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Navaratri Special Falahari Recipes

नवरात्रि स्पेशल फलाहारी व्यंजन

“एतत्ते वदनं सौम्यं लोचनत्रय भूषितं, पातु नः सर्वभीतेभ्यः कात्यायनी नमोSस्तु ते |”

जैसा कि सब ही जानते हैं चैत्र नवरात्र चल रहे हैं और हर घर में माँ भगवती के नौ रूपों की पूजा अर्चना की जा रही है | आज चैत्र शुक्ल षष्ठी – यानी छठा नवरात्र है – देवी के कात्यायनी रूप की उपासना का दिन | इनकी उपासना से चारों पुरुषार्थ – धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष – की सिद्धि होती है | यजुर्वेद के तैत्तिरीय आरण्यक में सर्वप्रथम इनका उल्लेख उपलब्ध होता है | देवासुर संग्राम में देवताओं का कार्य सिद्ध करने के लिये – महिषासुर जैसे दानवों का संहार करने के लिए – देवी कत ऋषि के पुत्र महर्षि कात्यायन के आश्रम पर प्रकट हुईं और महर्षि ने उन्हें अपनी पुत्री के रूप में स्वीकार किया | इसीलिये “कात्यायनी” नाम से उनकी प्रसिद्धि हुई | इस प्रकार देवी का यह रूप पुत्री रूप है | यह रूप निश्छल पवित्र प्रेम का प्रतीक है | किन्तु साथ ही यदि कहीं कुछ भी अनुचित होता दिखाई देगा तो ये कभी भी भयंकर क्रोध में भी आ सकती हैं | स्कन्द पुराण में उल्लेख है कि वे परमेश्वर के नैसर्गिक क्रोध से उत्पन्न हुई थीं और बाद में पार्वती द्वारा प्रदत्त सिंह पर आरूढ़ होकर महिषासुर का वध किया था | पाणिनि पर पतंजलि के भाष्य में इन्हें शक्ति का आदि रूप बताया गया है | देवी भागवत और मार्कण्डेय पुराणों में इनका माहात्म्य विस्तार से उपलब्ध होता है | कात्यायनी देवी के रूप में माँ भगवती सभी की रक्षा करें और सभी की समस्त मनोकामनाएँ पूर्ण करें…

नौ दिन चलने वाले नवरात्रों में लगभग प्रत्येक घर में फलाहार ही ग्रहण किया जाएगा | हम पिछले कुछ दिनों से अपने WOW India के सदस्यों द्वारा भेजी हुई भारतीय परम्परा के अनुसार बनाए जाने वाले फलाहारी पकवानों की रेसिपीज़ आपके साथ साँझा कर रहे हैं | इसी क्रम में आज रेखा अस्थाना जी की भेजी हुई दो रेसिपीज़ प्रस्तुत कर रहे हैं – पहली रेसिपी है सामख के चावल का पुलाव, और दूसरी है शकरकन्दी का पाग… अब भई नमक का खाने के बाद कुछ मीठा भी तो चाहिए होता है न… तो आइये सीखते हैं कैसे बनाई जाती हैं ये दोनों चीज़ें… डॉ पूर्णिमा शर्मा…

सावां या सामख के चावल का पुलाव

बचपन में दादी माँ कहा करती थी यह चावल प्रकृति की देन है, बिना बोये जोते इसको प्राप्त किया जा सकता है |

तो आज हम आपको फलाहारी पुलाव बनाना बता रहें हैं | एक बात का ध्यान रहे जब आप संध्या की आरती कर चुके व व्रत के पारायण का समय हो तभी इसे बनवाइएगा |

Pulao of Samakh Rice
Pulao of Samakh Rice

अन्यथा यह एक दूसरे से चिपक जाता हैं | वैसे भी व्रत के नियम के अनुसार पारायण के समय जितना खा पाए उतना ही लें, रख उठाकर न खाएँ |

सामग्री…

  • सावां के चावल एक कटोरी ।
  • आलू एक बड़ा
  • हरी मिर्च
  • एक चम्मच जीरा साबुत
  • एक चम्मच देसी घी
  • हरी धनिया
  • अदरख कद्दूकस किया हुआ एक चम्मच
  • सेंधा नमक स्वादानुसार

चावल को धो लें | आलू को छील कर बारीक काट लें | अब कुकर में एक चम्मच देसी घी डालकर जीरा तड़का लें | उसके बाद हरी मिर्च व अदरख डालें | फिर चावल व आलू डालें | सेंधा नमक डालकर चलाएँ | अन्दाज़ से पानी डालें | ढक्कन बन्द करके एक सीटी में उतार लें | फिर हरी धनिया डालें | अगर पसन्द हो तो देसी घी डालकर दही या चटनी के साथ आप खा सकती हैं | आप चाहें तो पपीते के रायते के साथ भी खा सकती हैं |

और अब कुछ मीठा हो जाए… तो बनाते हैं शकरकंदी पाग…

Sweet Chips of Sweet Potato
Sweet Chips of Sweet Potato

सामग्री…

  • शकरकंद 250ग्रा०
  • चीनी चार टी स्पून
  • अमचूर एक टी स्पून
  • सोंठ एक चम्मच
  • सेंधा नमक एक टी स्पून
  • सूखी साबुत लाल मिर्च दो
  • जीरा एक टी स्पून
  • थोड़ी किशमिश

बनाने की विधि…

शकरकंद को धोकर छील लें फिर गोल गोल काट लें – न बहुत पतले न मोटे |

एक पैन में एक चम्मच घी डालकर उसमें नमक, सोंठ, अमचूर, चीनी व किशमिश डालकर एक कप पानी डालें और शकरकन्दी डालकर चलाकर ढक दें | तब तक पकायें जब तक शकरकंद दबने न लगे | अधिक गलाए नहीं नहीं तो स्वाद बेकार हो जाता है |

इसे आप किसी भी फलाहार व्यंजन के साथ खा सकती हैं |

________________रेखा अस्थाना

 

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Pujan Samagri for the Worship of Ma Durga

माँ दुर्गा की उपासना के लिए पूजन सामग्री

Katyayani Dr. Purnima Sharma
Katyayani Dr. Purnima Sharma

साम्वत्सरिक नवरात्र चल रहे हैं और समूचा हिन्दू समाज माँ भगवती के नौ रूपों की पूजा अर्चना में बड़े उत्साह, श्रद्धा और आस्था के साथ लीन है | इस अवसर पर कुछ मित्रों के आग्रह पर माँ दुर्गा की उपासना में जिन वस्तुओं का मुख्य रूप से प्रयोग होता है उनके विषय में लिखना आरम्भ किया है | पारम्परिक रूप से जो सामग्रियाँ माँ भगवती की उपासना में प्रमुखता से प्रयुक्त होती हैं उनका अपना प्रतीकात्मक महत्त्व होता है तथा प्रत्येक सामग्री में कोई विशिष्ट सन्देश अथवा उद्देश्य निहित होता है…

अभी तक हमने कलश तथा कलश स्थापना और वन्दनवार तथा यज्ञादि में प्रयुक्त किये जाने वाले आम्रपत्र और आम्र वृक्ष की लकड़ी, दीपक तथा पुष्पों इत्यादि के विषय में लिख चुके हैं… अब आगे…

घट स्थापना में तथा पूजा कार्य में नारियल का विशेष महत्त्व होता है | नारियल के गुणों से तो हम सभी परिचित हैं | शीतल तथा स्निग्ध गुण धर्म इसका होता है | माना जाता है कि इसमें सभी देवों का वास होता है तथा देवी को यह अत्यन्त प्रिय होता है – इसीलिए नारियल को संस्कृत में श्रीफल कहा जाता है | किसी भी शुभकार्य के आरम्भ में नारियल तोड़ने की प्रथा है – नारियल के बाह्य आवरण को यदि अहंकार का प्रतीक तथा भीतरी भाग को पवित्रता और शान्ति का प्रतीक माना जाए तो इसका महत्त्व स्वतः ही समझ में आ जाता है | पूजा की समाप्ति पर नारियल तोड़ने का भी यही अभिप्राय है कि व्यक्ति ने अपने अहंकार को समाप्त कर दिया | नारियल में ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनों देवों का वास माना जाता है |

