दे वर दे / सरस्वती वर दे…
वीणा पुस्तक रंजित हस्ते, भगवति भारति देवि नमस्ते |
मुद मंगल की जननि मातु हे, मुद मंगल कर दे ||
माँ वर दे वर दे / सरस्वती वर दे…

अब, वसन्त का मौसम चल रहा है… जो फाल्गुन मास से आरम्भ होकर चैत्र मास तक रहता है… फाल्गुन मास हिन्दू वर्ष का अन्तिम महीना और चैत्र मास हिन्दू नव वर्ष का प्रथम माह होता है… भारतीय वैदिक जीवन दर्शन की मान्यता कितनी उदार है कि वैदिक वर्ष का समापन भी वसन्तोत्सव तथा होली के हर्षोल्लास के साथ होता है और आरम्भ भी माँ भगवती की उपासना के उल्लास और भक्तिमय पर्व नवरात्रों के साथ होता है… तो प्रस्तुत हैं हमारे कुछ साथियों द्वारा प्रेषित वासन्तिक रचनाएँ… सर्वप्रथम प्रस्तुत है डॉ ऋतु वर्मा द्वारा रचित ये रचना… प्रेम वल्लरी
हवाओं को करने दो पैरवी,
हौले हौले फूलों को रंग भरने दो
बस चुपचाप रहो तुम,
प्रेम वल्लरी अंबर तक चढ़ने दो
किरनों आओ, आकर धो दो हृदय आंगन
अब यहां आकर रहा करेंगे, सूर्य आनन
धड़कनों को घंटनाद करने दो,
विवादों को शंखनाद करने दो
प्रेम वल्लरी…..
सौंदर्यमयी आएगी पहनकर / नीहार का दुशाला
तुम भी दबे पांव आना / अति सजग है उजाला
प्रेम प्रालेय को देह पर गिरने दो,
चश्म के चश्मों को नेह से भरने दो
प्रेम वल्लरी….
ये हृदयहीन जाड़ा, क्यूं गलाये स्वप्न?
तेरा अलाव सा आगोश, पिघलाये स्वप्न
कहीं दूर शिखरों पर बर्फ गिरती है, तो गिरने दो
जलती है दुनिया पराली सी, तो जलने दो
प्रेम वल्लरी…..

और अब, रेखा अस्थाना जी की रचना… सखी क्या यही है वसन्त की भोर?

सखि क्या यही है वसन्त की भोर ?

खोल कपाट अलसाई नैनों से / देखा मैंने जब क्षितिज की ओर |
सुगंध मकरंद की भर गई / चला न पाई संयम का जोर ||
सखी कहीं यही तो नहीं वसन्त की भोर? |
फिर चक्षु मले निज मैंने / लगी तकन जब विटपों की ओर |
देख ललमुनियों का कौतुक / प्रेमपाश में मैं बंध गई
भीग उठे मेरे नयन कोर |
सखी यही तो नहीं वसन्त की भोर ||
फिर पलट कर देखा जब मैंने / बौराए अमुआ गाछ की ओर,
पिक को गुहारते वेदना में / निज साथी को बुलाते अपनी ओर |
देख उनकी वेदना, पीड़ा उठी मेरे पोर पोर |
सखी क्या यही है वसन्त की भोर ||
सुनकर भंवरे की गुंजार / पुष्प पर मंडराते करते शोर
अंतर भी मेरा मचल उठा |
सुन पाऊँ शायद मैं इस बार सखी
अपने प्रियतम के बोल |
लग रहा मुझको तो सखी यही है
अब वसन्त की भोर ||
मृदुल, सुगंधित, सुरभित बयार ने
आकर जब छुआ मेरे कोपलों को,
तन ऊर्जा से भर गया मेरा |
खुशी का रहा नहीं मेरा ओर-छोर |
अलि अब तो समझ ही गयी मैं,
यही तो है वसन्त की भोर ||

