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There is victory beyond fear

डर के आगे जीत है

Katyayani Dr. Purnima Sharma
Katyayani Dr. Purnima Sharma

आज हर कोई डर के साए में जी रहा है | कोरोना ने हर किसी के जीवन में उथल पुथल मचाई हुई है | आज किसी को फोन करते हुए, किसी का मैसेज चैक करते हुए हर कोई डरता है कि न जाने क्या समाचार मिलेगा | जिससे भी बात करें हर दिन यही कहता मिलेगा कि आज उसके अमुक रिश्तेदार का स्वर्गवास हो गया कोरोना के कारण, आज उसका अमुक मित्र अथवा परिचित कोरोना की भेंट चढ़ गया | पूरे के पूरे परिवार कोरोना की चपेट में आए हुए हैं | हर ओर त्राहि त्राहि मची हुई है | साथ ही, जब समाचार मिलते हैं कि ऑक्सीजन की कमी है या लूट हो रही है, दवाओं की जमाखोरी के विषय में समाचार प्राप्त होते हैं तो इस सबको जानकार भयग्रस्त होना स्वाभाविक ही है | लेकिन हम एक कहावत भूल जाते हैं “जो डर गया वो मर गया” और “डर के आगे जीत है”… जी हाँ, डरने से काम नहीं चला करता | किसी भी बात से यदि हम भयभीत हो जाते हैं तो इसका अर्थ है कि हमारी संकल्प शक्ति दृढ़ नहीं है… और इसीलिए हम उस बीमारी को या जिस भी किसी बात से डर रहे हैं उसे अनजाने ही निमन्त्रण दे बैठते हैं… और समय से पूर्व ही हार जाते हैं… हम यह नहीं कहते कि कोरोना से डरा न जाए… बिल्कुल डरना चाहिए… लेकिन इसलिए नहीं कि हमें हो गया तो क्या हो गया… बल्कि इसलिए कि अपनी और दूसरों की सुरक्षा के लिए हम कोरोना के लिए बताए गए दिशा निर्देशों का कड़ाई से पालन करें…

डर तो किसी भी बात का हो सकता है | किसी को अपनी असफलता का भय हो सकता है, कोई भविष्य के विषय में चिन्तित हो सकता है, कोई रिजेक्ट किये जाने के भय से चिन्तित हो सकता है, किसी को अपना कुछ प्रिय खो जाने का भय हो सकता है, किसी को दुर्घटना का भय हो सकता है तो किसी को मृत्यु का भय और भी न जाने कितने प्रकार के भयों से त्रस्त हो सकता है | इसका परिणाम क्या होता है… कि हम अपना वर्तमान का सुख भी नहीं भोग पाते | जो व्यक्ति डर डर कर जीवन यापन करता है वह कभी प्रसन्न रह ही नहीं सकता |

हम अपने भयों से – परिस्थितियों से – पलायन कर जाना चाहते हैं | उनका सामना करने का साहस हम नहीं जुटा पाते | लेकिन हर समय डर डर कर जीना या परिस्थितियों से पलायन करना तो समस्या का समाधान नहीं | इससे तो परिस्थितियाँ और भी बिगड़ सकती हैं | क्योंकि नकारात्मकता नकारात्मकता को ही आकर्षित करती है – Negativity attracts negativity” इसलिए सकारात्मक सोचेंगे तो हमारे चारों ओर सकारात्मकता का एक सुरक्षा चक्र निर्मित हो जाएगा और हम बहुत सीमा तक बहुत सी दुर्घटनाओं से बच सकते हैं | प्रयोगों के द्वारा ये बात सिद्ध भी हो चुकी है अनेकों बार |

तो डर को दूर भगाने के लिए सबसे पहले हमें उसका सामना करने की सामर्थ्य स्वयं में लानी होगी | इसके लिए सबसे पहले हमें यह स्वीकार करना होगा कि हाँ हम भयग्रस्त हैं | और फिर जिस बात से भी हम डरे हुए हैं वह बात हमें कितना बड़ा आघात पहुँचा सकती है इस विषय में सोचना होगा कि यदि हम डरकर बैठ रहे तो हमारी हार होगी और उसका कितना बड़ा मूल्य हमें चुकाना पड़ सकता है | कितना कष्ट हमें उस परिस्थिति से हो सकता है जिसके विषय में सोच कर भी हमें डर लगता है इस विषय में भी सोचना होगा | और तब अपने भीतर से ही हममें साहस आएगा कि या तो हम उस परिस्थिति को आने ही न दें, और यदि आ भी जाए तो साहस के साथ उसका सामना करके उसे हरा सकें |

आज जिस प्रकार से ऑक्सीजन के लिए, दवाओं के लिए मारामारी मची हुई है वह सब भय के ही कारण है और उसका लाभ जमाखोरों और कालाबाज़ारी करने वालों को मिल रहा है | जिन लोगों को अभी कोरोना के लक्षण नहीं भी हैं या कम लक्षण हैं वे भी घबराकर दवाओं और ऑक्सीजन के लिए भागे भागे फिर रहे हैं | अस्पतालों में बेड के लिए भागे फिर रहे हैं | इन लोगों के डर के ही परिणामस्वरूप जमाखोरों और कालाबाज़ारी करने वालों की चाँदी हो रही है | जबकि डॉक्टर्स बार बार कह रहे हैं कि यदि हल्के से लक्षण हैं तो अस्पताल की तरफ मत देखिये – घर में रहकर ही डॉक्टर की बताई दवा समय पर लीजिये, प्राणायाम कीजिए, मास्क और साफ़ सफाई का ध्यान रखिये और सोशल डिस्टेंसिंग का पालन कीजिए – ऐसा करके आप घर में रहकर ही रोगमुक्त हो जाएँगे, और जमाखोरों तथा कालाबाज़ारी करने वालों को भी अवसर नहीं मिलेगा कि वे ऑक्सीजन और दवाओं को इकट्ठा करके मनमाने दामों में बेचकर जनता को लूट सकें | बीमारी की आग पर अपनी रोटियाँ सेंकने वाले राजनेताओं की बन आती है |

जिन लोगों ने इस आपदा के कारण अपने प्रियजनों को खोया है उनका कष्ट समझ में आता है | या जिन लोगों ने कोरोना को झेला है उनकी चिन्ता भी समझ में आती है | लेकिन यदि थोड़ी समझदारी और शान्ति से काम लिया जाए तो और अधिक नुकसान होने से बचाया जा सकता है | अभी दो दिन पहले सभी ने एक समाचार अवश्य देखा पढ़ा होगा कि किसी बुज़ुर्ग व्यक्ति ने एक युवक के लिए अस्पताल का अपना वो बेड छोड़ दिया जो उन्हें उनके परिवार वालों ने बड़ी भाग दौड़ के बाद दिलाया था | उनका कहना था कि “मैं तो अपना जीवन जी चुका, अब इन्हें इनका जीवन जीने देना है…” और घर वापस जाने के दो दिन बाद स्वर्ग सिधार गए | ये तो एक समाचार है, बहुत से ऐसे उदाहरण मानवता के आजकल सुर्ख़ियों में हैं |

रामायण में प्रसंग आता है कि अंगिरा और भृगुवंश के ऋषियों के कोप के कारण हनुमान जी अपनी शक्ति भुला बैठे थे | भगवान श्री राम ने जब उन्हें लंका जाने के लिए कहा तो उन्होंने असमर्थता प्रकट की | तब जामवन्त ने उनके गुणों का बखान उनके समक्ष किया और इस प्रकार उन्हें उनकी शक्ति का आभास कराया और वे “राम काज” करने में समर्थ हो सके | इसलिए व्यक्ति को अपनी सामर्थ्य कभी नहीं भूलनी चाहिए और समय पर उसका सदुपयोग करना चाहिए | और आज ये महामारी हमारे लिए जामवन्त बनकर आई है जो हमें सीख दे रही है कि हमें अपनी सामर्थ्य को नहीं भूलना चाहिए | और इस महामारी के समय सबसे बड़ी शक्ति यही है कि हम सभी सुरक्षा नियमों का पालन करें और यदि हलके लक्षण कोरोना के हैं भी तो घर में रहकर ही डॉक्टर की बताई दवा समय पर लें, अकारण ही घर से बाहर न जाएँ, मास्क लगाएँ, उचित दूरी बनाकर रखें, साफ सफाई का ध्यान रखें, एक दूसरे की सहायता के लिए आगे आएँ, वैक्सीन लें, बीमारी के सम्बन्ध में नकारात्मक तथा डराने वाले समाचारों को देखने सुनने से बचें… और सबसे बड़ी शक्ति ये कि घबराएँ नहीं और संकल्प शक्ति दृढ़ बनाए रहें ताकि कोरोना से लड़ाई में जीत सकें… माना अभी समय कुछ अच्छा नहीं है – लेकिन ये समय भी शीघ्र ही निकल जाएगा – इस प्रकार की सकारात्मकता का भाव बनाए रखें… क्योंकि सकारात्मकता किसी भी विपत्ति को दूर करने में सहायक होती है…

सुख जाता है दुःख को देकर, दुःख जाता है सुख को देकर |

सुख देकर जाने वाले से डरना क्या इस जीवन में ||

__________________कात्यायनी

bookmark_borderHanuman Jayanti

Hanuman Jayanti

Katyayani Dr. Purnima Sharma
Katyayani Dr. Purnima Sharma

हनुमान जयन्ती

आज चैत्र पूर्णिमा है… और कोविड महामारी के बीच आज विघ्नहर्ता मंगल कर्ता हनुमान जी – जो लक्ष्मण की मूर्च्छा दूर करने के लिए संजीवनी बूटी का पूरा पर्वत ही उठाकर ले आए थे… जिनकी महिमा का कोई पार नहीं… की जयन्ती है… जिसे पूरा हिन्दू समाज भक्ति भाव से मनाता है… कल दिन में बारह बजकर पैंतालीस मिनट के लगभग पूर्णिमा तिथि का आगमन हुआ था और आज प्रातः नौ बजे तक ही पूर्णिमा तिथि थी, लेकिन उदया तिथि होने के कारण आज हनुमान जन्म महोत्सव मनाया जा रहा है… मान्यता है कि सूर्योदय काल में हनुमान जी का जन्म हुआ था… आज पाँच बजकर चौवालीस मिनट पर सूर्योदय हुआ है… अस्तु, सर्वप्रथम सभी को श्री रामदूत हनुमान जी की जयन्ती की हार्दिक शुभकामनाएँ… इस भावना के साथ कि जिस प्रकार पग पग पर भगवान श्री राम के मार्ग की बाधाएँ उन्होंने दूर कीं… जिस प्रकार लक्ष्मण को पुनर्जीवन प्राप्त करने में सहायक हुए… उसी प्रकार आज भी समस्त संसार को कोरोना महामारी से मुक्त होने में सहायता करें… अपनी कृपा से जन जन का मनोबल इतना सुदृढ़ कर दें कि हर कोई मन में बस यही संकल्प ले कि कोरोना को हराना है… क्योंकि संकल्प की ही विजय होती है…

बुद्धिर्बलं यशो धैर्यं निर्भयत्वमरोगता |

अजाड्यं वाक्पटुत्वं च हनूमत्स्मरणाद्भवेत् ||

हनुमान जी का स्मरण करने से हमारी बुद्धि, बल, यश, धैर्य, निर्भयता, आरोग्य, विवेक और वाक्पटुता में वृद्धि हो |

मनोजवं मारुततुल्यवेगम्, जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम् |

वातात्मजं वानरयूथमुख्यं, श्री रामदूतं शरणं प्रपद्ये ||

हम उन वायुपुत्र श्री हनुमान के शरणागत हैं जिनकी गति का वेग मन तथा मरुत के समान है, जो जितेन्द्रिय हैं, बुद्धिमानों में श्रेष्ठ हैं, वानरों की सेना के सेनापति हैं तथा भगवान् श्री राम के दूत हैं |

अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं, दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम् |

सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं, रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि ||

अत्यन्त बलशाली, स्वर्ण पर्वत के समान शरीर से युक्त, राक्षसों के काल, ज्ञानियों में अग्रगण्य, समस्त गुणों के भण्डार, समस्त वानर कुल के स्वामी तथा रघुपति के प्रिय भक्त वायुपुत्र हनुमान को हम नमन करते हैं |

हनुमानद्द्रजनीसूनुर्वायुपुत्रो महाबलः, रामेष्टः फाल्गुनसखः पिङ्गाक्षोऽमितविक्रम: |