कुछ लोगों की ऐसी भी मान्यता है कि एक समय धार्मिक कार्यों में मनुष्य और पशुओं की बलि सामान्य बात थी | कहते हैं उस समय आदि शंकराचार्य ने इस अमानवीय परम्परा को तोड़ा और मनुष्य अथवा पशु के स्थान पर नारियल अर्पित करने की प्रथा आरम्भ की | नारियल देखा जाए तो मनुष्य के मस्तिष्क से मेल खाता है | नारियल की जटा की तुलना मनुष्य के बालों से, कठोर कवच की तुलना मनुष्य की खोपड़ी से, भीतर के गूदे की तुलना मनुष्य के दिमाग़ से नारियल पानी की तुलना रक्त से की जा सकती है |

नारियल से पूर्व कलश में जो दूर्वा, कुश, सुपारी, पुष्प आदि डाले जाते हैं उनमें भी यही भावना निहित होती है कि हमारे भीतर दूर्वा जैसी जीवनी शक्ति बनी रहे, कुश जैसी

Coconut for puja
Coconut for puja

प्रखरता हमारे ज्ञान में विद्यमान रहे, सुपारी के समान गुणों से युक्त स्थिरता रहे तथा पुष्प के सामान सर्वग्राही गुणों का निवास हमारे मन में हो जाए |

इसके अतिरिक्त सुपारी को सभी देवों का प्रतीक भी माना जाता है और इसीलिए नवग्रह उपासना में नवग्रहों के प्रतीक स्वरूप सुपारी रखी जाती है | गणेश जी का रूप भी सुपारी को माना जाता है और गणेश जी की प्रतिमा न होने पर सुपारी में मौली बाँधकर उसे ही गणेश जी मानकर पूजा की जाती है | किसी भी अनुष्ठान में जहाँ पति पत्नी दोनों का होना अनिवार्य हो वहाँ यदि एक उपस्थित न हो तो उसके स्थान पर भी सुपारी को रखने की प्रथा है |

नवरात्रों के पावन नौ दिनों में दुर्गा माँ के नौ स्वरूपों की पूजा उपासना बड़े उत्साह के साथ की जाती है – चाहे चैत्र नवरात्र हों अथवा शारदीय नवरात्र | माँ भगवती को प्रसन्न करने के लिए और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए कुछ विशेष सामग्रियों से उनकी पूजा की जाती है | यद्यपि माँ क्योंकि एक माँ हैं तो साधारण रीति से की गई ईशोपासना भी उतनी ही सार्थक होती है जितनी कि बहुत अधिक सामग्री आदि के द्वारा की गई पूजा अर्चना | साथ ही जिसकी जैसी सुविधा हो, जितना समय उपलब्ध हो, जितनी सामर्थ्य हो उसी के अनुसार हर किसी को माँ भगवती अथवा किसी भी देवी देवता की पूजा अर्चना उपासना करनी चाहिए… वास्तविक बात तो भावना की है… भावना के साथ यदि अपने पलंग पर बैठकर भी ईश्वर की उपासना कर ली गई तो वही सार्थक हो जाएगी…

_________________कात्यायनी 

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Navaratri Special Falahari Recipes

नवरात्रि स्पेशल फलाहारी व्यंजन  

जैसा कि सब ही जानते हैं चैत्र नवरात्र चल रहे हैं और हर घर में माँ भगवती के नौ रूपों की पूजा अर्चना की जा रही है | आज चैत्र शुक्ल पञ्चमी – यानी पञ्चम नवरात्र है – देवी के स्कन्दमाता रूप की उपासना सबने की है | छान्दोग्यश्रुति के अनुसार भगवती की शक्ति से उत्पन्न हुए सनत्कुमार का नाम स्कन्द है, और उन स्कन्द की माता होने के कारण ये स्कन्दमाता कहलाती हैं | इसीलिये यह रूप एक उदार और स्नेहशील माता का रूप है |

या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता,

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः |

जब धरती पर राक्षसों का अत्याचार बढ़ता है माता अपने भक्तों की रक्षा करने के लिए सिंह पर सवार होकर दुष्टों का नाश करने निकल पड़ती हैं | युद्ध के लिए निकलना है लेकिन पुत्र के प्रति अगाध स्नेह भी है, माँ के कर्तव्य का भी निर्वाह करना है, इसलिए युद्धभूमि में भी सन्तान को साथ ले जाना आवश्यक हो जाता है एक माँ के लिए | साथ ही युद्ध में प्रवृत्त माँ की गोद में जब पुत्र होगा तो उसे बचपन से ही संस्कार मिलेंगे कि आततायियों का वध किस प्रकार किया जाता है – क्योंकि सन्तान को प्रथम संस्कार तो माँ से ही प्राप्त होते हैं – इन सभी तथ्यों को दर्शाता देवी का यह रूप है |  

नवरात्रों में लगभग प्रत्येक घर में फलाहार ही ग्रहण किया जाएगा | हम पिछले कुछ दिनों से अपने WOW India के सदस्यों द्वारा भेजी हुई भारतीय परम्परा के अनुसार बनाए जाने वाले फलाहारी पकवानों की रेसिपीज़ आपके साथ साँझा कर रहे हैं | इसी क्रम में आज हम दो रेसिपी प्रस्तुत कर रहे हैं… मखाने तो हाँ सब ही बड़े चाव से खाते हैं… कभी भून कर नमक लगाकर, तो कभी ऐसे ही बिना भुने… कभी तलकर तो कभी खीर बनाकर… अनेक प्रकार से मखानों का सेवन हम करते हैं… पर क्या आपने कभी मखाने की पूरी बनाकर खाई हैं…? नहीं…? तो आइये आज सीखते हैं अर्चना गर्ग जी से… भई कुट्टू और रागी आदि की पूरियाँ तो बहुत खा लीं व्रत के दिनों में… आज मखाने की पूरी खाते हैं… स्वास्थ्य के लिए भी मखाने बहुत लाभकारी होते हैं… डॉ पूर्णिमा शर्मा…

मखाने के पराँठे या पूरी के लिए सामग्री…

Fox Nut Puri
Fox Nut Puri
  • हम मखानों में से बिना फूले हुए मखाने चुन लेते हैं – जिन्हें ठुड्डी कहा जाता है | | इसको हम मिक्सी में महीन पीस लेते हैं | उसके बाद इसको चलनी से छान के ऊपर का मोटा वाला आटा यानी चोकर अलग कर देंगे और नीचे का बारीक वाले आटे से हम पूरियाँ बनाएँगे | तो ये दो कटोरी आटा
  • दो आलू उबले हुए मीडियम साइज के
  • थोड़ा देसी घी पूरी तलने के लिए
  • आधा चम्मच सेंधा नमक

