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bookmark_borderEducation is birth right of every child

Education is birth right of every child     

कल WOW India के पटल पर जागरूकता के विषय में कुछ लिखा जाना था | इस अवसर पर संस्था की Senior Vice President श्रीमती बानू बंसल ने एक कहानी लिखी, अच्छी लगी इसलिए आप सबके पढ़ने के लिए यहाँ पोस्ट कर रहे हैं… डॉ पूर्णिमा शर्मा

जागरूकता – शिक्षा हर बच्चे का जन्मसिद्ध अधिकार है

Mrs. Banu Bansal
Mrs. Banu Bansal

  स्नेहा पार्क में है | उसका रोज़ का शाम का समय पार्क में बीतता है | आज मौसम कुछ अच्छा है | कई दिन से बहुत गर्मी थी लेकिन आज दिन में दो घंटे बारिश हो जाने से अब अच्छा लग रहा था |

    उनकी मित्र मंडली अभी नहीं आयी थी | कुछ बच्चे खेल रहे थे | पास से जाने वाले बच्चे हो या बड़े, उनको नमस्ते करते हुए जाते |

  पास की झुग्गी बस्ती के बच्चों को पढ़ाती और क्राफ्ट सिखाती थी | आने वाले सब उनको पहचानते थे |

   जब वो अपने बेटा बहू के पास रहने आयी तो नये माहौल में उनका मन नहीं लग रहा था तो उनकी बहु शाम को उनको पार्क ले कर आयी और उनका परिचय वहाँ आने वाली महिलाओं से करवा दिया | धीरे धीरे वह उनसे परिचित हो गई थी |

उनके मन में विचार आया की पास की बस्ती के बच्चों के लिये काम करना चाहिए, और वो शाम के समय उन बच्चों को पढ़ना लिखना और क्राफ्ट सिखाने लगी | समय समय पर हेल्थ चेकअप कैम्प भी करवाती थी | उनकी महिला मित्र भी बढ़ चढ़ कर कार्य करती | बच्चे भी बड़ी संख्या में आने लगे थे | अब वह उनको सफ़ाई का महत्व भी बताती |

अब उनको लगने लगा था की बच्चों को अब स्कूल की आवश्यकता है और अब वो स्कूल के लिए प्रयत्न करने लगी |

  अपने क्षेत्र के विधायक और मंत्री जी से मिल कर बच्चों के भविष्य के लिए कार्य करने लगी | समय लगा लेकिन सफलता मिली और स्कूल का शुभारंभ हो गया |

 

 बच्चों के लिए देखा उनकी आँखों का सपना साकार हो गया | क्योंकि शिक्षा हर बच्चे का जन्मसिद्ध अधिकार है |

 समाज को जागरूक करने के लिए इस प्रकार के सपने देखना और उनके प्रति स्वयं भी जागरूक होना आवश्यक है |

 —–बानू बंसल

bookmark_borderलो आ गया वसन्त

लो आ गया वसन्त

दिग दिगंत में घुल रही, केसर रंग सुगन्ध

Katyayani Dr. Purnima Sharma
Katyayani Dr. Purnima Sharma

धरा उतारे आरता, प्रेमी भए वसन्त
मां वाणी ने धर दिया, सर पर सबके हाथ
तभी मुखर है लेखनी, जिसने पकड़ी आज

आमों की डाली पर भंवरे, गुन गुन गीत सुनाते हैं
कोयल की पंचम को सुनकर, कामदेव मुस्काते हैं
चंचल तितली डाल डाल पर, पुष्पों को चुम्बन देती
मस्त धरा भी सरसों की, वासन्ती चादर से ढकती
—–कात्यायनी
जी हां, अभी 14 फरवरी को मां वाणी की अर्चना के साथ ही स्वागत किया ऋतुराज वसन्त का वसन्त पंचमी के रूप में… इस अवसर पर कुछ रचनाकार मित्रों की बड़ी मनोहारी रचनाएँ प्राप्त हुईं जो आज इस संकलन में हम प्रकाशित कर रहे हैं… वरिष्ठ कवयित्री डा रमा सिंह की निम्न पंक्तियों के साथ…
1.
बुद्धि, विद्या, ज्ञान का, सिर पर रखती हाथ ।

डा रमा सिंह
डा रमा सिंह

कलम सदा उठती तभी, जब माँ देती साथ ।।
पीली चादर ओढ़कर, आए राज वसन्त ।
कामरूप धरती हुई, रतिमय दिशा दिगन्त ।।
बसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएं!
डा रमा सिंह🙏🙏🙏