Hanuman Jayanti ki hardik shubhkamnaein
Hanuman Jayanti ki hardik shubhkamnaein

उदधिक्रमणश्चैव सीताशोकविनाशनः, लक्ष्मणप्राणदाता च दशग्रीवस्य दर्पहा ||

एवं द्वादशनामानि कपीन्द्रस्य महात्मनः,

स्वापकाले प्रबोधे च यात्राकाले च यः पठेत्‌ |

तस्य सर्वभयं नास्ति रणे च विजयी भवेत्‌ ||

हनुमान, अंजनिपुत्र, वायुपुत्र, महाबली, रामप्रिय, अर्जुन (फाल्गुन) के मित्र, पिंगाक्ष – भूरे नेत्र वाले, अमित विक्रम अर्थात महान प्रतापी, उदधिक्रमण: – समुद्र को लाँघने वाले, सीता जी के शोक को नष्ट करने वाले, लक्ष्मण को जीवन दान देने वाले तथा रावण के घमण्ड को चूर्ण करने वाले – ये कपीन्द्र के बारह नाम हैं | रात्रि को शयन करने से पूर्व, प्रातः निद्रा से जागने पर तथा यात्रा आदि के समय जो व्यक्ति हनुमान जी के इन बारह नामों का पाठ करता है उसे किसी प्रकार का भय नहीं रहता तथा विजय प्राप्त होती है |

आज की इस भयंकर आपदा के समय में मंगल रूप हनुमान सबका मंगल करें… सभी को एक बार पुनः हनुमान जयन्ती की हार्दिक शुभकामनाएँ…

__________________कात्यायनी…

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Corona and Mahaveer Jayanti

कोरोना और महावीर जयन्ती

Katyayani Dr. Purnima Sharma
Katyayani Dr. Purnima Sharma

जय श्री वर्द्ध्मानाय स्वामिने विश्ववेदिने

नित्यानन्द स्वभावाय भक्तसारूप्यदायिने |

धर्मोSधर्मो ततो हेतु सूचितौ सुखदुःखयो:

पितु: कारण सत्त्वेन पुत्रवानानुमीयते ||

आज चैत्र शुक्ल त्रयोदशी है – भगवान् महावीर स्वामी की जयन्ती का पावन पर्व | तो सबसे पहले तो सभी को महावीर जयन्ती की हार्दिक शुभकामनाएँ… हमें याद है हमारे पितृ नगर नजीबाबाद में – जहाँ जैन लोग बहुत अधिक तादाद में हैं… महावीर जयन्ती के अवसर पर जैन मन्दिर में बहुत बड़ा आयोजन प्रातः से सायंकाल तक चलता था… जैन अध्येता होने के कारण हमें भी वहाँ बुलाया जाता था… और सच में बहुत आनन्द आता था… दिल्ली में भी कई बार महावीर जयन्ती के कार्यक्रमों में भाग लेने का सौभाग्य प्राप्त हुआ…

सभी जानते हैं कि महावीर स्वामी जैन धर्म के चौबीसवें और अन्तिम तीर्थंकर थे | अब तीर्थंकर किसे कहते हैं ? तीर्थं करोति स तीर्थंकर: – अर्थात जो अपनी साधना के माध्यम से स्वयं संसार सागर से पार लगाने वाले तीर्थों का निर्माण करें वह तीर्थंकर | तीर्थंकर का कर्तव्य होता है कि वे अन्यों को भी आत्मज्ञान के मार्ग पर अग्रसर करने का प्रयास करें | इसी क्रम में प्रथम तीर्थंकर हुए आचार्य ऋषभदेव और अन्तिम अर्थात चौबीसवें तीर्थंकर हुए भगवान् महावीर – जिनका समय ईसा से 599-527 वर्ष पूर्व माना जाता है | णवकार मन्त्र में सभी तीर्थंकरों को नमन किया गया है “ॐ णमो अरियन्ताणं” | समस्त जैन आगम अरिहन्तों द्वारा ही भाषित हुए हैं |

जैन दर्शन मानता है कि प्रत्येक वस्तु अनन्तधर्मात्मक है और संसार की समस्त वस्तुएँ सदसदात्मक हैं | जैन दर्शन हमारे विचार से पूर्ण रूप से सम सामयिक दृष्टि है… सम्यग्दर्शन, सम्यग्चरित्र तथा सम्यग्चिन्तन की भावना पर सबसे अधिक बल जैन दर्शन में ही दिया गया है… और आज जिस प्रकार से सामाजिक परिदृश्य में, राजनीतिक परिदृश्य में, यहाँ तक कि पारिवारिक परिदृश्य में भी जिस प्रकार से एक असहमति, कुण्ठा आदि का विकृत रूप देखने को मिलता है उससे यदि मुक्ति प्राप्त हो सकती है तो वहाँ केवल ये सम्यग्दर्शन, सम्यक्चरित्र और सम्यक्चिन्तन की भावनाएँ ही काम आएँगी… समस्त संसार यदि सम्यग्दर्शन, सम्यग्चरित्र तथा सम्यग्चिन्तन की भावना को अंगीकार कर ले तो बहुत सी समस्याओं से मुक्ति प्राप्त हो सकती है – क्योंकि इस स्थिति में समता का भाव विकसित होगा और फिर किसी भी प्रकार की ऊँच नीच अथवा किसी भी प्रकार के ईर्ष्या द्वेष क्रोध घृणा इत्यादि के लिए कोई स्थान ही नहीं रह जाएगा…

ये तो हुआ दार्शनिक पक्ष | व्यावहारिक और सामाजिक पक्ष की यदि बात करें तो अपरिग्रह, अहिंसा, संयम और सेवा आदि जितने भी व्यवहारों पर भगवान महावीर स्वामी ने बल दिया है वे सभी न केवल वर्तमान कोरोना काल में, अपितु सदा के लिए मनुष्य के स्वास्थ्य के लिए उपयोगी हैं | जैसे…

अहिंसा – अर्थात किसी प्रकार की मनसा वाचा कर्मणा हिंसा का त्याग करें | परस्पर मैत्री भाव रखते हुए कोरोना के सम्बन्ध में जो दिशा निर्देश दिए गए हैं उनका पालन करेंगे तो इस आपदा के समय अपना स्वयं का बचाव करते हुए एक दूसरे के सहायक सिद्ध हो सकते हैं | लॉकडाउन में आवश्यक होने पर यदि किसी कार्य से घर से बाहर निकलना भी पड़ जाता है तो शान्ति बनाए रहे, यहाँ वहाँ हमारी सुरक्षा के लिए तत्पर पुलिस के समक्ष भी विनम्र रहें, उनसे झगड़ने की अपेक्षा उनके बताए दिशा निर्देशों का पालन करें ताकि स्थिति उग्र न हो और किसी प्रकार की अहिंसा की स्थिति उत्पन्न न होने पाए |

अपरिग्रह – अभी तो हमारे लिए कोरोना परिग्रह बना हुआ है – सारे संसार को इसने बन्धक बनाया हुआ है | तो क्यों न कुछ समय के लिए अपनी सभी इच्छाओं का त्याग करके केवल सीमित मूलभूत आवश्यकताओं की ही पूर्ति पर ध्यान दिया जाए – वो भी मिल बाँटकर ? आजकल इस प्रकार के समाचार भी प्राप्त हो रहे हैं कि कुछ व्यक्तियों ने दवाओं आदि को अपने घरों में स्टोर करना आरम्भ कर दिया है कि न जाने कब आवश्यकता पड़ जाए | अनावश्यक रूप से किसी वस्तु को अपने पास रखना ही परिग्रह कहलाता है | क्योंकि प्रस्तरकालीन मानव की ही भाँति आज कुछ व्यक्तियों की सोच यही बन चुकी है कि पहले स्वयं को बचाएँ, दूसरों के साथ चाहे जो हो | इस भावना से मुक्ति प्राप्त करने के लिए अपरिग्रह का आचरण अपनाने की आवश्यकता है |

सेवा – यदि हम सम्यग्दर्शन, सम्यग्चरित्र तथा सम्यग्चिन्तन के सिद्धान्त का पालन करेंगे तो सबको एक समान मानते हुए असहाय तथा अशक्त व्यक्तियों की सहायता के लिए भी आगे आ सकेंगे – और वह भी किसी पुरूस्कार अथवा नाम के लिए नहीं – न ही इसलिए कि सेवा करते हुए समाचार पत्रों में हमारे चित्र प्रकाशित हो जाएँगे | क्योंकि वास्तविक सेवा वह होती है कि जिसका किसी को पता भी न चल सके – जैसे कहा जाता है कि दान इस प्रकार होना चाहिए कि एक हाथ दान करे तो दूसरे हाथ को उसका भान भी न होने पाए | आज सेवाकार्य करते हुए चित्र खिंचवाना तथा उन्हें सोशल नेटवर्किंग पर पोस्ट करने की जैसे एक होड़ सी लगी हुई है | वास्तव में सेवाकार्य करना चाहते हैं तो इस भावना से ऊपर उठने की आवश्यकता है |

संयम – महावीर स्वामी का एक सिद्धान्त संयम का आचरण भी है | संकट की घड़ी है, जन साधारण के धैर्य की परीक्षा का समय है यह | कोरोना को हराना है तो धैर्य के साथ घरों में रहने की आवश्यकता है | अनावश्यक रूप से घरों से बाहर निकलेंगे तो अपने साथ साथ दूसरों के लिए भी समस्या बन सकते हैं | कोरोना के लक्षण दिखाई दें तो भी धैर्य के साथ – संयम के साथ विचार चिकित्सक से सम्पर्क साधें ताकि समय पर उचित चिकित्सा उपलब्ध हो सके |

और सबसे अन्त में लेकिन सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण मुखवस्त्रिका अर्थात मास्क | भगवान महावीर के अन्तिम सूत्र में मुखवस्त्रिका का वर्णन है | मुख में वायु के माध्यम से किसी भी प्रकार के जीव का प्रवेश होकर उसकी हिंसा न हो जाए इस भावना से मुखवस्त्रिका को आवश्यक बताया गया था – जो कि कोरोना की रोकथाम में सबसे बड़ी आवश्यकता बन गई है | साथ ही बार बार हाथ मुँह धोना और बाहर से आई प्रत्येक वस्तु को भी सेनिटायिज़ करके अर्थात साफ़ करके उपयोग में लाना – इसका भी यही उद्देश्य था कि किसी प्रकार के कीटाणु उस वस्तु में न रह जाएँ |

वे सभी सम्यग्दर्शन, सम्यग्चरित्र तथा सम्यग्चिन्तन के अन्तर्गत ही आते हैं | महावीर जयन्ती के इस अवसर पर यदि हम इनका पालन करने का संकल्प ले लें तो कोरोना जैसी महामारी से मुक्त होने में सहायता प्राप्त हो सकती है |

तो इस प्रकार की उदात्त भावनाओं का प्रसार करने वाले भगवान महावीर को नमन करते हुए प्रस्तुत हैं कुछ पंक्तियाँ…

हे महावीर शत नमन तुम्हें, शत वार तुम्हें है नमस्कार  

तुम्हारी कर्म श्रृंखला देव हमारी संस्कृति का श्रृंगार |

हे महावीर श्रद्धा से नत शत वार तुम्हें है नमस्कार

जो पथ दिखलाया तुमने वह है सकल मनुजता का आधार ||

तुमने दे दी हर प्राणी को जीवन जीने की अभिलाषा

ममता के स्वर में समझा दी मानव के मन की परिभाषा |

बन गीत और संगीत जगत को हर्ष दिया तुमने अपार

हे महावीर श्रद्धा से नत शत वार तुम्हें है नमस्कार ||

तुमको पाकर रानी त्रिशला के संग धरती माँ धन्य हुई

Mahaveer Jayanti
Mahaveer Jayanti

विन्ध्याचल पर्वत से कण कण में करुणाभा फिर व्याप्त हुई |

तुमसे साँसों को राह मिली, जग में अगाध भर दिया प्यार

हे महावीर श्रद्धा से नत शत वार तुम्हें है नमस्कार ||

तुम श्रम के साधक, कर्म विजेता, आत्मतत्व के ज्ञानी तुम

सम्यक दर्शन, सम्यक चरित्र और अनेकान्त के साधक तुम |

सुख दुःख में डग ना डिगें कभी, समता का तुमने दिया सार

हे महावीर श्रद्धा से नत शत वार तुम्हें है नमस्कार ||

हे महावीर शत नमन तुम्हें, शत वार तुम्हें है नमस्कार 

तुम्हारी कर्म श्रृंखला देव हमारी संस्कृति का श्रृंगार |

हे महावीर श्रद्धा से नत शत वार तुम्हें है नमस्कार

जो पथ दिखलाया तुमने वह है सकल मनुजता का आधार ||

अस्तु, भगवान महावीर स्वामी के सिद्धान्तों का पालन करते हुए सुरक्षा निर्देशों का पालन करते हुए सभी स्वस्थ रहें… सुरक्षित रहें… इसी कामना के साथ सभी को महावीर जयन्ती की हार्दिक शुभकामनाएँ…