बनाने की विधि…

एक बाउल में आटा ले लिया | दो उबले हुए आलू अच्छे से कद्दूकस करके मैश कर लिए और उसमें नमक डाल दिया। अब उसमें थोड़ा थोड़ा पानी डालकर उसका रोटी जैसा आटा सान लिया | मखाने का आटा फूलता बहुत है इसका ध्यान रखना है | इसको 15 मिनट ढक के रख दिया | 15 मिनट बाद देखा अगर वह खड़ा है तो थोड़ा सा पानी और डालकर उसको मुलायम दो | अब जैसे हम रोटी की लोई बनाते हैं ऐसे सब लोई तोड़ कर रख ले | चकले पे जरा सा मखाने का आटा डाला, उसके ऊपर लोई रखी और जरा सा आटा और डाला और धीरे-धीरे उसको हाथ से भी थपक सकते हैं और बेलन से भी बोल सकते हैं | छोटी-छोटी पराठे तैयार करके तवे पर डाल दिया | देसी घी लगा लगा कर अच्छा गोल्डन ब्राउन दोनों तरफ से सेंक लिया | यह खाने में बहुत ही स्वादिष्ट लगता है | आप इसे चाहे तो पूरी की तरह भी तल सकते हैं | लेकिन घी काफी लग जाता है उसमें | पराठे बहुत स्वाद लगते हैं | न्यूट्रीशन वैल्यू बहुत है – जैसा कि सभी को मालूम है कि मैं खाने में कितने गुण होते हैं |

 

दही की अरबी के लिए सामग्री…

मखाने की पूरी या पराँठे तो हमने तैयार कर लिए, लेकिन इन्हें खाएँगे किसके साथ ? क्यों न दही वाली अरबी बनाई जाएँ… इसके लिए…

  • आधा किलो उबली हुई अरबी
  • 1 कटोरी दही हल्की खट्टी
  • नमक स्वादानुसार
  • एक बड़ा चम्मच देसी घी

    Dahi ki arbi
    Dahi ki arbi
  • दो हरी मिर्च
  • चौथाई कप कटा हुआ बारीक हरा धनिया
  • आधा चम्मच गरम मसाला
  • दो कप पानी

बनाने की विधि…

कढ़ाई में घी डाला | उसके बाद उसमें दही डाला और सारे मसाले डाल दिए | उसे लगातार चलाते रहें नहीं तो दही फट जाएगी | अब उसमें उबली हुई अरबी दो दो पीस काट कर डाल दिए और उसे चलाते रहे | फिर दो कप पानी डाल दिया | जब वह अच्छे से खनक जाए तो लटपट दही की अरबी हमारी तैयार हो गई |

यह मखाने की पूरी के साथ या पराठे के साथ बहुत ही स्वादिष्ट लगती है तो लीजिए हमारा व्रत का खाना तैयार है आप भी खाइए दूसरों को भी खिलाइए और बताइए कैसा लगा आपको यह खाना…

_____________________अर्चना गर्ग

 

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Pujan Samagri for the Worship of Ma Durga

माँ दुर्गा की उपासना के लिए पूजन सामग्री

साम्वत्सरिक नवरात्र चल रहे हैं और समूचा हिन्दू समाज माँ भगवती के नौ रूपों की पूजा अर्चना में बड़े उत्साह, श्रद्धा और आस्था के साथ लीन है | इस अवसर पर कुछ

Katyayani Dr. Purnima Sharma
Katyayani Dr. Purnima Sharma

मित्रों के आग्रह पर माँ दुर्गा की उपासना में जिन वस्तुओं का मुख्य रूप से प्रयोग होता है उनके विषय में लिखना आरम्भ किया है | अभी तक हमने कलश तथा कलश स्थापना और वन्दनवार तथा यज्ञादि में प्रयुक्त किये जाने वाले आम्रपत्र और आम्र वृक्ष की लकड़ी, जौ और दीपक के विषय में लिखने का प्रयास किया था | अब आगे…

किसी भी पूजा में पुष्पों का प्रयोग भी किया जाता है | दुर्गा सप्तशती में श्री दुर्गा मानस पूजा में मन्त्र आता है…

कह्लारोत्पलनागकेसरसरोजाख्यावलीमालती-
मल्लीकैरवकेतकादिकुसुमै रक्ताश्वामारादिभिः |
पुष्पैर्माल्यभरेण वै सुरभिणा नानारसस्रोतसा
ताम्राम्भोजनिवासिनीं भगवतीं श्रीचण्डिकां पूजये ||10||

अर्थात… हम कह्लार, उत्पल, नागकेसर, मालती, मल्लिका, कुमुद, केतकी तथा लाल कनेर आदि पुष्पों से तथा सुगन्धित पुष्पमालाओं से और नाना प्रकार के रसों की धारा से लाल कमल के भीतर निवास करने वाली श्री चण्डिका देवी की पूजा करते हैं |

इनमें कह्लार तथा उत्पल – कह्लार और उत्पल – दोनों ही अलग अलग प्रकार के कमल पुष्पों के नाम हैं तथा भारत के राष्ट्रीय पुष्प हैं | इनका बहुगुणीय औषधि के रूप में भी उपयोग होता है | कमल को पंकज अर्थात कीचड़ में उत्पन्न होने वाला पुष्प भी कहा जाता है और सम्भव है इसीलिए इसे आध्यात्मिकता, ज्ञान और पवित्रता का प्रतीक के रूप में भी जाना जाता है – अर्थात जो इस असार संसार रूपी कीचड़ से अध्यात्म की ओर ले जाए |

नागकेसर – जिसे नागचम्पा भी कहते हैं तथा यह भी पीले रंग का होता है तथा कषैले स्वाद का होता है | यह एक सदाबहार छायादार वृक्ष है | इस पुष्प से भी औषधि तथा मसाले बनाए जाते हैं |

मधु मालती – इससे मधु प्राप्त होता है और इसे मोगरे अथवा का पुष्प भी कहते हैं – मल्लिका भी इसी का एक प्रकार है, कुमुद – यह कमल के पुष्प जैसा ही पुष्प होता है तथा इसके गुण धर्म भी कमल के ही समान होते हैं | इसी प्रकार केतकी अर्थात केवड़े का पुष्प – हर कोई इसके गुण धर्म से भी परिचित है | इस प्रकार ज्ञात होता है कि भगवती को सभी सुगन्धित तथा शीतलता और बल प्रदान करने वाले पुष्प प्रिय हैं | क्योंकि पुष्पों के अनेकों रंगों से तथा उनकी सुगन्धि से असीम शक्ति और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है |

इसके अतिरिक्त ऐसी भी मान्यता है कि भगवती के शैलपुत्री रूप को श्वेत कनेर का पुष्प अधिक प्रिय है | ब्रह्मचारिणी को वटवृक्ष के पत्र और पुष्प, चंद्रघंटा को शंखपुष्पी – जिसे शारीरिक पराक्रम तथा मानसिक ज्ञान में वृद्धिकारक और सुख समृद्धि का कारक भी माना जाता है, कूष्माण्डा देवी को पीत पुष्प और कूष्माण्ड अर्थात जिसे हम कद्दू या सीताफल आदि नामों से भी जानते हैं, स्कन्दमाता को नीले रंग के पुष्प, कात्यायनी देबी को बेर के पुष्प, कालरात्रि को गुँजा अर्थात रत्ती की माला, महागौरी मौली यानी कलावा मात्र अर्पित करने से प्रसन्न हो जाती हैं तथा सिद्धिदात्री के रूप में भगवती को गुड़हल के पुष्प अधिक प्रिय हैं |

इसके अतिरिक्त बहुत से सुगन्धि द्रव्यों का भी पूजा में उपयोग किया जाता है… मांसीगुग्गुलचन्दनागुरुरजः कर्पूरशैलेयजै-
र्माध्वीकैः सह कुङ्कुमैः सुरचितैः सर्पिर्भिरामिश्रितैः |
सौरभ्यस्थितिमन्दिरे मणिमये पात्रे भवेत् प्रीतये
धूपोऽयं सुरकामिनीविरचितः श्रीचण्डिके त्वन्मुदे ||11||

अर्थात, हे चण्डिका देवि ! देव वधुओं के द्वारा तैयार किया हुआ यह दिव्य धूप आपकी प्रसन्नता में वृद्धि करे | यह धूप रत्नमय पात्र में – जो सुगन्धि का निवास स्थान है – रखा