अब डॉ नीलम वर्मा जी का हाइकु…

बसंत-हाइकु

उन्मुक्त धरा

गा दिवसावसान

बसंत- गान

– नीलम वर्मा

अब पढ़ते हैं गुँजन खण्डेलवाल की रचना… पधार गए रति नरेश मदन…

माघ पौष से ठिठुरी, शुष्क धारा रति,

रूठी, उदास, फीकी, मन की जान रही गति,

सर्द तीखी हवा में बिखराए दूर्वा कुंतल,

रात भर तृण तृण पर बिछा तुहिन,

बुझाती विरह अनल,

श्वेत हिम के बगूलो से स्वयं जम गई,

नव सूर्य की प्रथम रश्मि से धीरे से पिघल गई,

उत्तरायण में ज्यों ली दिनकर ने करवट,

संवारने लगी वसुंधरा रूप अपना झटपट,

डगर, द्वार सजने लगी बलखाती लतिकाओं की बंदनवार,

कहे वसुधा – उठ अलि, उठ कलि, कर मेरा सोलह श्रृंगार,

सखी कोयल लगी कुहुकने, कीट भृंग करें गुंजार,

सुप्त तितलियों ने त्याग निद्रा सतरंगी पंख दिए पसार,

सरसों ने फैलाया उन्मुक्त पीला आंचल, दी लज्जा बिसार

रंग बिरंगे पुष्पों से शोभित हुए उपवन – अवनि,

बालियों से अवगुंठित पहन हार, ऋतुराज ढूंढे सजनी,

झटक कर अपने पुराने वसन,

नूतन पत्र पंखों से वृक्ष करते अगुवाई,

आंख मिचौली खेलती धूप, स्निग्ध ऊष्म से देती बधाई,

लहलहाने लगे खेत, उपवन करते अभिनंदन,

ईख उचक उचक लहराते, झुक झुक करते वंदन,

आम्रमंजरी, नव नीम पल्लव, पीपल कर रहे नमन,

चिड़ियों की चहक बजाएं ढोल शहनाई,

प्रफुल्ल पक्षियों ने जल तरंग बजाई,

लचकती टहनियां झूमें, छेड़े जो मलय पवन,

आनंद, प्रेम रस में हिलोरे लेते धरती गगन,

कामदेव प्रिया पीत अमलतास बिछाए,

शीश पर धर मयूर पंख किरीट रतिप्रिय मुस्काए,

कुमकुमी उल्लास, गुनगुनाते प्रेम राग पधार रहे ऋतुराज मदन,

पधार गए रति नरेश मदन।।

और अब प्रस्तुत है अनुभा पाण्डे जी की रचना… लो दबे पाँव आ गया वसन्त है…

धरती की हरिता पर यौवन अनंत है,

दिनकर की छाँव में प्रस्फुटित मकरंद है, पल्लवित कोंपलों में मंद हलचल बंद है,

लो दबे पाँव आ गया बसंत है |

शुष्क पत्र के छोड़ गलीचे,

झुरमुट हटा निस्तेज डाल की,

उल्लास की पायल झनकाती,

नव-जीवन मदिरा छलकाती,

धनी चूनर पहने धरती सराबोर रसरंग है…

लो दबे पाँव आ गया बसंत है |

झूम रहीं डाली, कलियाँ,

पत्ते सर-सर कर डाल रहे,

खेतों में नाचे गेहूँ, सरसों,

नभचर उन्मुक्त हुए, गगन मानो तोल रहे,

धरती, बयार दोनों थिरक रहे संग हैं…

लो दबे पाँव आ गया बसंत है |

फिर से कोयल कूकेगी,

फिर से अमरायी फूटेगी,

ओट से जीवन झांकेगा,

शैथिल्य की तंद्रा टूटेगी,

सुप्त तम का क्षीण-क्षीण हो रहा अंत है…

लो दबे पाँव आ गया बसंत है |

नयनाभिराम, अनुपम ये दृश्य,

रति- मदन मगन कर रहे हों नृत्य,

देव वृष्टि कर रहे ज्यों पुष्य,

मधु-पर्व की रागिनी पर सृष्टि की लय- तरंग,

शीत के कपोल पर कल्लोल कर रहा बसंत है,

लो दबे पाँव आ गया बसंत है |

माँ झंकृत कर दो मन के तार,

अलंकृत हों उद्गार, विचार,

हे वीना- वादिनी! दे विद्या उपहार,

धनेश्वरी, वाक्येश्वरी माँ! प्रार्थना करबद्ध है…

लो दबे पाँव आ गया बसंत है |

लो दबे पाँव आ गया बसंत है ||