______________कात्यायनी…

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Earth Day

पृथिवी दिवस

आज समूचा विश्व पृथिवी दिवस यानी Earth Day मना रहा है | आज प्रातः से ही पृथिवी दिवस के सम्बन्ध में सन्देश आने आरम्भ हो गए थे | कुछ संस्थाओं ने तो वर्चुअल

Katyayani Dr. Purnima Sharma
Katyayani Dr. Purnima Sharma

मीटिंग्स यानी वेबिनार्स भी आज आयोजित की हैं पृथिवी दिवस के उपलक्ष्य में – क्योंकि कोरोना के कारण कहीं एक स्थान पर एकत्र तो हुआ नहीं जा सकता | ये समस्त कार्यक्रम पृथिवी के पर्यावरण में बढ़ते प्रदूषण से मुक्ति प्राप्त करने तथा समाज में जागरूकता उत्पन्न करने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण प्रयास है | किन्तु, यहाँ विचारणीय बात ये है कि भारतीय समाज में – विशेष रूप से वैदिक समाज में – तो सदा से हर दिन पृथिवी दिवस होता था, तो आज इस प्रकार के आयोजनों की आवश्यकता किसलिए प्रतीत होती है | अथर्व वेद में तो एक समग्र सूक्त ही पृथिवी के सम्मान में समर्पित है | वैदिक विधि विधान पूर्वक कोई भी पूजा अर्चना करें – पृथिवी की पूजा आवश्यक रूप से की जाती है – ससम्मान पृथिवी का आह्वाहन और स्थापन किया जाता है –

ॐ पृथिवी त्वया धृता लोका देवि त्वं विष्णुना धृता |

त्वां च धारय मां भद्रे पवित्रं कुरु चासनम्

पृथिव्यै नमः आधारशक्तये नमः

अर्थात, हे पृथिवी तुमने समस्त लोकों को धारण किया हुआ है और तुम्हें भगवान विष्णु ने धारण किया हुआ है | तुम मुझे धारण करो, और इस आसन को पवित्र करो | आधार शक्ति पृथिवी को नमस्कार है |

अथर्ववेद के भूमि सूक्त में कहा गया है “देवता जिस भूमि की रक्षा उपासना करते हैं वह भूमि हमें मधु सम्पन्न करे | इस पृथ्वी का हृदय परम आकाश के अमृत से सम्बन्धित  रहता है | यह पृथ्वी हमारी माता है और हम इसकी सन्तानें हैं “माता भूमि पुत्रो अहं पृथिव्या: |

पृथिवी पर्यावरण का महत्त्वपूर्ण अंग है ये हम सभी जानते हैं | जिस पर प्राणी निवास करते हैं तथा जीवन प्राप्त करते हैं वह भूमि निश्चित रूप से वन्दनीय तथा उपयोगी है | यही कारण है वैदिक वांग्मय में पृथिवी के सम्मान में अनेक मन्त्र उपलब्ध होते हैं | वैदिक ऋषि क्षमायाचना के साथ पृथिवी पर चरण रखते थे…

समुद्रवसने देवि, पर्वतस्तनमण्डिते | विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं, पादस्पर्शं क्षमस्व मे ||

अर्थात हे समुद्र में निवास करने वाली देवी, पर्वतरूपी स्तनों को धारण करने वाली, विष्णुपत्नी हम आपका अपने चरणों से स्पर्श कर रहे हैं – हमें इसके लिए क्षमा कीजिए |

इसके अतिरिक्त अनेकों मन्त्र पृथिवी की उपासना स्वरूप उपलब्ध होते हैं, यथा…

भूमे मातर्निधेहि मा भद्रया सुप्रतिष्ठितम् |

संविदाना दिवा कवे श्रियां मा धेहि भूत्याम् ||

हे धरती माता मुझे कल्याणमय  बुद्धि के साथ स्थिर बनाए रखें | हे गतिशीले (जो प्राणिमात्र को गति प्रदान करती है), प्रकाश के साथ संयुत होकर मुझे श्री और विभूति में धारण करो |

सत्यं बृहदृतमुग्रं दीक्षा तपो ब्रह्म यज्ञः पृथिवीं धारयन्ति |
सा नो भूतस्य भव्यस्य पत्न्युरुं लोकं पृथिवी नः कृणोतु ||

पृथ्वी के लिए नमस्कार है जो सत्य, ऋत अर्थात अपरिवर्तनीय तथा सर्वशक्तिमान परब्रहम में विद्यमान आध्यात्मिक शक्ति, ऋषियो मुनियों की समर्पण भाव से किये गये यज्ञ और तप की शक्ति से अनन्तकाल से संरक्षित है | यह पृथिवी हमारे भूत और भविष्य की साक्षी है और सहचरी है | यह हमारी आत्मा को इस लोक से उस दिव्य लोक की ओर ले जाए |

असंबाधं बध्यतो मानवानां यस्या उद्वतः प्रवतः समं बहु |
नानावीर्या ओषधीर्या बिभर्ति पृथिवी नः प्रथतां राध्यतां नः ||                     

यह अपने पर्वतों, ढालानों तथा मैदानों के माध्यम से समस्त जीवों के लिए निर्बाध स्वतन्त्रता प्रदान करती हुई अनेकों औषधियों को धारण करती है | यह हमें समृद्ध और स्वस्थ बनाए रखे |

यस्यां समुद्र उत सिन्धुरापो यस्यामन्नं कृष्टयः संबभूवुः |
यस्यामिदं जिन्वति प्राणदेजत्सा नो भूमिः पूर्वपेये दधातु || 

समुद्र तथा नदियों के जल से सिंचित क्षेत्रों के माध्यम से अन्न प्रदान करने वाली पृथिवी हमें जीवन का अमृत प्रदान करे |

यस्यां पूर्वे पूर्वजना विचक्रिरे यस्यां देवा असुरानभ्यवर्तयन् |
      गवामश्वानां वयसश्च विष्ठा भगं वर्चः पृथिवी नो दधातु ||

आदिकाल से हमारे पूर्वज इस पर विचरण करते रहे हैं | इस पर सत्व ने तमस को पराजित किया है | इस पर समस्त जीव जंतु और पशु आदि पोषण प्राप्त करते हैं | यह पृथिवी हमें समृद्धि तथा वैभव प्रदान करे |

गिरयस्ते पर्वता हिमवन्तोऽरण्यं ते पृथिवि स्योनमस्तु |
बभ्रुं कृष्णां रोहिणीं विश्वरूपां ध्रुवां भूमिं पृथिवीमिन्द्रगुप्ताम् |
अजीतेऽहतो अक्षतोऽध्यष्ठां पृथिवीमहम् ||  

हे माता, आपके पर्वत, हिमाच्छादित हिमश्रृंखलाएँ तथा घने वन घने जंगल हमें शीतलता तथा सुख प्रदान करें | अपने अनेक वर्णों के साथ आप विश्वरूपा हैं | आप ध्रुव की भाँति अचल हैं तथा इन्द्र द्वारा संरक्षित हैं | आप अविजित हैं अचल हैं और हम आपके ऊपर दृढ़ता से स्थिर रह सकते हैं |

अथर्ववेद के भूमि सूक्त से इन कुछ मन्त्रों को उद्धत करने से हमारा अभिप्राय मात्र यही था कि जिस पृथिवी को माता के सामान – देवी के समान पूजा जाता था – क्या कारण है कि आज उसी की सुरक्षा के लिए इस प्रकार के “पृथिवी दिवस” का आयोजन करने की आवश्यकता उत्पन्न हो गई |

इसका कारण हम स्वयं हैं | पूरे विश्व में आज यानी 22 अप्रैल को विश्व पृथिवी दिवस मनाया जाता है | इसका आरम्भ 1970 में हुआ था तथा इसका उद्देश्य था जन साधारण को पर्यावरण के प्रति सम्वेदनशील बनाना | पृथिवी पर जो भी प्राकृतिक आपदाएँ आती हैं उन सबके लिए मनुष्य स्वयं ज़िम्मेदार है – फिर चाहे वह ओजोन परत में छेद होना हो, भयंकर तूफ़ान या सुनामी हो, या आजकल जैसे कोरोना ने आतंक मचाया हुआ ऐसा ही किसी महामारी का आतंक – सब कुछ के लिए मानव स्वयं ज़िम्मेदार है | यदि ये आपदाएँ इसी प्रकार आती रहीं तो पृथिवी से समस्त जीव जन्तुओं का – समस्त वनस्पतियों का अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा | इसी सबको ध्यान में रखते हुए पृथिवी दिवस मनाना आरम्भ किया गया |

आज पृथिवी के पर्यावरण में प्रदूषण के कारण पृथिवी का वास्तविक स्वरूप नष्ट होता जा रहा है | और इस प्रदूषण के प्रमुख कारणों से हम सभी परिचित हैं – जैसे जनसंख्या में वृद्धि, बढ़ता औद्योगीकरण, शहरीकरण में वृद्धि तथा यत्र तत्र फैलता जाता कचरा इत्यादि इत्यादि | पोलीथिन का उपयोग, ग्लोबल वार्मिंग आदि के कारण अनियमित होती ऋतुएँ और मौसम | आज हमें समाज की चिन्ता न होकर स्वयं की सुविधाओं की चिन्ता कहीं बहुत अधिक है | जैसे जैसे मनुष्य प्रगति पथ पर अग्रसर होता जा रहा है वैसे वैसे पर्यावरण की ओर से उदासीन होता जा रहा है | अर्थात हम स्वयं ही पृथिवी के इस पर्यावरण के लिए ज़िम्मेदार हैं |

इस प्रकार हम तो यही कहेंगे कि पृथिवी दिवस केवल एक आयोजन की औपचारिकता मात्र तक सीमित न रहने देकर यदि हर दृष्टिकोण से परस्पर एकजुट होकर चिन्तन मनन किया जाए तथा प्रयास किया जाए तभी हम पृथिवी को पुनः उसी रूप में देखने में समर्थ हो सकेंगे | और यह कार्य केवल पृथिवी दिवस के दिन ही न करके अपनी दैनिक दिनचर्या का महत्त्वपूर्ण अंग बना लें तभी हम अपनी धरती माँ का ऋण चुका सकेंगे |

___________________कात्यायनी

bookmark_borderThe Spiritual Aspect of Durga Saptshati

The Spiritual Aspect of Durga Saptshati

दुर्गा सप्तशती का आध्यात्मिक रहस्य

आज चैत्र नवरात्रों का समापन हुआ है | इस वर्ष भी गत वर्ष की ही भाँति कन्या पूजन नहीं कर सके – कोरोना के चलते सब कुछ बन्द ही रहा | आज सभी जानते हैं कि ऐसी

Katyayani Dr. Purnima Sharma
Katyayani Dr. Purnima Sharma

स्थिति है कि बहुत से परिवारों में तो पूरा का पूरा परिवार ही कोरोना का कष्ट झेल रहा है | किन्तु इतना होने पर भी उत्साह में कहीं कोई कमी नहीं रही – और यही है भारतीय जन मानस की सकारात्मकता | कोई बात नहीं, माँ भगवती की कृपा से अगले वर्ष सदा की ही भाँति नवरात्रों का आयोजन होगा |

पूरे नवरात्रों में भक्ति भाव से दुर्गा सप्तशती में वर्णित देवी की तीनों चरित्रों – मधुकैटभ वध, महिषासुर वध और शुम्भ निशुम्भ का उनकी समस्त सेना के सहित वध की कथाओं का पाठ किया जाता है | इन तीनों चरित्रों को पढ़कर इहलोक में पल पल दिखाई देने वाले अनेकानेक द्वन्द्वों का स्मरण हो आता है | किन्तु देवी के ये तीनों ही चरित्र इस लोक की कल्पनाशीलता से बहुत ऊपर हैं | दुर्गा सप्तशती किसी लौकिक युद्ध का वर्णन नहीं, वरन् एक अत्यन्त दिव्य रहस्य को समेटे उपासना ग्रन्थ है |