Flowers
Flowers

हुआ है, तथा इसमें जटामांसी – डिप्रेशन और तनाव दूर करता है तथा इम्यून सिस्टम को ठीक रखता है, गुग्गुल – गुग्गुल भी सूजन तथा जोड़ों में दर्द के सहित अनेक रोगों में लाभकारी माना जाता है, चंदन, अगुरु – जो देखने में गोंद जैसा होता है तथा यह भी अनेक रोगों में लाभकारी माना जाता है – का चूर्ण, कपूर, शिलाजीत, मधु, कुमकुम और घी मिलाकर उत्तम रीति से इसे बनाया गया है | अर्थात धूप में जितने भी पदार्थ मिलाए जाते हैं वे सभी सुगन्धित होने के साथ ही अनेकों आयुर्वेदीय गुणों के भण्डार भी होते हैं |

ध्यान देने योग्य बात है कि ये सबही पौराणिक आख्यान हैं और इनमें से बहुत सी वस्तुएँ तो आज के युग में सरलता से उपलब्ध भी नहीं हैं, और यदि हैं भी तो महँगी होने के कारण बहुत से लोगों की पहुँच से बाहर हैं | तो यदि ये समस्त सामग्रियाँ नहीं होंगी तो भगवती भक्तों की पूजा स्वीकार नहीं करेंगी ?

इसीलिए हम बार बार यही कहते हैं कि पूजन सामग्री के फेर में न पड़कर केवल भावना की सामग्री से देवी की उपासना की जाए… माँ उसी से प्रसन्न हो जाएँगी… इसीलिये बोला जाता है “पुष्पाणि समर्पयामि ऋतुकालोद्भवानि च…” अर्थात जिस ऋतु में पूजा की जा रही है तथा जिस स्थान पर पूजा की जा रही है उस समय और उस स्थान पर जो पुष्प उत्पन्न होते हैं वे हम आपको समर्पित करते हैं…

माँ भगवती के सभी रूप अल्पात्यल्प सामग्री से की पूजा को भी ग्रहण करते हुए प्राणिमात्र की रक्षा करें तथा सभी की मनोकामनाएँ पूर्ण करें यही कामना है…

____________________कात्यायनी डॉ पूर्णिमा शर्मा

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Navaratri Special Falahari Recipes

नवरात्रि स्पेशल – फलाहारी रेसिपीज़

जैसा कि सब ही जानते हैं चैत्र नवरात्र चल रहे हैं और हर घर में माँ भगवती के नौ रूपों की पूजा अर्चना की जा रही है | आज चैत्र शुक्ल तृतीया – यानी तीसरा नवरात्र है – देवी के चन्द्रघंटा रूप की उपासना का दिन | देवी कूष्माण्डा – सृष्टि की आदिस्वरूपा आदिशक्ति | इनका निवास सूर्यमण्डल के भीतरी भाग में माना जाता है | अतः इनके शरीर की कान्ति भी सूर्य के ही सामान दैदीप्यमान और भास्वर है | इनके तेज और प्रकाश से दसों दिशाएँ प्रकाशित हो रही हैं | ब्रह्माण्ड की सभी वस्तुओं और प्राणियों में अवस्थित तेज इन्हीं की छाया है | कुत्सितः ऊष्मा कूष्मा – त्रिविधतापयुतः संसारः, स अण्डे मांसपेश्यामुदररूपायां यस्याः स कूष्माण्डा – अर्थात् त्रिविध तापयुक्त संसार जिनके उदर में स्थित है वे देवी कूष्माण्डा कहलाती हैं…

नौ दिन चलने वाले नवरात्रों  में लगभग प्रत्येक घर में फलाहार ही ग्रहण किया जाएगा | हम पिछले कुछ दिनों से अपने WOW India के सदस्यों द्वारा भेजी हुई भारतीय परम्परा के अनुसार बनाए जाने वाले फलाहारी पकवानों की रेसिपीज़ आपके साथ साँझा कर रहे हैं | इसी क्रम में आज प्रस्तुत कर रहे हैं कुट्टू के आटे की पूरी अमरूद की सब्ज़ी के साथ… जो हमें भेजी है रेखा अस्थाना जी ने… और उसके बाद मीठे के लिए अरबी के गोंद की रेसिपी… अरबी का गोंद…? जी, सही पढ़ा आपने… अरबी का गोंद… जो हमें सिखाएँगी अर्चना गर्ग जी… तो पहले बनाते हैं कुट्टू की पूरी के साथ अमरूद की सब्ज़ी… डॉ पूर्णिमा शर्मा…

कुट्टू के आटे की पूरी (पूड़ी )के साथ अमरूद की सब्जी

सभी कुट्टू की पूरी बनाना जानते हैं | पर आपको मैं फिर से बनाना बता रही हूँ…

सामग्री…

  • कुट्टू का आटा 250 ग्रा०, आटे को हमेशा छलनी से छान लिया करें
  • आलू या अरबी (चार ) उबले हुए
  • सेंधा नमक स्वादानुसार

    Sabzi puri
    Sabzi puri
  • तलने के लिए रिफाइंड

बनाने की विधि…

उबले हुए आलू या अरबी को छीलकर मसल लें | अब कुट्टू के आटे में नमक और ये मैश किये हुए आलू या अरबी मिलाकर आटे को सख्त सा सान लें | ध्यान रहे जब व्रत खोलना हो उसके कुछ समय पूर्व ही आटा साने | पहले से सानने से आटा बेकार हो जाता है | ढीला पड़ जाता है फिर पूड़ी बिलती नहीं है | कड़े आटे की पूड़ी ख़स्ता होती है | अब इस आटे की लोई बनाकर रख लें और एक एक करके पूड़ियाँ तलकर निकाल लें | आप इन्हें दही के साथ भी परोस सकते हैं और अमरूद की सब्ज़ी के साथ तो ये बेहद स्वाद लगती हैं |

तो अब बनाते हैं अमरूद की सब्ज़ी…

सामग्री…

  • आधा किलो अमरूद
  • हरी मिर्च
  • हरी धनिया
  • काली मिर्च
  • सेंधा नमक एक टी स्पून
  • जीरा एक टी स्पून
  • नीबूं .एक
  • चीनी… तीन टी स्पून

अमरूद को चाकू से छील लें | फिर उसके बीज चाकू से निकाल कर अलग कर दें | अब बारीक बारीक अमरूद को काट लें | पैन में बस एक चम्मच घी डालकर जीरे और हरी मिर्च का तडका लगाएँ | अब उसे चलाकर ढक दें | पाँच मिनट के बाद उसमें सेंधा नमक डाल कर फिर पकाएँ | जब पकने को हो उसमें चीनी डालकर एक नींबू निचोड़ कर चलाकर ढक दें | अब आपकी विटामिन सी से भरपूर एनर्जी देने वाली सब्जी बनकर तैयार है।

भाई मेहनत तो है, पर पौष्टिकता से भरपूर विटामिन सी युक्त भोजन है | तो आज ही तैयारी कर लीजिए | और हाँ, अमरूद पके हों तो सब्जी ज्यादा अच्छी बनती है |

साथ में कोई भी चटनी बना सकती हैं | व्रत की चटनी को सिलबट्टे से ही पीसे बस खाने भर का ही पीसे | एक साथ पीस कर सात दिन न चलाएँ | व्रत का भोजन कभी रखा हुआ नहीं खाते हैं | हमेशा खाने पूर्व ही बनाएँ |

________________रेखा अस्थाना

 

और अब… कुछ मीठा हो जाए…? तो सीखते हैं अर्चना गर्ग से अरबी का गोंद बनाने की विधि…

सामग्री…

  • 1kg अरबी थोड़ी मोटी और बड़ी
  • तलने के लिए ढाई सौ ग्राम देसी घी
  • 300 ग्राम चीनी
  • डेढ़ सौ ग्राम पानी