अब प्रस्तुत कर रहे हैं रूबी शोम द्वारा रचित ये अवधी गीत… आए गवा देखो वसन्त…
आय गवा देखो बसंत, पिया नहीं आए रे
देखो सखी मोर जिया, हाय घबराए रे -3
फूल गेंदवा से चोटी, मैंने सजाई रे,
देख देख दरपन मा खुद ही लजाई रे |
अंजन से आंख अपन आंज लिंहिं आज रे
पर मोर गुइयां देखो साजन अबहुं नहीं आए रे |
आय गवा देखो बसंत सखी पिया नहीं आए रे |
पियर पियर सारी और लाल च चटक ओढ़नी
पहिन मै द्वारे के ओट बार बार जाऊं रे |
आय गवा देखो बसंत पिया नहीं आए रे -3
पियर पियर बेर शिव जी को चढ़ाऊं रे
पूजा के बहाने अब तो पिया का पंथ निहारूं रे
आय गवा देखो बसंत पिया नहीं आए रे |
पांती लिख लिख भेज रही मै हृदय की ज्वाला जल रही
आ जाओ पिया फाग में रूबी तुमरी मचले रे |
आय गवा देखो बसंत पिया नहीं आए रे
देखो सखी मोर जिया हाय घबराए रे |
ये है नीरज सक्सेना की रचना… बसंत…
सखी आया वसंत सखी छाया वसंत
धरती से पतझड़ की सायें का अंत
बेलों में फूलों की खुशबू अनंत
सखी आया वसंत सखी छाया वसंत
रचा सरसों के खेतों में बासंती रंग
इठलाई अमुआ की डाली बौरों के संग
कोयलियां कि कुह कुह जगावें उमंग
सखी आया वसंत सखी छाया वसंत
बहे मंद मंद पवन लेके भीनी सुगंध
घटी सर्दी की चादर कुहासें का अंत
दिनकर की आभा से चमचम दिगंत
सखी आया वसंत सखी छाया वसंत
गूंजे भौरें की गुंजन मधुप चखें मरकंद
देख मौसम के रंग जुड़े प्रेम के प्रसंग
जगे आशा की किरणें जगे भाव जीवंत
सखी आया वसंत सखी छाया वसंत
बसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएं!

ये रचना श्री प्राणेन्द्र नाथ मिश्रा जी की है… आनन्द हो जीवन में…

नीरसता थी, नीरव था विश्व
हर ओर मौन छाया तब तक
मां सरस्वती की वीणा से
गूंजी झंकार नहीं जब तक |
अभिलाषा! ले आ राधातत्व
जीवन हो जाए कृष्ण भक्त,
शारदे की वीणा झंकृत हो
आलोक ज्ञान रस धरा सिक्त |
हो, कुसुम कली का कलरव हो
मन मारे हिलोरें दिशा दिशा
ढूंढती फिरे अमावस को
उत्सुक हो कर ज्योत्सना निशा |
झूमे पलाश, करे मंत्र पा
आहुति दे पवन, लिपट करके
नृत्यांगना बन कर वन देवी
नाचे पीपल से सिमट कर के |
यह पर्व है या यह उत्सव है
पावन मादकता है मन में
छूती वसंत की गलबहियां
कहतीं, आनंद हो जीवन में!

 

अब पढ़ते हैं नीरज सक्सेना जी की रचना… आया वसन्त…

सखी आया वसंत सखी छाया वसंत

धरती से पतझड़ की सायें का अंत

बेलों में फूलों की खुशबू अनंत

सखी आया वसंत सखी छाया वसंत

रचा सरसों के खेतों में बासंती रंग

इठलाई अमुआ की डाली बौरों के संग

कोयलियां कि कुह कुह जगावें उमंग

सखी आया वसंत सखी छाया वसंत

बहे मंद मंद पवन लेके भीनी सुगंध

घटी सर्दी की चादर कुहासें का अंत

दिनकर की आभा से चमचम दिगंत

सखी आया वसंत सखी छाया वसंत

गूंजे भौरें की गुंजन मधुप चखें मरकंद

देख मौसम के रंग जुड़े प्रेम के प्रसंग

जगे आशा की किरणें जगे भाव जीवंत

सखी आया वसंत सखी छाया वसंत

 

और अन्त में, डॉ रश्मि चौबे की रचना… देखो सखी, आया बसंत

यहाँ मौन निमंत्रण देता, देखो ,सखी आया बसंत !