गीता ग्रन्थों में जिस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीता ज्ञानकाण्ड का सर्वोपयोगी और लोकप्रिय ग्रन्थ है, उसी प्रकार दुर्गा सप्तशती ज्ञानकाण्ड और कर्मकाण्ड का सर्वोपयोगी और लोकप्रिय ग्रन्थ है | यही कारण है कि लाखों मनुष्य नित्य श्रद्धा-भक्ति पूर्वक इसका पाठ और अनुष्ठान आदि करते हैं | इतना ही नहीं, संसार के अन्य देशों में भी शक्ति उपासना किसी न किसी रूप में प्रचलित है | यह शक्ति है क्या ? शक्तिमान का वह वैशिष्ट्य जो उसे सामान्य से पृथक् करके प्रकट करता है शक्ति कहलाता है | शक्तिमान और शक्ति वस्तुतः एक ही तत्व है | तथापि शक्तिमान की अपेक्षा शक्ति की ही प्रमुखता रहती है | उसी प्रकार जैसे कि एक गायक की गायन शक्ति का ही आदर, उपयोग और महत्व अधिक होता है | क्योंकि संसार गायक के सौन्दर्य आदि पर नहीं वरन् उसकी मधुर स्वर सृष्टि के विलास में मुग्ध होता है | इसी प्रकार जगन्नियन्ता को उसकी जगत्कर्त्री शक्ति से ही जाना जाता है | इसी कारण शक्ति उपासना का उपयोग और महत्व शास्त्रों में स्वीकार किया गया है |

उपासना केवल सगुण ब्रह्म की ही हो सकती है | क्योंकि जब तक द्वैत भाव है तभी तक उपासना सम्भव है | द्वित्व समाप्त हो जाने पर तो जीव स्वयं ब्रह्म हो जाता – अहम् ब्रह्मास्मि की भावना आ जाने पर व्यक्ति समस्त प्रकार की उपासना आदि से ऊपर उठ जाता है | द्वैत भाव का आधार सगुण तत्व है | सगुण उपासना के पाँच भेद बताए गए हैं – चित् भाव, सत् भाव, तेज भाव, बुद्धि भाव और शक्ति भाव | इनमें चित् भाव की उपासना विष्णु उपासना है | सत् भावाश्रित उपासना शिव उपासना है | भगवत्तेज की आश्रयकारी उपासना सूर्य उपासना होती है | भगवद्भाव से युक्त बुद्धि की आश्रयकारी उपासना धीश उपासना होती है | तथा भगवत्शक्ति को आश्रय मानकर की गई उपासना शक्ति उपासना कहलाती है | यह सृष्टि ब्रह्मानन्द की विलास दशा है | इसमें ब्रह्म पद से घनिष्ठ सम्बन्ध रखने वाले पाँच तत्व हैं – चित्, सत्, तेज, बुद्धि और शक्ति | इनमें चित् सत्ता जगत् को दृश्यमान बनाती है | सत् सत्ता इस दृश्यमान जगत् के अस्तित्व का अनुभव कराती है | तेज सत्ता के द्वारा जगत् का ब्रह्म की ओर आकर्षण होता है | बुद्धि सत्ता ज्ञान प्रदान करके इस भेद को बताती है कि ब्रह्म सत् है और जगत् असत् अथवा मिथ्या है | और शक्ति सत्ता जगत् की सृष्टि, स्थिति तथा लय कराती हुई जीव को बद्ध भी कराती है और मुक्त भी | उपासक इन्हीं पाँचों का अवलम्बन लेकर ब्रह्मसान्निध्य प्राप्त करता हुआ अन्त में ब्रह्मरूप को प्राप्त हो जाता है |

शक्ति उपासना वस्तुतः यह ज्ञान कराती है कि यह समस्त दृश्य प्रपंच ब्रहम शक्ति का ही विलास है | यही ब्रह्म शक्ति सृष्टि, स्थिति तथा लय कराती है | एक ओर जहाँ यही ब्रह्मशक्ति अविद्या बनकर जीव को बन्धन में बाँधती है, वहीं दूसरी ओर यही विद्या बनकर जीव को ब्रह्म साक्षात्कार करा कर उस बन्धन से मुक्त भी कराती है | जिस प्रकार गायक और उसकी गायन शक्ति एक ही तत्व है, उसी प्रकार ब्रह्म और ब्रह्म शक्ति में “अहं ममेति” जैसा भेद नहीं है | वेद और शास्त्रों में इस ब्रह्म शक्ति के चार प्रकार बताए गए हैं | जो निम्नवत् हैं :

तुरीया शक्ति – यह प्रकार ब्रह्म में सदा लीन रहने वाली शक्ति का है | यही ब्रह्मशक्ति स्व-स्वरूप प्रकाशिनी होती है | वास्तव में सगुण और निर्गुण का जो भेद है वह केवल ब्रह्म शक्ति की महिमा के ही लिये है | जब तक महाशक्ति स्वरूप के अंक में छिपी रहती है तब तक सत् चित् और आनन्द का अद्वैत रूप से एक रूप में अनुभव होता है | वह तुरीया शक्ति जब स्व-स्वरूप में प्रकट होकर सत् और चित् को अलग अलग दिखाती हुई आनन्द विलास को उत्पन्न करती है तब वह पराशक्ति कहाती है | वही पराशक्ति जब स्वरूपज्ञान उत्पन्न कराकर जीव के अस्तित्व के साथ स्वयं भी स्व-स्वरूप में लय हो निःश्रेयस का उदय करती है तब उसी को पराविद्या कहते हैं |

कारण शक्ति – अपने नाम के अनुरूप ही यह शक्ति ब्रह्मा-विष्णु-महेश की जननी है | यही निर्गुण ब्रह्म को सगुण दिखाने का कारण है | यही कभी अविद्या बनकर मोह में बाँधती है, और यही विद्या बनकर जीव की मुक्ति का कारण भी बनती है |

सूक्ष्म शक्ति – ब्राह्मी शक्ति – जो कि जगत् की सृष्टि कराती है, वैष्णवी शक्ति – जो कि जगत् की स्थिति का कारण है, और शैवी शक्ति – जो कि कारण है जगत् के लय का | ये तीनों ही शक्तियाँ सूक्ष्म शक्तियाँ कही जाती हैं | स्थावर सृष्टि, जंगम सृष्टि, ब्रह्माण्ड या पिण्ड कोई भी सृष्टि हो – सबको सृष्टि स्थिति और लय के क्रम से यही तीनों ब्रह्म शक्तियाँ अस्तित्व में रखती हैं | प्रत्येक ब्रह्माण्ड के नायक ब्रह्मा विष्णु और महेश इन्हीं तीनों शक्तियों की सहायता से अपना अपना कार्य सुचारू रूप से सम्पन्न करते हैं | 

स्थूल शक्ति – चौथी ब्रह्म शक्ति है स्थूल शक्ति | स्थूल जगत् का धारण, उसकी अवस्थाओं में परिवर्तन आदि समस्त कार्य इसी स्थूल शक्ति के द्वारा ही सम्भव हैं |

ब्रह्म शक्ति के उपरोक्त चारों भेदों के आधार पर शक्ति उपासना का विस्तार और महत्व स्वतः ही स्पष्ट हो जाता है | समस्त जगत् व्यापार का कारण ब्रह्म शक्ति ही है | वही सृष्टि, स्थिति और लय का कारण है | वही जीव के बन्ध का कारण है | वही ब्रह्म साक्षात्कार और जीव की मुक्ति का माध्यम है | ब्रह्मशक्ति के विलासरूप इस ब्रह्माण्ड-पिण्डात्मक सृष्टि में भू-भुवः-स्वः आदि सात ऊर्ध्व लोक हैं और अतल-वितल-पाताल आदि सात अधः लोक हैं | ऊर्ध्व लोकों में देवताओं का वास होता है और अधः लोकों में असुरों का | सुर और असुर दोनों ही देवपिण्डधारी हैं | भेद केवल इतना ही है कि देवताओं में आत्मोन्मुख वृत्ति की प्रधानता होती है और असुरों में इन्द्रियोन्मुख वृत्ति की | इस प्रकार वास्तव में सूक्ष्म देवलोक में प्रायः होता रहने वाला देवासुर संग्राम आत्मोन्मुखी और इन्द्रियोन्मुखी वृत्तियों का ही संग्राम है | आत्मोन्मुखी वृत्ति की प्रधानता के ही कारण देवता कभी भी असुरों का राज्य छीनने की इच्छा नहीं रखते, वरन् अपने ही अधिकार क्षेत्र में तृप्त रहते हैं | जबकि असुर निरन्तर देवराज्य छीनने के लिये तत्पर रहते हैं | क्योंकि उनकी इन्द्रियोन्मुख वृत्ति उन्हें विषयलोलुप बनाती है | जब जब देवासुर संग्राम में असुरों की विजय होने लगती है तब तब ब्रह्मशक्ति महामाय की कृपा से ही असुरों का प्रभव होकर पुनः शान्ति स्थापना होती है | मनुष्य पिण्ड में भी जो पाप पुण्य रूप कुमति और सुमति का युद्ध चलता है वास्तव में वह भी इसी देवासुर संग्राम का ही एक रूप है | मानवपिण्ड देवताओं और असुरों दोनों के ही लिये एक दुर्ग के सामान है | आत्मोन्मुखी वृत्ति की प्रधानता होने पर देवता इस मानवपिण्ड को अपने अधिकार में करना चाहते हैं, तो इन्द्रियोन्मुखी वृत्ति की प्रधानता होने पर असुर मानवपिण्ड को अपने अधिकार में करने को उत्सुक होते हैं | जब जब मनुष्य इन्द्रियोन्मुख होकर पाप के गर्त में फँसता जाता है तब तब उस महाशक्ति की कृपा से दैवबल से ही वह आत्मोन्मुखी बनकर उस दलदल से बाहर निकल सकता है |

यह मृत्युलोक सात ऊर्ध्व लोकों में से भूलोक का एक चतुर्थ अंश माना जाता है | इसमें समस्त जीव माता के गर्भ से उत्पन्न होते हैं और मृत्यु को प्राप्त होते हैं | इसी कारण इसे मृत्यु लोक कहा जाता है | अन्य किसी भी लोक में माता के गर्भ से जन्म नहीं होता | मृत्यु लोक के ही जीव मृत्यु के पश्चात् अपने अपने कर्मों के आधार पर सूक्ष्म शरीर से अन्य लोकों में दैवी सहायता से पहुँच जाते हैं | मनुष्य लोक के अतिरिक्त जितने भी लोक हैं वे सब देवलोक ही हैं | उनमें दैवपिण्डधारी देवताओं का ही वास होता है | सहजपिण्डधारी (उद्भिज्जादि योनियाँ) तथा मानवपिण्डधारी जीव उन दैवपिण्डधारी जीवों को देख भी नहीं सकते | ये समस्त देवलोक हमारे पार्थिव शरीर से अतीत हैं और सूक्ष्म हैं | देवासुर संग्राम में जब असुरों की विजय होने लगती है तब ब्रह्मशक्ति की कृपा से ही देवराज्य में शान्ति स्थापित होती है |

ब्रह्म सत्-चित् और आनन्द रूप से त्रिभाव द्वारा माना जाता है | जिस प्रकार कारण ब्रहम में तीन भाव हैं उसी प्रकार कार्य ब्रह्म भी त्रिभावात्मक है | इसीलिये वेद और वेदसम्मत शास्त्रों की भाषा भी त्रिभावात्मक ही होती है | इसी परम्परा के अनुसार देवासुर संग्राम के भी तीन स्वरूप हैं | जो दुर्गा सप्तशती के तीन चरित्रों में वर्णित किये गए हैं | देवलोक में ये ही तीनों रूप क्रमशः प्रकट होते हैं | पहला मधुकैटभ के वध के समय, दूसरा महिषासुर वध के समय और तीसरा शुम्भ निशुम्भ के वध के समय | वह अरूपिणी, वाणी मन और बुद्धि से अगोचरा सर्वव्यापक ब्रह्म शक्ति भक्तों के कल्याण के लिये अलौकिक दिव्य रूप में प्रकट हुआ करती है | ब्रह्मा में ब्राह्मी शक्ति, विष्णु में वैष्णवी शक्ति और शिव में शैवी शक्ति जो कुछ भी है वह सब उसी महाशक्ति का अंश है | त्रिगुणमयी महाशक्ति के तीनों गुण ही अपने अपने अधिकार के अनुसार पूर्ण शक्ति विशिष्ट हैं | अध्यात्म स्वरूप में प्रत्येक पिण्ड में क्लिष्ट और अक्लिष्ट वृत्तियों का संघर्ष, अधिदैव स्वरूप में देवासुर संग्राम और अधिभौतिक स्वरूप में मृत्युलोक में विविध सामाजिक संघर्ष तथा राजनीतिक युद्ध – सप्तशती गीता इन्हीं समस्त दार्शनिक रहस्यों से भरी पड़ी है | यह इस कलियुग में मानवपिण्ड में निरन्तर चल रहे इसी देवासुर संग्राम में दैवत्व को विजय दिलाने के लिये वेदमन्त्रों से भी अधिक शक्तिशाली है |