बनाने की विधि…

Sweet chips of Taro root
Sweet chips of Taro root

सबसे पहले हमने अरबी को अच्छे से छिलके उसे पानी से रगड़ रगड़ के धो लिया | फिर सूखे कपड़े से उसे अच्छी तरीके से पोंछ लिया | जब उसका लिसलिसापन खत्म हो गया तो चिप्स वाली मशीन में उसके चिप्स बना लिए और एक धोती के कपड़े पर उसे फैला दिए और पंखा चला दिया | 10 मिनट में वह हल्के हल्के से फरहरे ऐसे हो जाएंगे | फिर कढ़ाई में घी गरम करने के लिए रख दें | जब घी गरम हो जाए तो उसमें थोड़े-थोड़े चिप्स डालती जाएं | जब वह गोल्डन ब्राउन हो जाएं तो उन्हें निकाल निकाल कर रखती रहे | इस तरह से सारे चिप्स तल ले |

अब दूसरी कढ़ाई में पानी और चीनी चढ़ा दें | जब चीनी घुल जाए अच्छी तरीके से और दो तार की चाशनी बन जाए तब उसमें सारे चिप्स डाल दें और उनको चलाती रहे ताकि सबके ऊपर चाशनी चढ़ जाए और एक एक चिप्स खिल जाए | लीजिए अरबी का गोंद तैयार हो गया | यह खाने में बहुत ही स्वादिष्ट लगता है और मां का भोग भी लग गया | इसे अरबी के मीठे चिप्स भी कह सकते हैं…

अस्तु, अन्त में, समस्त देवताओं ने जिनकी उपासना की वे देवी कूष्माण्डा के रूप में सबके सारे कष्ट दूर कर हम सबका शुभ करें…

 

bookmark_borderVIBRATE HIGHER

VIBRATE HIGHER

The Spiritually inclined will understand:

The covid virus has a vibration of 5.5hz and dies above 25.5hz.

Dr. Sharda Jain
Dr. Sharda Jain

For humans with a higher vibration, infection is a minor irritant that is soon eliminated!

The reasons for having low vibration could be:

Fear, Phobia, Suspicion

Anxiety, Stress, Tension.

Jealousy, Anger, Rage

Hate, Greed

Attachment or Pain

And so……we have to understand to vibrate higher, so that the lower frequency does not weaken our immune system.

The frequency of the earth today is 27.4hz. but there are places that vibrate very low like:

Hospitals

Assistance Centers.

Jails

Underground etc.

It is where the vibration drops to 20hz, or less.

For humans with low vibration, the virus becomes dangerous.

Pain 0.1 to 2hz.

Fear 0.2 to 2.2hz.

Irritation 0.9 to 6.8hz.

Noise 0.6 to 2.2hz.

Pride 0.8 hz.

Superiority 1.9 hz.

A higher vibration on the other hand is the outcome of the following behaviour :-

Generosity 95hz

Gratitude 150 hz

Compassion 150 hz or more.

The frequency of Love and compassion for all living beings is 150 Hz and more.

Unconditional and universal love from 205hz

So…Come on …

Vibrate Higher!!!

VIBRATE HIGHER
VIBRATE HIGHER

What helps us vibrate high?

Loving, Smiling, Blessing, Thanking, Playing, Painting, Singing, Dancing, Yoga, Tai Chi, Meditating,  Walking in the Sun, Exercising, Enjoying nature, etc.

 Foods that the Earth gives us: seeds-grains-cereals-legumes-fruits and vegetables-

Drinking water: help us vibrate higher ….. !!!

The vibration of prayer alone goes from 120 to 350hz

So sing, laugh, love, meditate, play, give thanks and live !

Let’s vibrate high …!!!

This information is  compiled & edited by Naturotherapist Dr.  Harshal Sancheti, Nasik but

the original source of this information is anormous literature on sprituality

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An article by the Chairperson of WOW India Dr. Sharda Jain

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Pujan Samagri for the Worship of Ma Durga

Katyayani Dr. Purnima Sharma
Katyayani Dr. Purnima Sharma

माँ दुर्गा की उपासना के लिए पूजन सामग्री

साम्वत्सरिक नवरात्र चल रहे हैं और समूचा हिन्दू समाज माँ भगवती के नौ रूपों की पूजा अर्चना में बड़े उत्साह, श्रद्धा और आस्था के साथ लीन है | इस अवसर पर कुछ मित्रों के आग्रह पर माँ दुर्गा की उपासना में जिन वस्तुओं का मुख्य रूप से प्रयोग होता है उनके विषय में लिखना आरम्भ किया है | कल अपनी अल्पबुद्धि से कलश तथा कलश स्थापना और वन्दनवार तथा यज्ञादि में प्रयुक्त किये जाने वाले आम्रपत्र और आम्र वृक्ष की लकड़ी और जौ के विषय में लिखने का प्रयास किया था | आज आगे…

आज हम बात करते हैं दीपक की | किसी भी पूजा में दीपक का बहुत महत्त्व होता है | पूजा में कहा जाता है ““भो दीप त्वम् ब्रह्मस्वरूप: अन्धकारनिवारक:, इमां मया कृतां पूजां गृहाण तेजो प्रर्द्धय”…” इत्यादि इत्यादि | अन्धकार – सबसे बड़ा अन्धकार तो अज्ञान का ही होता है, गले सड़े ऐसे रीति रिवाज़ों का होता है जो मानव समाज को बेड़ियों में जकड़े रहते हैं और इसी कारण से मानव मात्र की प्रगति में बाधक होते हैं, दुर्भावों का होता है | तो समस्त प्रकार के अन्धकार को दूर भगाने की प्रार्थना दीप प्रज्वलन के समय की जाती है |

माँ भगवती की उपासना में तथा अन्य भी पूजा अर्चना में प्रायः घी का अखण्ड दीप प्रज्वलित करने की प्रथा है | गौ घृत हो तो अत्युत्तम, अन्यथा कोई भी घी चल सकता है | दीप प्रज्वलित करने से वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होता है, नकारात्मक ऊर्जाएँ समाप्त होती हैं तथा आस-पास का वातावरण शुद्ध हो जाता है | दीप प्रज्वलन के समय मन्त्र बोले जाते हैं:

शुभं करोति कल्याणं आरोग्यं धनसम्पदा |

शात्रुबुद्धिविनाशाय दीपकाय नमोSस्तु ते ||

दीपो ज्योति परम ब्रह्म दीपो ज्योतिर्जनार्दान: |

दीपो हरतु में पापं सन्ध्यादीप नमोSस्तु ते ||

अर्थात, सुख और कल्याण करने वाले, आरोग्य प्रदान करने वाले, धन सम्पत्ति प्रदान करने वाले तथा शत्रुओं की बुद्धि का विनाश करने वाले दीप को हम नमस्कार करते हैं | स्पष्ट है कि व्यक्ति के मन से – विचारों से – अज्ञान तथा नकारात्मकता का अन्धकार जब छंट जाएगा तभी वह कुछ सकारात्मक और क्रियात्मक दिशा में प्रयास कर सकेगा | और इस सकारात्मकता के कारण उसका मानसिक स्वास्थ्य ठीक रहेगा – तथा मानसिक स्वास्थ्य ठीक रहेगा तो शारीरिक स्वास्थ्य तो स्वयं ही ठीक रहेगा | दीपक की ऊँची उठती लौ किसी भी प्रकार अज्ञान को – चाहे वह अज्ञान का हो, अशिक्षा का हो, नकारात्मकता का हो – कैसा भी अज्ञान हो – मिटाकर जीवन में निरन्तर कर्मशील रहने तथा उन्नति के पथ पर अग्रसर रहने की प्रेरणा देती है |

अखण्ड दीप को पूजा स्थल के आग्नेय कोण अर्थात दक्षिण पूर्व दिशा में रखना शुभ माना जाता है | दीप एक साधक के लिए साधना में सहायक नेत्र और हृदय ज्योति का भी प्रतीक है |