धरती का यौवन देख सखी, फिर मुस्काया बसंत |

यहाँ मौन निमंत्रण देता, देखो, सखी आया बसंत |

वीणा वादिनी की धुन पर, कोकिला पंचम स्वर में गाती,

गुलाब सा चेहरा खिलाए, कोपलों से मेहंदी रचाती,

सरसों की ओढ़ चुनरिया, मलयगिरि संग चली है,

आम्र की डाल बौराई है, जैसे कंगना पहन चली है,

और स्वर्णिम रश्मियों से, नरमाई, कुछ शरमाई सी,

धरती का यौवन देख सखी, फिर मुस्काया बसंत |

हरियाली का लहंगा देखो, कितने रंगों से सजाया है,

पीली-पीली चोली देखो, गेंदों ने हार पहनाया है,

पाँव में छोटे फूल बिछे, जैसे कालीन बिछाया है,

देखो सब मदहोश हुए हैं, मदन ने तीर चलाया है,

आज वसुधा ने दुल्हन बन, बसंत से ब्याह रचाया है,

यहां मौन निमंत्रण देता, देखो फिर मुस्काया बसंत |

चलो सखी हम नृत्य करें, आओ यह त्योहार मनाते हैं,

मन सप्त स्वरों में गाता है, पग ठुमक- ठुमक अब जाता है,

राधा -श्याम की मुरली में, मेरा हृदय रम जाता है |

गुप्त नवरात्रों में माँ दुर्गे ने, योगियों के सहस्रार खिलाए है,

आ चल विवाह के मंडप में सखी, आत्मा को परमात्मा से मिलाएं |

संकलन – डॉ पूर्णिमा शर्मा…

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A tribute to Veteran Singer Lata Mangeshkar

from some of our Friends

अभी कल ही की तो बात है जब WOW India और साहित्य मुग्धा दर्पण द्वारा आयोजित वसन्तोत्सव में WOW India की अध्यक्ष डॉ लक्ष्मी ने लता जी का फिल्म “स्वप्न सुन्दरी” के लिया गाया कोयल के जैसा मधुर गीत “कुहू कुहू बोले कोयलिया” गाकर सुनाया था और हम सबने उनके शीघ्र स्वास्थ्य लाभ के लिए ईश्वर से प्रार्थना की थी… लेकिन ऐसा सम्भव न हो सका और लगभग एक महीने का जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष – और अन्त में विजय मृत्यु की हुई – जीवन हार गया – आज सुबह ही समाचार मिला कि लगभग एक महीने तक स्वास्थ्य लाभ के लिए संघर्ष कर रही स्वर कोकिला भारत रत्न लता मंगेशकर जी परम धाम को प्रस्थान कर गई हैं… वास्तव में सभी की आँखें नम हैं इस समाचार से… ऐसा लगता है जैसे भारत की आवाज़ ही कहीं गुम हो गई है… आजीवन स्वर की साधना में लीन रही लता मंगेशकर जी का निधन वास्तव में देश की कला और संस्कृति के लिए एक अपूरणीय क्षति है… किन्तु ये भी सत्य है कि ऐसी महान आत्माएँ कभी मरती नहीं… लता जी अपने स्वरों के माध्यम से सदा जीवित रहेंगी… नाम गुम जाएगा, चेहरा ये बदल जाएगा, मेरी आवाज़ ही पहचान है… ऐसे ही कला के साधकों के लिए लिखा गया है… वास्तव में समझ नहीं आ रहा कि माँ सरस्वती के प्रादुर्भाव के दूसरे दिन ही वाग्देवी की वरद पुत्री लता मंगेशकर जी के पार्थिव का पञ्चतत्व में विलीन हो जाना मात्र एक संयोग कहें या क्या कहें…? अश्रुपूरित नेत्रों से विदा देते हुए हमारे कुछ साथियों ने श्रद्धा सुमन समर्पित किये हैं दिवंगत आत्मा के प्रति…

सरस्वती विसर्जन वाले दिन ही आज की सरस्वती का निधन एक संयोग मात्र है या कोई ईश्वरीय तय घटना..🙏… सरिता रस्तोगी

 

Veteran Lata ji passed away on such an auspicious day of maà Saraswati s visarjan… RIP🙏🏻🙏🏻How symbolic… she was maà Saraswati ji herself…. सुनन्दा श्रीवास्तव

 