दुर्गा सप्तशती उपासना काण्ड का प्रधान प्रवर्तक उपनिषद ग्रन्थ है | इसका सीधा सम्बन्ध मार्कंडेय पुराण से है | सप्तशती में अष्टम मनु सूर्यपुत्र सावर्णि की उत्पत्ति की कथा है | यह कथा कोई लौकिक इतिहास नहीं है | पुराण वर्णित कथाएँ तीन शैलियों में होती हैं | एक वे विषय जो समाधि से जाने जा सकते हैं – जैसे आत्मा, जीव, प्रकृति आदि | इनका वर्णन समाधि भाषा में होता है | दूसरे, इन्हीं समाधिगम्य अध्यात्म तथा अधिदैव रहस्यों को जब लौकिक रीति से आलंकारिक रूप में कहा जाता है तो लौकिक भाषा का प्रयोग होता है | मध्यम अधिकारियों के लिये यही शैली होती है | तीसरी शैली में वे गाथाएँ प्रस्तुत की जाती हैं जो पुराणों की होती हैं | ये गाथाएँ परकीया भाषा में प्रस्तुत की जाती हैं | दुर्गा सप्तशती में तीनों ही शैलियों का प्रयोग है | जो प्रकरण राजा सुरथ और समाधि वैश्य के लिये परकीय भाषा में कहा गया है उसी प्रकरण को देवताओं की स्तुतियों में समाधि भाषा में और माहात्म्य के रूप में लौकिक भाषा में व्यक्त किया गया है |

राजा सुरथ और समाधि वैश्य को ऋषि ने परकीय भाषा में देवी के तीनों चरित्र सुनाए | क्योंकि वे दोनों समाधि भाषा के अधिकारी नहीं थे | तदुपरान्त लौकिक भाषा में उनका अधिदैवत् स्वरूप समझाया | और तब समाधि भाषा में मोक्ष का मार्ग प्रदर्शित किया :

ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा, बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति ||

तया विसृज्यते विश्वं जगदेतच्चराचरम्, सैषा प्रसन्ना वरदा नृणाम् भवति मुक्तये ||

सा विद्या परमा मुक्तेर्हेतुभूता सनातनी, संसारबन्धहेतुश्च सैव सर्वेश्वरेश्वरी ||

प्रथम चरित्र में भगवान् विष्णु योगनिद्रा से जागकर मधुकैटभ का वध करते हैं | भगवान् विष्णु की यह अनन्त शैया महाकाश की द्योतक है | इस चरित्र में ब्रह्ममयी की तामसी शक्ति का वर्णन है | इसमें तमोमयी शक्ति के कारण युद्धक्रिया सतोगुणमय विष्णु के द्वारा सम्पन्न हुई | सत्व गुण ज्ञानस्वरूप आत्मा का बोधक है | इसी सत्वगुण के अधिष्ठाता हैं भगवान् विष्णु | ब्राह्मी सृष्टि में रजोगुण का प्राधान्य रहता है और सतोगुण गौण रहता है | यही भगवान् विष्णु का निद्रामग्न होना है | जगत् की सृष्टि करने के लिये ब्रह्मा को समाधियुक्त होना पड़ता है | जिस प्रकार सर्जन में विघ्न भी आते हैं उसी प्रकार इस समाधि भाव के भी दो शत्रु हैं – एक है नाद और दूसरा नादरस | नाद एक ऐसा शत्रु है जो अपने आकर्षण से तमोगुण में पहुँचा देता है | यही नाद मधु है | समाधिभाव के दूसरे शत्रु नादरस के प्रभाव से साधक बहिर्मुख होकर लक्ष्य से भटक जाता है | जिसका परिणाम यह होता है कि साधक निर्विकल्पक समाधि – अर्थात् वह अवस्था जिसमें ज्ञाता और ज्ञेय में भेद नहीं रहता – को त्याग देता है और सविकल्पक अवस्था को प्राप्त हो जाता है | यही नादरस है कैटभ | क्योंकि मधु और कैटभ दोनों का सम्बन्ध नाद से है इसीलिये इन्हें “विष्णुकर्णमलोद्भूत” कहा गया है | मधु कैटभ वध के समय नव आयुधों का वर्णन शक्ति की पूर्णता का परिचायक है | यह है महाशक्ति का नित्यस्थित अध्यात्मस्वरूप | यह प्रथम चरित्र सृष्टि के तमोमय रूप का प्रकाशक होने के कारण ही प्रथम चरित्र की देवता महाकाली हैं | क्योंकि तम में क्रिया नही  होती | अतः वहाँ मधु कैटभ वध की क्रिया भगवान् विष्णु के द्वारा सम्पादित हुई | क्योंकि तामसिक महाशक्ति की साक्षात् विभूति निद्रा है, जो समस्त स्थावर जंगमादि सृष्टि से लेकर ब्रह्मादि त्रिमूर्ति तक को अपने वश में करती है |

दूसरे चरित्र में सतोगुण का पुंजीभूत दिव्य तेज ही तमोगुण के विनाश का साधन बनता है | महिषासुर वध के लिये विष्णु एवं शिव समुद्यत हुए | उनके मुखमण्डल से महान तेज निकलने लगा : “ततोऽपिकोपपूर्णस्य चक्रिणो वद्नात्तः, निश्चक्राम महत्तेजो ब्रह्मणः शंकरस्य च |” और वह तेज था कैसा “अतीव तेजसः कूटम् ज्वलन्तमिव पर्वतम् |” तत्पश्चात् अरूपिणी और मन बुद्धि से अगोचर साक्षात् ब्रह्मरूपा जगत् के कल्याण के लिये आविर्भूत हुईं | यह है शक्ति का अधिदैव स्वरूप | यों पाप और पुण्य की मीमांसा कोई सरल कार्य नहीं है | जैव दृष्टि से चाहे जो कार्य पाप समझा जाए, किन्तु मंगलमयी जगदम्बा की इच्छा से जो कार्य होता है वह जीव के कल्याणार्थ ही होता है | इसका प्रत्यक्ष प्रमाण देवासुर संग्राम है | युद्ध प्रकृति की स्वाभाविक क्रिया है | यह देवासुर संग्राम प्राकृतिक श्रृंखला के लिये इस चरित्र का आधिभौतिक स्वरूप है | सर्वशक्तिमयी के द्वारा क्षणमात्र में उनके भ्रूभंग मात्र से असुरों का नाश सम्भव था | लेकिन असुर भी यदि शक्ति उपासना करें तो उसका फल तो उन्हें मिलेगा ही | अतः महिषासुर को भी उसके तप के प्रभाव के कारण स्वर्ग लोक में पहुँचाना आवश्यक था | इसीलिये उसको साधारण मृत्यु – दृष्टिपात मात्र से भस्म करना – न देकर रण में मृत्यु दी जिससे कि वह शस्त्र से पवित्र होकर उच्च लोक को प्राप्त हो | शत्रु के विषय में भी ऐसी बुद्धि सर्वशक्तिमयी की ही हो सकती है | युद्ध के मैदान में भी उसके चित्त में दया और निष्ठुरता दोनों साथ साथ विद्यमान हैं | इस दूसरे चरित्र में महासरस्वती, महाकाली और महालक्ष्मी की रजःप्रधान महिमा का वर्णन है | इस चरित्र में महाशक्ति के रजोगुणमय विलास का वर्णन है | महिषासुर का वध ब्रह्मशक्ति के रजोगुणमय ऐश्वर्य से किया | इसीलिये इस चरित्र की देवता रजोगुणयुक्त महालक्ष्मी हैं | इस चरित्र में तमोगुण को परास्त करने के लिये शुद्ध सत्व में रज का सम्बन्ध स्थापित किया गया है | पशुओं में महिष तमोगुण की प्रतिकृति है | तमोबहुल रज ऐसा भयंकर होता है कि उसे परास्त करने के लिये ब्रह्मशक्ति को रजोमयी ऐश्वर्य की सहायता लेनी पड़ी | तमोगुण रूपी महिषासुर को रजोगुण रूपी सिंह ने भगवती का वाहन बनकर (उसी सिंह पर शुद्ध सत्वमयी चिन्मयरूपधारिणी ब्रह्मशक्ति विराजमान थीं) अपने अधीन कर लिया |

तृतीय चरित्र में रौद्री शक्ति का आविर्भाव कौशिकी और कालिका के रूप में हुआ | वस्तुतः सत् चित् और आनन्द इन तीनों में सत् से अस्ति, चित् से भाति, और आनन्द से

Mahishasurmardini
Mahishasurmardini

प्रिय वैभव के द्वारा ही विश्व प्रपंच का विकास होता है | इस चरित्र में भगवती का लीलाक्षेत्र हिमालय और गंगातट है | सद्भाव ही हिमालय है और चित् स्वरूप का ज्ञान गंगाप्रवाह है | कौशिकी और कालिका पराविद्या और पराशक्ति हैं | शुम्भ निशुम्भ राग और द्वेष हैं | राग और द्वेष जनित अविद्या का विलय केवल पराशक्ति की पराविद्या के प्रभाव से ही होता है | इसीलिये शुम्भ और निशुम्भ रूपी राग और द्वेष महादेवी में विलय हो जाते हैं | राग द्वेष और धर्मनिवेशजनित वासना जल एवम् अस्वाभाविक संस्कारों का नाश हो जाने पर भी अविद्या और अस्मिता तो रह ही जाती है | यह अविद्या और अस्मिता शुम्भ और निशुम्भ का आध्यात्मस्वरूप है | देवी के इस तीसरे चरित्र का मुख्य उद्देश्य अस्मिता का नाश ही है | अस्मिता का बल इतना अधिक होता है कि जब ज्ञानी व्यक्ति आत्मज्ञान प्राप्त करने लगता है तो सबसे पहले उसे यही भान होता है कि मैं ही ब्रह्म हूँ | उस समय विद्या के प्रभाव से “मैं” इस अस्मिता के लोकातीत भाव तक को नष्ट करना पड़ता है | तभी स्वस्वरूप का उदय हो पाता है | निशुम्भ के भीतर से दूसरे पुरुष का निकलना और देवी का उसे रोकना इसी भाव का प्रकाशक है | निशुम्भ के साथ उस पुरुष तक को मार डालने से अस्मिता का नाश होता है | और तभी देवी के निशुम्भ वध की क्रिया सुसिद्ध होती है | यही शुम्भ निशुम्भ वध का गूढ़ रहस्य है | वास्तव में यह युद्ध विद्या और अविद्या का युद्ध है | इस तीसरे चरित्र में क्योंकि देवी की सत्वप्रधान लीला का वर्णन है | इसलिए इस चरित्र की देवता सत्वगुणयुक्त महासरस्वती हैं | इस चरित्र के सत्वप्रधान होने के कारण ही इसमें भगवती की निर्लिप्तता के साथ साथ क्रियाशीलता भी अलौकिक रूप में प्रकट होती है |

सूक्ष्म जगत् और स्थूल जगत् दोनों ही में ब्रह्मरूपिणी ब्रह्मशक्ति जगत् और भक्त के कल्याणार्थ अपने नैमित्तिक रूप में आविर्भूत होती है | राजा सुरथ और समाधि वैश्य के हेतु भक्त कल्याणार्थ आविर्भाव हुआ | तीनों चरित्रों में वर्णित आविर्भाव स्थूल और सूक्ष्म जगत् के निमित्त से हुआ | वह भगवती ज्ञानी भक्तों के लिये ब्रह्मस्वरूपा, उपासकों के लिये ईश्वरीरूपा, और निष्काम यज्ञनिष्ठ भक्तों के लिये विराट्स्वरूपा है :