Deepak
Deepak

दीप प्रायः गौ के देसी घी से प्रज्वलित किया जाता है | यदि उपलब्ध न हो तो तिल अथवा सरसों के तेल से भी दीप प्रज्वलित कर सकते हैं – किन्तु रिफायंड का प्रयोग कभी नहीं करना चाहिए – न पूजा में और न ही भोजन बनाने में | गाय से प्राप्त हर वस्तु में पोषक तथा स्वास्थ्यवर्धक तत्व उपस्थित रहते हैं – चाहे वह दूध हो, गौ मूत्र हो, गाय का गोबर हो अथवा गाय के दूध से निर्मित पदार्थ हों जैसे घी, दही, मक्खन इत्यादि | इसीलिए पञ्चामृत में भी गाय के ही दूध, घी तथा दही का प्रयोग किया जाता है | साथ ही गाय के घी में बहुत से ऐसे तत्व भी पाए गए हैं जो रोगों से लड़ने की क्षमता प्रदान करते हैं | संस्कृत में घी को घृत कहा जाता है – जिसका अर्थ होता है सिंचित करने वाला, आलोकित करने वाला, उज्ज्वल करने वाला | इसी प्रकार तिल के तेल में भी तिल के औषधीय गुण निहित होते हैं, जैसे : यह मधुर होता है, वातशामक होता है, प्रकृति इसकी गर्म होती है तथा यह भी स्निग्धता प्रदान करता है | सरसों के तेल में भी इसी प्रकार के औषधीय गुण पाए जाते हैं | इसीलिए दीप प्रज्वलन तथा यज्ञादि के लिए गौ घृत सबसे अधिक उपयुक्त माना जाता है | और यदि न उपलब्ध हो सके तो तिल अथवा सरसों के तेल का प्रयोग करने की सलाह विद्वान् लोग देते हैं |

आज चैत्र शुक्ल तृतीया को भगवती के चंद्रघंटा रूप की उपासना का विधान है | भगवती का ये रूप सबका मंगल करे तथा सभी के जीवन तथा हृदयों से समस्त प्रकार के अन्धकार का उन्मूलन करे और सबको स्वास्थ्य प्रदान करे… यही कामना है…

________________कात्यायनी डॉ पूर्णिमा शर्मा 

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Navaratri Special Falahari Recipes

नवरात्रि स्पेशल – फलाहारी रेसिपीज़

जैसा कि सब ही जानते हैं चैत्र नवरात्र चल रहे हैं और हर घर में माँ भगवती के नौ रूपों की पूजा अर्चना की जा रही है | आज चैत्र शुक्ल तृतीया – यानी तीसरा नवरात्र है – देवी के चन्द्रघंटा रूप की उपासना का दिन | चन्द्रः घंटायां यस्याः सा चन्द्रघंटा – आह्लादकारी चन्द्रमा जिनकी घंटा में स्थित हो वह देवी चन्द्रघंटा के नाम से जानी जाती है – इसी से स्पष्ट होता है कि देवी के इस रूप की उपासना करने वाले सदा सुखी रहते हैं और किसी प्रकार की बाधा उनके मार्ग में नहीं आ सकती |

नौ दिन चलने वाले इस पर्व में लगभग प्रत्येक घर में फलाहार ही ग्रहण किया जाएगा | हम पिछले कुछ दिनों से अपने WOW India के सदस्यों द्वारा भेजी हुई भारतीय परम्परा के अनुसार बनाए जाने वाले फलाहारी पकवानों की रेसिपीज़ आपके साथ साँझा कर रहे हैं | इसी क्रम में आज हम फिर से दो रेसिपीज़ प्रस्तुत कर रहे हैं… पहली रेसिपी है दही भल्लों की और दूसरी एक ख़ास क़िस्म के शरबत की… तो, पहले खाने का कार्य हो जाए… जी हाँ, भल्ले… जिन्हें बड़े भी कहा जाता है… हम लोग मूँग की दाल, उड़द की दाल वगैरा के भल्ले तो अक्सर खाते ही हैं… लेकिन व्रत में तो ये खाए नहीं जा सकते… तो क्यों न कुट्टू ले आटे में लौकी मिलाकर उसके भल्ले बनाए जाएँ…? कैसे…? आइये सीखते हैं रेखा अस्थाना जी से… और फिर उन्हें पचाने के लिए आँवले का शरबत… जो हमें सिखाएँगी अर्चना गर्ग… डॉ पूर्णिमा शर्मा…

लौकी के भल्लों के लिए सामग्री…

  • लौकी… आधा किलो

    Dahi Balla
    Dahi Balla
  • कुट्टू का आटा एक कटोरी (कुट्टू का आटा सदैव छानकर ही इस्तेमाल करें)
  • दही… आधा किलो
  • सेंधा नमक… स्वादानुसार
  • भुना जीरा… दो स्पून
  • कटी हरी मिर्च… स्वादानुसार
  • अदरख यदि खाते हो तो – हमने आपसे पहले भी बताया है कि आवश्यक नहीं आप ये सारी चीज़ें इस्तेमाल करें, वही चीज़ें इस्तेमाल करें जो आपके घर में खाई जाती हैं
  • रिफाइंड ऑयल… तलने के हिसाब से

विधि…

लौकी छीलकर कद्दूकस कर लें | फिर उसका पानी निचोड़ लें | निचोड़ी हुई लौकी को जीरा और हरी मिर्च के साथ एक चम्मच रिफाइंड कढ़ाई में डालकर उसे पका लें और फिर ठंडा करके उसमें कुट्टू का आटा, सेंधा नमक और अदरख मिलाकर पेड़े का आकार देकर नानस्टिक में गुलाबी सेंक कर प्लेट पर रख लें |

इधर दही को फेंटकर उसमें नमक, भुना पिसा जीरा व हरी मिर्च तथा हरी धनिया मिलाकर तैयार रखें | जब व्रत खोलने का समय हो उससे दस मिनट पूर्व प्लेट में सजी लौकी के पेड़ों पर दही डालकर सर्व करें |

इनको वाराणसी में उपवासी दही बड़े कहा जाता है | इसे खाने से तन -मन दोनों ही स्वस्थ रहता है | पेट भी ठीक रहता है | इसी तरह कच्चे पपीते के भी भल्ले बनाए जा सकते हैं |

इनके साथ यदि इमली या अनारदाने की सोंठ हो या हरी चटनी भी हो तो स्वाद और अधिक बढ़ जाएगा…

_________रेखा अस्थाना

 

आंवले का शरबत

अभी हमने बहुत सारी व्रत की रेसिपी सीखी | आज हम आपको बताने जा रहे हैं आंवले का शरबत जो कि व्रत में पिया जा सकता है | यह सेहत के लिए बहुत ही फायदेमंद है | आंवले का शरबत बनाना बहुत ही आसान है | चलिए देखते हैं कि आंवले का शरबत कैसे बनाते हैं…

सामग्री…

Amle ka Sharbat
Amle ka Sharbat
  • एक कप आंवले का रस
  • दो कप चीनी
  • कुछ पुदीने के पत्ते
  • थोड़ा सा काला नमक
  • थोड़ा सा भुना जीरा
  • एक कप पानी

बनाने की विधि…

सबसे पहले हमने आंवले का एक कप जूस निकाला | आंवले का जूस निकालने के लिए आंवलों को महीन कद्दूकस में कस कर महीन जाली के कपड़े से छान छान कर कसके निचोड़ लीजिये |