थम गई गीत की सुर सरिता

लय टूट गई, गति हुई मन्द

छन्दों  का मान करें अब क्या

हो गया बन्द हर पद्यबन्ध

माँ वाणी की वीणा निस्तब्ध

सूनी है गोद भारती की

कोकिला सदा के लिए सुप्त

कैसी आई ये ऋतु वसन्त

पर सदा प्रवाहित वह धारा

निःसृत जो कण्ठ से थी उसके

और सदा करेगा मान जगत

उस सरगम को जो हुई रुद्ध

माँ वाणी की मानस पुत्री कोकिलकण्ठी स्वर साम्राज्ञी भारत रत्न लता मंगेशकर जी को अश्रुपूर्ण भावभीनी श्रद्धांजलि…. डॉ पूर्णिमा शर्मा

 

माँ सरस्वती का पूजन कल, आज लता जी कर गई विकल।

स्वर कोकिला भी गईं निकल, श्रद्धा में नत हो खड़े सकल।

आँख में नीर भी भर लेना, वतन के लोगों ठहर लेना।

सुर साम्राज्ञी थी भर लेना, याद को उनकी लहर देना।

भारत रत्न वही पुरस्कार, शोभा उनसे मिलती अपार।

वो भी उनको रहता निहार, स्वर, गीत, ताल का कर विचार।

श्रद्धा से अर्पण करे फूल, सुर सागर की बनी मस्तूल।

संगीत के वन की शार्दूल, वो अमर गीत दे बनीं धूल।

करबद्ध हुए, दिल आहत है, शान्त ईश्वर करे, चाहत है।

दुख है पर नहीं मसाहत है, वो गीत बचे ये राहत है।

आँखों से बहा हर काजल है, सुर पर अब छाया बादल है।

शेखर दुख ये दावानल है, ये अश्रुपूर्ण श्रद्धा जल है।

डॉ हिमांशु शेखर, पुणे

 

लता ताई संगीत की पहचान थी

वह तो वाणी वीणा की प्राण थी

पीढ़ी दर पीढ़ी का मधुर गान थी

हर ह्रदय बसी स्वर लहरी तान थी

उनकी आवाज देश की पहचान थी

भोर की पहली किरण जिस स्वर से हमे जागती थी

दोपहर की धूप जिनकी तान से शीतलता बांट जाती थी

जिसके सतरंगी गीतों से सज के सांझ उतर आती थी

जिनकी मीठी लोरियों से अखियों में नींद पसर जाती थी

थकी देह जिनके गीतों को सुनके सुकून से सुस्ताती थी

थम गई मधुर आवाज जो हर मन उमंग जगाती थी

सर्द रातों में जिनके गीतों से गरमाहट सी आ जाती थी

रिमझिम बारिश को जो आवाज ख़ुशगवार बना जाती थी

वो प्यार का तराना वो माँ की लोरी के गीतों की थाती थी

वो देश को समर्पित वो भाई बहन के रिश्तों को जगाती थी

अर्चना आरती वो संदेशो के गीतों से मन मे उतर जाती थी

जिनकी स्वर लहरी बुझते रिश्तों मे भी उम्र बढ़ाती थी

जिनके गीत उम्र के आखरी पड़ाव को जवां बना जाती थी

थम गई वह आवाज जो हर उम्र उमंग जगाती थी

नीरज सक्सेना, ग़ाज़ियाबाद

 

शारदा विसर्जन का दिन है

संग चली गईं, सुर साम्राज्ञी,

चिन्मयी कोकिला कंठ दिव्य

मृणमयी माते की अनुरागी।

तुम कितना भी दूर रहो,

दीदी! न तुम्हें हम भूलेंगे

जब भी गूंजेंगे तुम्हारे स्वर

हम नमन तुम्हें कर छू लेंगे।

🙏भावभीनी श्रद्धांजलि🙏

पी एन मिश्रा, कोलकाता

 

अपूर्णीय क्षति, हमारे देश की कोकिला कंठी का जाना हृदय शोक से भर गया। अत्यंत दुखद ,उनकी कमी कोई नहीं पूरी कर पाएगा , परन्तु उनकी आवाज अजर,अमर रहेगी। ईश्वर उनकी आत्मा को श्री चरणों में स्थान दें।🙏

ॐ शांति 🙏नूतन शर्मा, दिल्ली