त्वं सच्चिदानन्दमये स्वकीये ब्रह्मस्वरूपे निजविज्ञभक्तान् |

तथेशरूपे विधाप्य मातरुपासकान् दर्शनामात्म्भक्तान् ||

निष्कामयज्ञावलिनिष्ठसाधकान् विराट्स्वरूपे च विधाप्य दर्शनम् |

श्रुतेर्महावाक्यमिदं मनोहरं करोष्यहो तत्वमसीति सार्थकम् ||

जैसा कि पहले ही बताया गया है कि शक्ति और शक्तिमान में अभेद होता है | सृष्टि में शक्तिमान से शक्ति का ही आदर और विशेषता होती है | किसी किसी उपासना प्रणाली में शक्तिमान को प्रधान रखकर उसकी शक्ति के अवलम्बन में उपासना की जाती है | जैसे वेद और शास्त्रोक्त निर्गुण और सगुण उपासना | इस उपासना पद्धति में आत्मज्ञान बना रहता है | कहीं कहीं शक्ति को प्रधान मानकर शक्तिमान का अनुमान करते हुए उपासना प्रणाली बनाई गई है | यह अपेक्षाकृत आत्मज्ञानरहित उपासना प्रणाली है | इसमें आत्मज्ञान का विकास न रहने के कारण साधक केवल भगवान् की मनोमुग्धकारी शक्तियों के अवलम्बन से मन बुद्धि से अगोचर परमात्मा के सान्निध्य का प्रयत्न करता है | लेकिन भगवान् की मातृ भाव से उपासना करने की अनन्त वैचित्र्यपूर्ण शक्ति उपासना की जो प्रणाली है वह इन दोनों ही प्रणालियों से विलक्षण है | इसमें शक्ति और शक्तिमान का अभेद लक्ष्य सदा रखा गया है | एक और जहाँ शक्तिरूप में उपास्य और उपासक का सम्बन्ध स्थापित किया जाता है, वहीं दूसरी ओर शक्तिमान से शक्तिभाव को प्राप्त हुए भक्त को ब्रह्ममय करके मुक्त करने का प्रयास होता है | यही शक्ति उपासना की इस तीसरी शैली का मधुर और गम्भीर रहस्य है |

विशेषतः भक्ति और उपासना की महाशक्ति का आश्रय लेने से किसी को भी निराश होने की सम्भावना नहीं रहती | युद्ध तो प्रकृति का नियम है | लेकिन यह देवासुर संग्राम मात्र देवताओं का या आत्मोन्मुखी और इन्द्रियोन्मुखी वृत्तियों का युद्ध ही नहीं था, वरन् यह देवताओं का उपासना यज्ञ भी था | और जगत् कल्याण की बुद्धि से यही महायज्ञ भी था | और इस सबके मर्म में एक महान सन्देश था | वह यह कि यदि दैवी शक्ति और आसुरी शक्ति दोनों अपनी अपनी जगह कार्य करें, दोनों का सामंजस्य रहे, एक दूसरे का अधिकार न छीनने पाए, तभी चौदह भुवनों में धर्म की स्थापना हो सकती है | और बल, ऐश्वर्य, बुद्धि और विद्या आदि प्रकाशित रहकर सुख और शान्ति विराजमान रह सकती है | भारतीय मनीषियों ने शक्ति में माता और जाया तथा दुहिता का समुज्ज्वल रूप स्थापित कर व्यक्ति और समाज को सन्मार्ग की ओर प्रेरित किया है | शक्ति, सौन्दर्य और शील का पुंजीभूत विग्रह उस जगज्जननी दुर्गा को भारतीय जनमानस का कोटिशः नमन…         

___________________कात्यायनी 

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Navaratri Special Falahari Recipes

फलों का बुके

आज चैत्र शुक्ल प्रतिपदा यानी भगवती के महागौरी रूप की उपासना का दिन और कल नवमी को सिद्धिदात्री देवी की उपासना की जाएगी | कुछ परिवारों में अष्टमी को कन्या पूजन के साथ नवरात्र सम्पन्न हो जाते हैं और कुछ परिवारों में नवमी को समापन किया जाता है | ये भी सभी जानते हैं कि नवरात्रों में लगभग प्रत्येक घर में फलाहार ही ग्रहण किया जाता है | हम पिछले कुछ दिनों से अपने WOW India के सदस्यों द्वारा भेजी हुई भारतीय परम्परा के अनुसार बनाए जाने वाले फलाहारी पकवानों की रेसिपीज़ आपके साथ साँझा कर रहे हैं | तो जिन लोगों का आज भी व्रत है उनके लिए प्रस्तुत है एक बिल्कुल ही नई रेसिपी… पुष्पगुच्छ यानी फूलों के बुके तो प्रायः प्रत्येक कार्यक्रम में अतिथियों को भेंट किये जाते हैं… शादी ब्याह या ऐसे ही किसी विशेष उत्सव में जाते हैं तो वहाँ भी इसी प्रकार फूलों के बुके लेकर जाने का प्रचलन है… चॉकलेट्स के बुके भी देखने को मिल जाते हैं… फलों के बहुत ख़ूबसूरती से सजाए गए टोकरे भी सभी लोग प्रयोग में लाते हैं… लेकिन फूलों के बुके सूख जाने पर फेंकने पड़ते हैं… क्या ही अच्छा हो यदि हम ताज़े फलों के बुके बनाकर भेंट करें… फल तो खाने के काम में आ ही जाएँगे… स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी होने फलों के बुके… और नवरात्रों में तो विशेष रूप से फलाहार के काम आएँगे… लेकिन कैसे…? तो आइये सीखते हैं अर्चन गर्ग जी से फलों के बुके बनाने की विधि… डॉ पूर्णिमा शर्मा…

सामग्री…

  • आधा अनानास नीचे का हिस्सा ऊपर का हिस्सा पत्ते वाला काट के आधा अलग रख लें

    अर्चना गर्ग
    अर्चना गर्ग
  • आधा खरबूजा
  • आधा तरबूज
  • 200 ग्राम काले अंगूर
  • 200 ग्राम हरे अंगूर
  • 200 gram strawberry
  • दो संतरे की फाक

बनाने की विधि…

सारे फलों के छिलके उतार दीजिए | अंगूर और स्ट्रोबेरी का छिलका नहीं उतरेगा उसको ऐसे ही छोड़ दीजिए | कटे हुए फलों को आप किसी भी आकार में काट सकती हैं – जैसा कि मैंने ऊपर आपको फोटो में दिखाया है | स्ट्रोबेरी अगर पहले आपने लाल लगाया है तो फिर उसके ऊपर सफेद लगाएं उसके ऊपर काला लगाएं इस तरह रंग बिरंगे फ्रूट्स के साथ इसको सजाएं | अब लकड़ी की डंडी में यह सब डाल के जो हमने अनानास का ऊपर का हिस्सा काटा था उसमें यह सब लकड़ी की डांडिया लगा दीजिये | इनको Skewers भी बोलते हैं | सारे फ्रूट्स डंडियों में लगाकर अनानास का जो ऊपर का हिस्सा है उसमें सब लगा दीजिए | जो कटे फल बच जाएँ तो उन्हें बचे हुए तरबूज को खाली करके उसका एक टोकरी सी बनाकर उसमें भर के टेबल पर रख दें | वह इसी तरह खा लिए जाएंगे | तो देखा आपने कितना सुंदर बुके तैयार हो गया हमारा आप खुद भी बनाइए और देखिए कैसा लगता है…

_______________अर्चना गर्ग

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Pujan Samagri for the Worship of Ma Durga

माँ दुर्गा की उपासना के लिए पूजन सामग्री

साम्वत्सरिक नवरात्र चल रहे हैं और समूचा हिन्दू समाज माँ भगवती के नौ रूपों की पूजा अर्चना में बड़े उत्साह, श्रद्धा और आस्था के साथ लीन है | इस अवसर पर कुछ मित्रों के आग्रह पर माँ दुर्गा की उपासना में जिन वस्तुओं का मुख्य रूप से प्रयोग होता है उनके विषय में लिखना आरम्भ किया है | पारम्परिक रूप से जो सामग्रियाँ माँ भगवती की उपासना में प्रमुखता से प्रयुक्त होती हैं उनका अपना प्रतीकात्मक महत्त्व होता है तथा प्रत्येक सामग्री में कोई विशिष्ट सन्देश अथवा उद्देश्य निहित होता है…

Katyayani Dr. Purnima Sharma
Katyayani Dr. Purnima Sharma

अभी तक हमने कलश तथा कलश स्थापना और वन्दनवार तथा यज्ञादि में प्रयुक्त किये जाने वाले आम्रपत्र और आम्र वृक्ष की लकड़ी, दीपक, पुष्पों तथा नारियल इत्यादि के विषय में लिख चुके हैं… अब आगे…

रक्षा सूत्र – पूजा को निर्विघ्न सम्पन्न करने के उद्देश्य से रक्षा सूत्र अपने नाम के अनुरूप ही रक्षा के निमित्त बाँधा जाता है | रक्षा सूत्र बांधते समय एक मन्त्र का उच्चारण किया जाता है:

येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबल: |

तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे मा चल मा चल ||

अर्थात जिस रक्षासूत्र से महान शक्तिशाली दानवेन्द्र राजा बलि को बाँधा गया था वही आज में तुम्हारी कलाई पर बाँध रहा हूँ | ये रक्षासूत्र तुम्हारी रक्षा करेगा | हे रक्षासूत्र तुम सदा अचल रहते हुए रक्षा करो | रक्षा सूत्र अर्थात कलावा या मौली तीन कच्चे धागे से बनी होती है | कलाई पर तीन रेखाएं होती हैं, जिन्हें मणिबन्ध कहा जाता है | ये तीन रेखाएँ ब्रह्मा, विष्णु और महेश की प्रतीक मानी जाती हैं तथा इन्हीं तीनों रेखाओं में दुर्गा, सरस्वती और लक्ष्मी का वास भी माना जाता है | पौराणिक मान्यताओं के अनुसार जब अभिमन्त्रित करके रक्षा सूत्र बाँधा जाता है तो वह त्रिदेव और त्रिदेवियों को समर्पित हो जाता है और इस प्रकार तीनों देव और तीनों देवियाँ व्यक्ति की रक्षा करती हैं |

मुखवास अर्थात पान सुपारी – किसी भी पूजा अर्चना में पान का भी महत्त्व होता है | भगवती अथवा किसी भी देवी देवता को पान समर्पित करते समय मन्त्र बोला जाता है:

पूगीफलं महादिव्यं नागवल्लीदलैर्युतम् | एलादिचूर्णसंयुक्तं ताम्बूलं प्रतिग्रह्यताम् ||

अथवा:

एलालवंग कस्तूरीकर्पूरै: सुष्टुवासिताम | वीटिकां मुखवासार्थमर्पयामि सुरेश्वरि ||

दिव्य पूगीफल अर्थात सुपारी नागवल्लीदल अर्थात पान के पत्ते और एलादिचूर्ण अर्थात इलायची तथा कर्पूर आदि के सुगन्धित चूर्ण के साथ आपको समर्पित करते हैं, इस ताम्बूल अर्थात पान के बीड़े को ग्रहण करें |

आपने देखा होगा कि पान सबसे अन्त में समर्पित किया जाता है | इसका एक प्रमुख कारण यह है कि पान एक प्राकृतिक मुखवास है – मुख को सुगन्धि प्रदान करता है | सारा भोजन सम्पन्न हो जाए, अतिथि को जो भी दान दक्षिणा दे दी जाए, उसके बाद अन्त में मुखवास के लिए पान देने की प्रथा अनादि काल से भारतीय संस्कृति का अंग रही है | इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि पान को ताज़गी और समृद्धि का स्रोत माना जाता है | भोजन के बाद यदि पान खा लिया जाए तो भोजन सरलता से पच जाता है |

कथा उपलब्ध होती है कि कात्यायन ऋषि के कोई सन्तान नहीं थी | उन्होंने भगवती की उपासना की और देवी से उन्हें कन्या रूप में प्राप्त करने का वरदान माँग लिया | महिषासुर के बढ़ते अत्याचारों के कारण देवों का क्रोध भी बढ़ रहा था | उनके क्रोध से एक तेजपुंज प्रकट हुआ जो कन्या रूप में था | उसी ने ऋषि कात्यायन के घर में जन्म लिया और कात्यायनी कहलाईं | आश्विन शुक्ल नवमी और दशमी को उन्होंने महिषासुर से युद्ध किया और अन्त में उसका का वध किया | मान्यता है की महिषासुर वध से पूर्व उन्होंने पान ही खाया था जिसके कारण उनमें और अधिक ऊर्जा का संचार हो गया था | ऐसी भी मान्यता है कि पान के पत्ते में समस्त देवी देवताओं का वास होता है |