अब कढ़ाई में चीनी और पानी डालकर उसे उबालने रख दीजिये | जब वह अच्छी तरह से उबल जाए तो उसमें चीनी मिलाकर गैस बंद कर दे और उसे ठंडा होने के लिए रख दें | जब वह बिल्कुल ठंडा हो जाए तो उसे कांच की बोतल में भरकर फ्रिज में भरकर रख दें | यह लगभग 2 से 3 महीने तक फ्रिज में चल सकता है | जब आपके घर में कोई आए या आपको खुद पीना हो तो ग्लास में चार चम्मच आंवले का शरबत डाल दें और कुछ क्रश किया हुआ बर्फ और पानी मिला दे | आप चाहे तो इसको सोडे में भी सर्व कर सकते हैं | सर्व करते समय इसमें थोड़ा सा काला नमक थोड़ा सा भुना जीरा और चार पांच पत्ते पुदीने के डालकर आप इसे सर्व करें यह बहुत ही स्वादिष्ट शरबत होगा |

आंवले में भरपूर मात्रा में विटामिन सी, कैल्शियम और कैंसर के बचाव के लिए एंटीऑक्सीडेंट गुण पाए जाते हैं | आंवले का जूस अल्सर की रोकथाम में बहुत गुणकारी है | वजन कम करने के लिए आंवला बहुत फायदेमंद है | आंख की रोशनी और बालों को काला करने के लिए यह एक रामबाण का काम करता है | साथ ही शरीर को ठंडक पहुँचाता है |

__________________अर्चना गर्ग

तो बनाइये लौकी के भल्ले और साथ में आनन्द लीजिये आंवले के शरबत का… माँ चन्द्रघंटा के रूप में भगवती सभी की रक्षा करें और सभी की समस्त मनोकामनाएँ पूर्ण करें… डॉ पूर्णिमा शर्मा…

 

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Pujan Samagri for the Worship of Ma Durga during

नवरात्रों में माँ दुर्गा की उपासना के लिए पूजन सामग्री

साम्वत्सरिक नवरात्र आरम्भ हो चुके हैं | इस अवसर पर नौ दिनों तक माँ भगवती के नौ रूपों की पूजा अर्चना की जाती है | कुछ मित्रों ने आग्रह किया था कि माँ दुर्गा की

Katyayani Dr. Purnima Sharma
Katyayani Dr. Purnima Sharma

उपासना में जिन वस्तुओं का मुख्य रूप से प्रयोग होता है उनके विषय में कुछ लिखें | तो, सबसे पहले तो बताना चाहेंगे कि हम एक छोटी सी अध्येता हैं… इतने ज्ञानी हम नहीं हैं कि इस प्रकार की चर्चाएँ कर सकें… किन्तु मित्रों के आग्रह को टाला भी नहीं जा सकता… इसलिए जो भी कुछ अल्पज्ञान हमें है उसी के आधार पर कुछ लिखने का प्रयास हम कर रहे हैं…

नवरात्रों के पावन नौ दिनों में दुर्गा माँ के नौ स्वरूपों की पूजा उपासना बड़े उत्साह के साथ की जाती है – चाहे चैत्र नवरात्र हों अथवा शारदीय नवरात्र | माँ भगवती को प्रसन्न करने के लिए और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए कुछ विशेष सामग्रियों से उनकी पूजा की जाती है | यद्यपि माँ क्योंकि एक माँ हैं तो जैसा कि हमने कल भी अपने लेख में लिखा था, साधारण रीति से की गई ईशोपासना भी उतनी ही सार्थक होती है जितनी कि बहुत अधिक सामग्री आदि के द्वारा की गई पूजा अर्चना | साथ ही जिसकी जैसी सुविधा हो, जितना समय उपलब्ध हो, जितनी सामर्थ्य हो उसी के अनुसार हर किसी को माँ भगवती अथवा किसी भी देवी देवता की पूजा अर्चना उपासना करनी चाहिए… वास्तविक बात तो भावना की है… भावना के साथ यदि अपने पलंग पर बैठकर भी ईश्वर की उपासना कर ली गई तो वही सार्थक हो जाएगी… तथापि, पारम्परिक रूप से जो सामग्रियाँ माँ भगवती की उपासना में प्रमुखता से प्रयुक्त होती हैं उनका अपना प्रतीकात्मक महत्त्व होता है तथा प्रत्येक सामग्री में कोई विशिष्ट सन्देश अथवा उद्देश्य निहित होता है…

सर्वप्रथम बात करते हैं कलश, आम्रपत्र और जौ की | यद्यपि इस विषय में एक लेख पहले भी प्रस्तुत कर चुके हैं | किन्तु आज के सन्दर्भ में, पुराणों में कलश को सुख-समृद्धि,

ऐश्वर्य और मंगल कामनाओं का प्रतीक माना गया है | मान्यता है कि कलश में सभी ग्रह, नक्षत्रों एवं तीर्थों का निवास होता है | घट स्थापना करते समय जो मन्त्र बोले जाते हैं उनका संक्षेप में अभिप्राय यही है कि घट में समस्त ज्ञान विज्ञान का, समस्त ऐश्वर्य का तथा समस्त ब्रह्माण्डों का समन्वित स्वरूप विद्यमान है | किसी भी अनुष्ठान के समय घट स्थापना के द्वारा ब्रह्माण्ड में उपस्थित शक्तियों का आह्वाहन करके उन्हें जागृत किया जाता है ताकि साधक को अपनी साधना में सिद्धि प्राप्त हो और उसकी मनोकामनाएँ पूर्ण हों | साथ ही घट स्वयं में पूर्ण है | सागर का जल घट में डालें या घट को सागर में डालें – हर स्थिति में वह पूर्ण ही होता है तथा ईशोपनिषद की पूर्णता की धारणा का अनुमोदन करता प्रतीत होता है “पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते” | इसी भावना को जीवित रखने के लिए किसी भी धार्मिक अनुष्ठान के समय घट स्थापना का विधान सम्भवतः रहा होगा | नवरात्रों में भी इसी प्रकार घट स्थापना का विधान है | इसके अतिरिक्त ब्रह्मा, विष्णु, रूद्र, सभी नदियों-सागरों-सरोवरों के जल, एवं समस्त देवी-देवता कलश में विराजते हैं | वास्तु शास्त्र के अनुसार ईशान कोण अर्थात उत्तर-पूर्व का कोण जल एवं ईश्वर का स्थान माना गया है और यहाँ सर्वाधिक सकारात्मक ऊर्जा रहती है | इसलिए पूजा करते समय देवी की प्रतिमा तथा कलश की स्थापना इसी दिशा में की जाती है |

आम्रपत्र तथा आम की टहनी और हवन के लिए आम की लकड़ी समिधा के रूप में प्रयोग की जाती है | माना जाता है कि आम के पत्ते वायु व जल में उपस्थित अनेक हानिकारक कीटाणुओं को नष्ट करने की सामर्थ्य रखते हैं | साथ ही आम के पत्तों से सकारात्मक ऊर्जा का संचार माना जाता है | बाहर से प्रवाहित होने वाली वायु भी आम के पल्लवों का स्पर्श करके स्वास्थ्यवर्धक हो जाती है | आम के वृक्ष पर प्रायः कीड़े नहीं लगते | इसकी सुगन्ध बहुत मनमोहक होती है – इतनी कि इसके पत्तों की सुगन्ध से देवी देवता भी प्रसन्न होते हैं | द्वार पर आम्रपल्लव की वन्दनवार लगाने से समस्त माँगलिक कार्य निर्विघ्न सम्पन्न होते हैं | इन्हीं समस्त कारणों से घट स्थापना करते समय आम्र पत्र प्रयोग में लाए जाते हैं |