तिलक – पुण्यं यशस्यमायुष्यं तिलकं मे प्रसीदतु |

कान्ति लक्ष्मीं धृतिं सौख्यं सौभाग्यमतुलं बलम् |

ददातु चन्दनं नित्यं सततं धारयाम्यहम् ||

तिलक के लिए चन्दन, हल्दी और कुमकुम आदि का प्रयोग किया जाता है | एक तो इन वस्तुओं के औषधीय गुण और दूसरे इनकी सुगन्धि के कारण इन पदार्थों का उपयोग किया जाता है | चन्दन लगाने से शीतलता प्राप्त होती है साथ ही बुद्धिमत्ता में भी वृद्धि होती है | हल्दी भी अपने औषधीय गुणों के कारण प्रसिद्ध है | और पारम्परिक रूप से कुमकुम भी हल्दी से ही बनाया जाता है |

तिलक लगाने के कुछ नियम भी होते हैं | जैसे:

पितृगणों को तर्जनी अंगुलि से तिलक लगाया जाता है | अर्थात पिण्डदान करते समय तिलक लगाने के लिए तर्जनी अंगुलि का प्रयोग किया जाता है | तर्जनी अर्थात तर्जन करना – किसी बात के लिए रोकना – इसीलिए तर्जनी अंगुलि का प्रयोग किसी अतिथि को, स्वयं को अथवा पूजा आदि में तिलक लगाने के लिए नहीं किया जाता |

यदि स्वयं को तिलक लगाना हो तो मध्यमा अँगुली का प्रयोग किया जाता है | इसका एक कारण यह भी है की ये अंगुलि लम्बी होने के कारण सरलता से अपने मस्तक तक पहुँच जाती है |

पूजा कार्य में किसी को तिलक लगाना हो तो अनामिका का प्रयोग किया जाता है |

किसी अतिथि को तिलक लगाना हो तो अंगुष्ठ अर्थात अँगूठे का प्रयोग किया जाता है |

साथ ही, तिलक मस्तक पर जिस स्थान पर लगाया जाता है वह आज्ञाचक्र कहलाता है | तिलक धारण करने का अभिप्राय है कि हम अपने आज्ञाचक्र को भी जाग्रत कर रहे हैं |

वास्तव में देखा जाए तो जिस पूजा विधि और सामग्री की बात हम करते हैं वह हिन्दू समाज का सनातन काल से चला आ रहा चिर परिचित अतिथि सत्कार ही है | कोई “विशिष्ट” अतिथि हमारे घर आता है तो सबसे पहले तोरण बनाते हैं पञ्चपल्लवों से | अतिथि के आने पर द्वार पर ही हम उसके हस्त पाद प्रक्षालन कराते हैं | कुछ भीतर आने पर उसका आरता भी उतारते हैं | उसके पश्चात उसे बैठने के लिए आसन प्रदान करते हैं | अत्यन्त ही विशिष्ट व्यक्ति हुआ तो उसके स्वागत में वाद्ययन्त्र भी बजाए जाते हैं | बैठने के बाद पुनः उसके हस्त प्रक्षालन के लिए जल और हाथ पोंछने के लिए वस्त्र समर्पित करते हैं | कुछ पुष्प आदि देकर तथा इत्र आदि छिड़ककर उसका सम्मान करते हैं | मस्तक पर तिलक लगाते हैं | फिर कुछ पेय पदार्थ उसके समक्ष प्रस्तुत करते हैं | उसके बाद भोजन देते हैं | साथ में जल भी देते हैं | भोजन के पश्चात मिष्टान्न भेंट किया जाता है | उसके बाद पुनः हस्त प्रक्षालन के लिए जल दिया जाता है | अन्त में सुगन्धित पान और कुछ दक्षिणा तथा उपहार आदि देकर पुनः आगमन की प्रार्थना के साथ विदा किया जाता है |

जब हम किसी भी देवी देवता की स्थापना और आह्वाहन करते हैं तो वह वास्तव में अत्यन्त विशिष्ट होता है हमारे लिए | और माँ भगवती के अतिरिक्त विशिष्ट अतिथि भला

और कौन हो सकता है ? तो माँ भगवती की उपासना में भी यही सब होता है | माता के भक्त उन्हें अपने निवास पर आमन्त्रित करते हैं और जिस दिन उनका आगमन होता

Pujan Samagri
Pujan Samagri

है उस दिन घर द्वार को अच्छे से सजाते हैं | वन्दनवार द्वार पर लटकाते हैं | मैया का आह्वाहन करते हैं, उनके आगमन पर शंखध्वनि करते हैं | उनके हस्त पाद प्रक्षालित करके आरती करके उन्हें घर के भीतर लेकर आते हैं | पुष्प भेंट करते हैं | आसन प्रदान करते हैं | मस्तक पर तिलक लगाते हैं श्रृंगार की वस्तुएँ तथा नारिकेल फल भेंट करते हैं | रक्षा सूत्र समर्पित करते हैं | दीप प्रज्वलित करते हैं | भोजन और नैवेद्य समर्पित करते हैं | भोजनोपरान्त पुनः हस्त प्रक्षालन करके ताम्बूल तथा अन्य सुगन्धि द्रव्य भेंट करते हैं | अन्त में दक्षिणा समर्पित करके पुष्प तथा उपहार आदि भेंट करके भूल चूक के लिए क्षमा याचना करते हैं | और फिर पुनः आगमन की प्रार्थना अर्थात आरती करके उन्हें विदा करते हैं |

इस प्रकार यदि धार्मिक पक्ष की बात नहीं भी करें, तो चाहे माँ भगवती की पूजा अर्चना हो अथवा किसी भी अन्य देवी देवता की उपासना हो – ये समस्त प्रक्रियाएँ हमें अपनी जड़ों से – अपने रीति रिवाज़ों से – अपने संस्कारों से जोड़े रखती हैं तथा हमें पग पग पर यही सीख देती हैं कि व्यक्ति जीवन में कितना भी ऊँचा क्यों न उठ जाए… परिवार के बड़े व्यक्तियों के समक्ष – अतिथियों के समक्ष – उसे विनम्र तथा श्रद्धावान ही बने रहना चाहिए…

अन्त में पुनः यही कहना चाहेंगे कि माँ केवल भावनाओं से प्रसन्न हो जाती है… जहाँ भी जिस भी स्थिति में व्यक्ति है, बस हृदय से माँ का स्मरण कर ले तो माँ अवश्य उसकी मनोकामना पूर्ण करती है…

अस्तु, माँ भगवती अपने सभी नौ रूपों में जगत का कल्याण करें यही कामना है…

देवी प्रपन्नार्तिहरे प्रसीद, प्रसीद मातार्जगतोSखिलस्य |

प्रसीद विश्वेश्वरी पाहि विश्वं, त्वमीश्वरी देवी चराचरस्य ||

 

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Navaratri Special Falahari Recipes

नवरात्रि स्पेशल फलाहारी व्यंजन

“एतत्ते वदनं सौम्यं लोचनत्रय भूषितं, पातु नः सर्वभीतेभ्यः कात्यायनी नमोSस्तु ते |”

जैसा कि सब ही जानते हैं चैत्र नवरात्र चल रहे हैं और हर घर में माँ भगवती के नौ रूपों की पूजा अर्चना की जा रही है | आज चैत्र शुक्ल षष्ठी – यानी छठा नवरात्र है – देवी के कात्यायनी रूप की उपासना का दिन | इनकी उपासना से चारों पुरुषार्थ – धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष – की सिद्धि होती है | यजुर्वेद के तैत्तिरीय आरण्यक में सर्वप्रथम इनका उल्लेख उपलब्ध होता है | देवासुर संग्राम में देवताओं का कार्य सिद्ध करने के लिये – महिषासुर जैसे दानवों का संहार करने के लिए – देवी कत ऋषि के पुत्र महर्षि कात्यायन के आश्रम पर प्रकट हुईं और महर्षि ने उन्हें अपनी पुत्री के रूप में स्वीकार किया | इसीलिये “कात्यायनी” नाम से उनकी प्रसिद्धि हुई | इस प्रकार देवी का यह रूप पुत्री रूप है | यह रूप निश्छल पवित्र प्रेम का प्रतीक है | किन्तु साथ ही यदि कहीं कुछ भी अनुचित होता दिखाई देगा तो ये कभी भी भयंकर क्रोध में भी आ सकती हैं | स्कन्द पुराण में उल्लेख है कि वे परमेश्वर के नैसर्गिक क्रोध से उत्पन्न हुई थीं और बाद में पार्वती द्वारा प्रदत्त सिंह पर आरूढ़ होकर महिषासुर का वध किया था | पाणिनि पर पतंजलि के भाष्य में इन्हें शक्ति का आदि रूप बताया गया है | देवी भागवत और मार्कण्डेय पुराणों में इनका माहात्म्य विस्तार से उपलब्ध होता है | कात्यायनी देवी के रूप में माँ भगवती सभी की रक्षा करें और सभी की समस्त मनोकामनाएँ पूर्ण करें…

नौ दिन चलने वाले नवरात्रों में लगभग प्रत्येक घर में फलाहार ही ग्रहण किया जाएगा | हम पिछले कुछ दिनों से अपने WOW India के सदस्यों द्वारा भेजी हुई भारतीय परम्परा के अनुसार बनाए जाने वाले फलाहारी पकवानों की रेसिपीज़ आपके साथ साँझा कर रहे हैं | इसी क्रम में आज रेखा अस्थाना जी की भेजी हुई दो रेसिपीज़ प्रस्तुत कर रहे हैं – पहली रेसिपी है सामख के चावल का पुलाव, और दूसरी है शकरकन्दी का पाग… अब भई नमक का खाने के बाद कुछ मीठा भी तो चाहिए होता है न… तो आइये सीखते हैं कैसे बनाई जाती हैं ये दोनों चीज़ें… डॉ पूर्णिमा शर्मा…

सावां या सामख के चावल का पुलाव

बचपन में दादी माँ कहा करती थी यह चावल प्रकृति की देन है, बिना बोये जोते इसको प्राप्त किया जा सकता है |

तो आज हम आपको फलाहारी पुलाव बनाना बता रहें हैं | एक बात का ध्यान रहे जब आप संध्या की आरती कर चुके व व्रत के पारायण का समय हो तभी इसे बनवाइएगा |

Pulao of Samakh Rice
Pulao of Samakh Rice

अन्यथा यह एक दूसरे से चिपक जाता हैं | वैसे भी व्रत के नियम के अनुसार पारायण के समय जितना खा पाए उतना ही लें, रख उठाकर न खाएँ |

सामग्री…

  • सावां के चावल एक कटोरी ।
  • आलू एक बड़ा
  • हरी मिर्च
  • एक चम्मच जीरा साबुत
  • एक चम्मच देसी घी
  • हरी धनिया
  • अदरख कद्दूकस किया हुआ एक चम्मच
  • सेंधा नमक स्वादानुसार

चावल को धो लें | आलू को छील कर बारीक काट लें | अब कुकर में एक चम्मच देसी घी डालकर जीरा तड़का लें | उसके बाद हरी मिर्च व अदरख डालें | फिर चावल व आलू डालें | सेंधा नमक डालकर चलाएँ | अन्दाज़ से पानी डालें | ढक्कन बन्द करके एक सीटी में उतार लें | फिर हरी धनिया डालें | अगर पसन्द हो तो देसी घी डालकर दही या चटनी के साथ आप खा सकती हैं | आप चाहें तो पपीते के रायते के साथ भी खा सकती हैं |

और अब कुछ मीठा हो जाए… तो बनाते हैं शकरकंदी पाग…

Sweet Chips of Sweet Potato
Sweet Chips of Sweet Potato

सामग्री…

  • शकरकंद 250ग्रा०
  • चीनी चार टी स्पून
  • अमचूर एक टी स्पून
  • सोंठ एक चम्मच
  • सेंधा नमक एक टी स्पून
  • सूखी साबुत लाल मिर्च दो
  • जीरा एक टी स्पून
  • थोड़ी किशमिश

बनाने की विधि…

शकरकंद को धोकर छील लें फिर गोल गोल काट लें – न बहुत पतले न मोटे |

एक पैन में एक चम्मच घी डालकर उसमें नमक, सोंठ, अमचूर, चीनी व किशमिश डालकर एक कप पानी डालें और शकरकन्दी डालकर चलाकर ढक दें | तब तक पकायें जब तक शकरकंद दबने न लगे | अधिक गलाए नहीं नहीं तो स्वाद बेकार हो जाता है |

इसे आप किसी भी फलाहार व्यंजन के साथ खा सकती हैं |

________________रेखा अस्थाना

 

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Pujan Samagri for the Worship of Ma Durga

माँ दुर्गा की उपासना के लिए पूजन सामग्री

Katyayani Dr. Purnima Sharma
Katyayani Dr. Purnima Sharma

साम्वत्सरिक नवरात्र चल रहे हैं और समूचा हिन्दू समाज माँ भगवती के नौ रूपों की पूजा अर्चना में बड़े उत्साह, श्रद्धा और आस्था के साथ लीन है | इस अवसर पर कुछ मित्रों के आग्रह पर माँ दुर्गा की उपासना में जिन वस्तुओं का मुख्य रूप से प्रयोग होता है उनके विषय में लिखना आरम्भ किया है | पारम्परिक रूप से जो सामग्रियाँ माँ भगवती की उपासना में प्रमुखता से प्रयुक्त होती हैं उनका अपना प्रतीकात्मक महत्त्व होता है तथा प्रत्येक सामग्री में कोई विशिष्ट सन्देश अथवा उद्देश्य निहित होता है…

अभी तक हमने कलश तथा कलश स्थापना और वन्दनवार तथा यज्ञादि में प्रयुक्त किये जाने वाले आम्रपत्र और आम्र वृक्ष की लकड़ी, दीपक तथा पुष्पों इत्यादि के विषय में लिख चुके हैं… अब आगे…

घट स्थापना में तथा पूजा कार्य में नारियल का विशेष महत्त्व होता है | नारियल के गुणों से तो हम सभी परिचित हैं | शीतल तथा स्निग्ध गुण धर्म इसका होता है | माना जाता है कि इसमें सभी देवों का वास होता है तथा देवी को यह अत्यन्त प्रिय होता है – इसीलिए नारियल को संस्कृत में श्रीफल कहा जाता है | किसी भी शुभकार्य के आरम्भ में नारियल तोड़ने की प्रथा है – नारियल के बाह्य आवरण को यदि अहंकार का प्रतीक तथा भीतरी भाग को पवित्रता और शान्ति का प्रतीक माना जाए तो इसका महत्त्व स्वतः ही समझ में आ जाता है | पूजा की समाप्ति पर नारियल तोड़ने का भी यही अभिप्राय है कि व्यक्ति ने अपने अहंकार को समाप्त कर दिया | नारियल में ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनों देवों का वास माना जाता है |

कुछ लोगों की ऐसी भी मान्यता है कि एक समय धार्मिक कार्यों में मनुष्य और पशुओं की बलि सामान्य बात थी | कहते हैं उस समय आदि शंकराचार्य ने इस अमानवीय परम्परा को तोड़ा और मनुष्य अथवा पशु के स्थान पर नारियल अर्पित करने की प्रथा आरम्भ की | नारियल देखा जाए तो मनुष्य के मस्तिष्क से मेल खाता है | नारियल की जटा की तुलना मनुष्य के बालों से, कठोर कवच की तुलना मनुष्य की खोपड़ी से, भीतर के गूदे की तुलना मनुष्य के दिमाग़ से नारियल पानी की तुलना रक्त से की जा सकती है |

नारियल से पूर्व कलश में जो दूर्वा, कुश, सुपारी, पुष्प आदि डाले जाते हैं उनमें भी यही भावना निहित होती है कि हमारे भीतर दूर्वा जैसी जीवनी शक्ति बनी रहे, कुश जैसी

Coconut for puja
Coconut for puja

प्रखरता हमारे ज्ञान में विद्यमान रहे, सुपारी के समान गुणों से युक्त स्थिरता रहे तथा पुष्प के सामान सर्वग्राही गुणों का निवास हमारे मन में हो जाए |

इसके अतिरिक्त सुपारी को सभी देवों का प्रतीक भी माना जाता है और इसीलिए नवग्रह उपासना में नवग्रहों के प्रतीक स्वरूप सुपारी रखी जाती है | गणेश जी का रूप भी सुपारी को माना जाता है और गणेश जी की प्रतिमा न होने पर सुपारी में मौली बाँधकर उसे ही गणेश जी मानकर पूजा की जाती है | किसी भी अनुष्ठान में जहाँ पति पत्नी दोनों का होना अनिवार्य हो वहाँ यदि एक उपस्थित न हो तो उसके स्थान पर भी सुपारी को रखने की प्रथा है |

नवरात्रों के पावन नौ दिनों में दुर्गा माँ के नौ स्वरूपों की पूजा उपासना बड़े उत्साह के साथ की जाती है – चाहे चैत्र नवरात्र हों अथवा शारदीय नवरात्र | माँ भगवती को प्रसन्न करने के लिए और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए कुछ विशेष सामग्रियों से उनकी पूजा की जाती है | यद्यपि माँ क्योंकि एक माँ हैं तो साधारण रीति से की गई ईशोपासना भी उतनी ही सार्थक होती है जितनी कि बहुत अधिक सामग्री आदि के द्वारा की गई पूजा अर्चना | साथ ही जिसकी जैसी सुविधा हो, जितना समय उपलब्ध हो, जितनी सामर्थ्य हो उसी के अनुसार हर किसी को माँ भगवती अथवा किसी भी देवी देवता की पूजा अर्चना उपासना करनी चाहिए… वास्तविक बात तो भावना की है… भावना के साथ यदि अपने पलंग पर बैठकर भी ईश्वर की उपासना कर ली गई तो वही सार्थक हो जाएगी…

_________________कात्यायनी 

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Navaratri Special Falahari Recipes

नवरात्रि स्पेशल फलाहारी व्यंजन  

जैसा कि सब ही जानते हैं चैत्र नवरात्र चल रहे हैं और हर घर में माँ भगवती के नौ रूपों की पूजा अर्चना की जा रही है | आज चैत्र शुक्ल पञ्चमी – यानी पञ्चम नवरात्र है – देवी के स्कन्दमाता रूप की उपासना सबने की है | छान्दोग्यश्रुति के अनुसार भगवती की शक्ति से उत्पन्न हुए सनत्कुमार का नाम स्कन्द है, और उन स्कन्द की माता होने के कारण ये स्कन्दमाता कहलाती हैं | इसीलिये यह रूप एक उदार और स्नेहशील माता का रूप है |

या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता,

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः |

जब धरती पर राक्षसों का अत्याचार बढ़ता है माता अपने भक्तों की रक्षा करने के लिए सिंह पर सवार होकर दुष्टों का नाश करने निकल पड़ती हैं | युद्ध के लिए निकलना है लेकिन पुत्र के प्रति अगाध स्नेह भी है, माँ के कर्तव्य का भी निर्वाह करना है, इसलिए युद्धभूमि में भी सन्तान को साथ ले जाना आवश्यक हो जाता है एक माँ के लिए | साथ ही युद्ध में प्रवृत्त माँ की गोद में जब पुत्र होगा तो उसे बचपन से ही संस्कार मिलेंगे कि आततायियों का वध किस प्रकार किया जाता है – क्योंकि सन्तान को प्रथम संस्कार तो माँ से ही प्राप्त होते हैं – इन सभी तथ्यों को दर्शाता देवी का यह रूप है |  

नवरात्रों में लगभग प्रत्येक घर में फलाहार ही ग्रहण किया जाएगा | हम पिछले कुछ दिनों से अपने WOW India के सदस्यों द्वारा भेजी हुई भारतीय परम्परा के अनुसार बनाए जाने वाले फलाहारी पकवानों की रेसिपीज़ आपके साथ साँझा कर रहे हैं | इसी क्रम में आज हम दो रेसिपी प्रस्तुत कर रहे हैं… मखाने तो हाँ सब ही बड़े चाव से खाते हैं… कभी भून कर नमक लगाकर, तो कभी ऐसे ही बिना भुने… कभी तलकर तो कभी खीर बनाकर… अनेक प्रकार से मखानों का सेवन हम करते हैं… पर क्या आपने कभी मखाने की पूरी बनाकर खाई हैं…? नहीं…? तो आइये आज सीखते हैं अर्चना गर्ग जी से… भई कुट्टू और रागी आदि की पूरियाँ तो बहुत खा लीं व्रत के दिनों में… आज मखाने की पूरी खाते हैं… स्वास्थ्य के लिए भी मखाने बहुत लाभकारी होते हैं… डॉ पूर्णिमा शर्मा…

मखाने के पराँठे या पूरी के लिए सामग्री…

Fox Nut Puri
Fox Nut Puri
  • हम मखानों में से बिना फूले हुए मखाने चुन लेते हैं – जिन्हें ठुड्डी कहा जाता है | | इसको हम मिक्सी में महीन पीस लेते हैं | उसके बाद इसको चलनी से छान के ऊपर का मोटा वाला आटा यानी चोकर अलग कर देंगे और नीचे का बारीक वाले आटे से हम पूरियाँ बनाएँगे | तो ये दो कटोरी आटा
  • दो आलू उबले हुए मीडियम साइज के
  • थोड़ा देसी घी पूरी तलने के लिए
  • आधा चम्मच सेंधा नमक

बनाने की विधि…

एक बाउल में आटा ले लिया | दो उबले हुए आलू अच्छे से कद्दूकस करके मैश कर लिए और उसमें नमक डाल दिया। अब उसमें थोड़ा थोड़ा पानी डालकर उसका रोटी जैसा आटा सान लिया | मखाने का आटा फूलता बहुत है इसका ध्यान रखना है | इसको 15 मिनट ढक के रख दिया | 15 मिनट बाद देखा अगर वह खड़ा है तो थोड़ा सा पानी और डालकर उसको मुलायम दो | अब जैसे हम रोटी की लोई बनाते हैं ऐसे सब लोई तोड़ कर रख ले | चकले पे जरा सा मखाने का आटा डाला, उसके ऊपर लोई रखी और जरा सा आटा और डाला और धीरे-धीरे उसको हाथ से भी थपक सकते हैं और बेलन से भी बोल सकते हैं | छोटी-छोटी पराठे तैयार करके तवे पर डाल दिया | देसी घी लगा लगा कर अच्छा गोल्डन ब्राउन दोनों तरफ से सेंक लिया | यह खाने में बहुत ही स्वादिष्ट लगता है | आप इसे चाहे तो पूरी की तरह भी तल सकते हैं | लेकिन घी काफी लग जाता है उसमें | पराठे बहुत स्वाद लगते हैं | न्यूट्रीशन वैल्यू बहुत है – जैसा कि सभी को मालूम है कि मैं खाने में कितने गुण होते हैं |

 

दही की अरबी के लिए सामग्री…

मखाने की पूरी या पराँठे तो हमने तैयार कर लिए, लेकिन इन्हें खाएँगे किसके साथ ? क्यों न दही वाली अरबी बनाई जाएँ… इसके लिए…

  • आधा किलो उबली हुई अरबी
  • 1 कटोरी दही हल्की खट्टी
  • नमक स्वादानुसार
  • एक बड़ा चम्मच देसी घी

    Dahi ki arbi
    Dahi ki arbi
  • दो हरी मिर्च
  • चौथाई कप कटा हुआ बारीक हरा धनिया
  • आधा चम्मच गरम मसाला
  • दो कप पानी

बनाने की विधि…

कढ़ाई में घी डाला | उसके बाद उसमें दही डाला और सारे मसाले डाल दिए | उसे लगातार चलाते रहें नहीं तो दही फट जाएगी | अब उसमें उबली हुई अरबी दो दो पीस काट कर डाल दिए और उसे चलाते रहे | फिर दो कप पानी डाल दिया | जब वह अच्छे से खनक जाए तो लटपट दही की अरबी हमारी तैयार हो गई |

यह मखाने की पूरी के साथ या पराठे के साथ बहुत ही स्वादिष्ट लगती है तो लीजिए हमारा व्रत का खाना तैयार है आप भी खाइए दूसरों को भी खिलाइए और बताइए कैसा लगा आपको यह खाना…

_____________________अर्चना गर्ग