घट स्थापना के साथ ही जौ की खेती भी शुभ मानी जाती है | किन्हीं परिवारों में केवल आश्विन नवरात्रों में जौ बोए जाते हैं तो कहीं कहीं आश्विन और चैत्र दोनों नवरात्रों में जौ बोने की प्रथा है | इन नौ दिनों में जौ बढ़ जाते हैं और उनमें से अँकुर फूट कर उनके नौरते बन जाते हैं जिनके द्वारा विसर्जन के दिन देवी की पूजा की जाती है | इसका एक पौधा चार पाँच महीने तक हरा भरा रहता है | सम्भवतः इसीलिए यव को समृद्धि, शान्ति और उन्नति और का प्रतीक माना जाता है | ऐसी भी मान्यता है कि जौ उगने की गुणवत्ता से भविष्य में होने वाली घटनाओं का पूर्वानुमान लगाया जा सकता है | माना जाता है कि यदि जौ शीघ्रता से बढ़ते हैं तो घर में सुख-समृद्धि आती है वहीं अगर ये बढ़ते नहीं अथवा मुरझाए हुए रहते हैं तो भविष्य में किसी तरह के अनिष्ट का संकेत देते हैं | आश्विन-कार्तिक में इसकी बुआई होती है और चैत्र-वैशाख में कटाई | यह भी एक कारण दोनों नवरात्रों में जौ की खेती का हो सकता है | ऐसी भी मान्यता है कि सृष्टि के आरम्भ में सबसे पहली फसल जो उपलब्ध हुई वह जौ की फसल थी | इसीलिए इसे पूर्ण फसल भी कहा जाता है | यज्ञ आदि के समय देवी देवताओं को जौ अर्पित किये जाते हैं | एक कारण यह भी प्रतीत होता है कि अन्न को ब्रह्म कहा गया है और उस अन्न रूपी ब्रह्म का सम्मान करने के उद्देश्य से भी सम्भवतः इस परम्परा का आरम्भ हो सकता है |

_______________________कात्यायनी

 

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Navaratri Special – Falahari Recipes

नवरात्रि स्पेशल – फलाहारी रेसिपीज़

जैसा कि सब ही जानते हैं, आज से माँ भगवती के नौ रूपों की उपासना का पर्व नवरात्र आरम्भ हो चुके हैं | आज दूसरा नवरात्र है – देवी के ब्रह्मचारिणी रूप की उपासना आज की जाती है | नौ दिन चलने वाले इस पर्व में लगभग प्रत्येक घर में फलाहार ही ग्रहण किया जाएगा | हम पिछले तीन दिनों से अपने WOW India के सदस्यों द्वारा भेजी हुई भारतीय परम्परा के अनुसार बनाए जाने वाले फलाहारी पकवानों की रेसिपीज़ आपके साथ साँझा कर रहे हैं | इसी क्रम में आज हम प्रस्तुत कर रहे हैं दो रेसिपीज़… पहली रेसिपी है लड्डुओं की और दूसरी एक ख़ास तरह की रबड़ी की… और अन्त में चलते चलते कुछ अपनी पसन्द का भी लिखा है… डॉ पूर्णिमा शर्मा

पहली रेसिपी है सफ़ेद तिल, बादाम और पेठे से बने लड्डू जो हमें सिखा रही हैं रेखा अस्थाना…

तिल, बादाम और पेठे से बने लड्डू
तिल, बादाम और पेठे से बने लड्डू

सामग्री…

  • बादाम…150 ग्रा०
  • तिल… 200 ग्रा० सफेद
  • पेठा मीठा तैयार… 200 ग्रा०

विधि…

बादाम को आधे छोटे चम्मच घी डालकर सेंक ले |

फिर कढा़ई को पोंछकर उसमें तिल भून लें | तिल तड़कने लगें तो उतार लें और ठण्डा होने दें |

पेठा कद्दूकस कर लें |

अब तिल, बादाम और पेठा सब मिलाकर लड्डू बाँध लें |

तो सबसे पहले माँ भगवती को भोग लगाकर अपने घर के लड्डू गोपाल को खिलाएँ… बच्चों को बार बार खिलाकर ही टेस्ट डेवेलप होता है अन्यथा इन सब चीज़ों को कोई पसन्द नहीं करता… खासकर आजकल के बच्चे… लेकिन पौष्टिकता से भरपूर ये लड्डू होते हैं और व्रत में इन्हें खाने से शरीर में ऊर्जा बनी रहती है… तो एक बार बनाकर ज़रूर देखें…

रेखा अस्थाना

 

और अब दूसरी रेसिपी… रबड़ी तो हम सभी बड़े चाव से खाते हैं… हम तो जिस नगर से आते हैं – नजीबाबाद से – क्या ग़ज़ब होती थी वहाँ की रबड़ी… अच्छी तरह से कढाए

आम की रबड़ी
आम की रबड़ी

हुए दूध की बनती थी वो रबड़ी और मुलायम लेकिन मोटे लच्छे भी होते थे हलके मीठे की उस रबड़ी में… अभी भी याद करते हैं तो मुँह में पानी भर आता है… लेकिन आज एक अलग ही तरह की रबड़ी हमें बनाना सिखा रही हैं अर्चना गर्ग… जी हाँ, के मौसम में आम की रबड़ी… आइये सीखते हैं…

आम की रबड़ी

सामग्री…

  • 1kg फुल क्रीम दूध
  • ½kg tight आम जिसका लच्छा बन सके
  • 1/4 चम्मच इलायची पाउडर
  • 1/2 कप कंडेंस्ड मिल्क या चीनी
  • 50 ग्राम बादाम और काजू सजाने के लिए

बनाने की विधि…

दूध को एक पैन में गर्म करने के लिए रख दें | जब वह उबलने लगे और 1/4 रह जाए तो गैस बन्द कर दें | अगर आप कंडेंस्ड मिल्क मिला रही हैं तो चीनी ना मिलाएं | साथ ही आम को कद्दूकस करके लच्छा बना लें | जब दूध बिल्कुल ठंडा हो जाए तो उसमें इलायची पाउडर और लच्छा मिला दें | लीजिए आम की रबड़ी तैयार है | इतनी सरल है बनाने में और खाने में बहुत स्वादिष्ट लगती है | नवरात्र के लिए स्पेशल मिठाई है | आम का सीजन भी आ गया है… तो आप भी खाएं औरों को भी खिलाएं…

_____________अर्चना गर्ग

 

कच्चे आलू का चीला

कच्चे आलू का चीला
कच्चे आलू का चीला

तो ये तो थीं दो बड़ी ही स्वादिष्ट मिठाइयाँ व्रत में खाने के लिए | अब क्यों न कुछ नमकीन भी हो जाए ? भई हमें कच्चे आलू के चीले बहुत पसन्द हैं | आपमें से बहुत से घरों में ये बनाए भी जाते होंगे | हर किसी की अपनी अपनी विधि होती है बनाने की… तो हम जिस तरह से बनाते हैं उसकी विधि आपको बता रहे हैं…

इसके लिए एक कच्चा आलू लीजिये | इसे छीलकर कद्दूकस में कस कर लच्छा बना लीजिये | लच्छा न अधिक मोटा हो न बारीक | मीडियम साइज़ में हो | आलू के लच्छे का सारा पानी निचोड़ लीजिये और इस लच्छे में अपने स्वाद के अनुसार नमक, बारीक कटी हुई हरी मिर्च, बारीक कटा हुआ अदरख और थोड़ा सा बारीक कटा धनिया मिला लीजिये | अब एक नॉन स्टिक पेन गर्म कीजिए | गर्म होने पर इस पर ब्रश की सहायता से हल्की सी चिकनाई चुपड़ दीजिये और आलू के लच्छे का जो घोल आपने बनाकर रखा है उसे इस पर चीले की तरह से फैला दीजिये | एक तरफ से सिक जाए तो पलट कर दूसरी ओर से ब्राउन होने तक सेक लीजिये | पलटना आराम से है ताकि टूट न जाए | लीजिये आपका गरमागरम करारा करारा आलू का चटपटा चीला तैयार है | इसे आँवले की चटनी के साथ सर्व कीजिए और ख़ुद भी खाइए | आँवले की चटनी की रेसिपी कल रखा जी ने बताई थी…

_________डॉ पूर्णिमा शर्मा