2.
लेकिन वसन्त के राग की आलाप तानें आगे बढ़ाएं उससे पहले “वेलेंटाइन डे” के सन्दर्भ में पुलवामा के अमर शहीदों को श्रद्धानत भाव से नमन करते हुए रूबी शोम की विचारों को झकझोरने वाली एक रचना…
वैलेंटाइन डे याद रहा
पुलवामा तुम भूल गए
देश की खातिर जो

Ruby Shome
Ruby Shome

शहीद हुए
तुम वो कुर्बानी भूल गए
देश धर्म पर मिटने वाली
तुम वो 44 जवानी भूल गए
तुम को भी क्या ये याद नहीं
14 फरवरी 19 का दिन
पुलवामा पर हमला करते
वो कायर आतंकी थे
सीने पर जो गोली खाई
भारत मां के लाल, सिपाही थे
रक्त रंजित थी काया उनकी
चेहरे से लहू टपकता था
घायल होकर भी उनके
सीने में आग दहकता था
वो कुर्बानी शहीदों की
तुम वो शहादत भूल गए
वैलेंटाइन का लाल गुलाब तो याद रहा
तुम खून से लथपथ वीरों
को भूल गए
वैलेंटाइन डे याद रहा
पुलवामा तुम भूल गए।
रूबी शोम
3.
शिशिर बीता, बसंत ऋतु आई

तन- मन ने
उपवन – चितवन ने
ठिठुरन छोड़ी,
ली अंगड़ाई !

Dr. Neelam Verma
Dr. Neelam Verma

कोहरे का आवरण हटा
झांक रही प्रकृति छटा !
माँ सरस्वती के स्वागत में
कोकिल ने पंचम तान सुनाई !

सुनकर मीठे स्वर अनुरागी
देखो वह आम्रमंजरी जागी !
‘श्रीहरि’ को आमंत्रित करती
मधुमास की पीतवर्ण तरुणाई,
शिशिर बीता, बसंत ऋतु आई !
डा नीलम वर्मा
4.
बासन्ती रंग, ऊषा के छोर
से बिखर रहा कण कण में आज
सूरज की प्रियतमा ओढ़ चुनर
बिखराती किरणें साज साज ।

P.N. Mishra
P.N. Mishra

बज उठे सप्त स्वर दिशा दिशा
पावनी हवा में है संगीत
झंकृत वीणा की सुर लहरी
में कौन गा रहा मधुर गीत?

कोमल आलोक की धारा में
सतरंगी कण कण निखर गए
कुछ शिशिर बिंदु वाष्पित होकर
चंदन बन हवा में बिखर गए।

उस तरफ नाचता है मयूर
इस तरफ थिरकता श्वेत हंस
वेदों के मंत्र वाणी बन कर
गूंजते हैं चहुं दिस अंश अंश।

निर्झरा बह रही स्नेह धार
मां की आभा है सृष्टि व्याप्त
यह पुण्य पंचमी, है बसन्त
पुलकित है दिन पुलकित है रात

वेदों का ज्ञान, वीणा के स्वर
गति, ताल, छंद और अलंकार
भाषा, अभिलाषा की देवी!
हे सरस्वती! तुम्हें नमस्कार!
प्राणेंद्र नाथ मिश्र
5.
लो सखी आ गया बसन्त
खोला जो कपाट खिड़की का
भर गई कमरे में सुगन्ध

Rekha Asthana
Rekha Asthana

मंद मंद बयार चली
पिया ने किया आलिंगन।
लो सखी आ गया बसन्त
खगकुल उड़ चले अपना
चुग्गा खाने को
उधर बासन्ती सुगन्ध बयार ने भी
निवेदन किया अपने पास आने को।
लो देखो उड़ चली तितलियाँ भी
पुष्प वृंदा का रसपान करने को।
लो सखी आ गया फिर से बसन्त।
हर अंकुर ने ली अंगड़ाई स्वागत
करने का बसन्त को।
आमों की डाल पर बैठी कोयलिया
चित्कार उठी ,अब करो न देरी
देखो सखी आ गया बसन्त।
जब रोम-रोम खिल उठे
उर में प्रेम के भाव जगे
देखकर निज साजन को सजनी
कुछ गुनगुना उठे तभी समझो
लो सखी आ गया बसन्त
रेखा अस्थाना
6.
सर्दी की ठिठुरन से
शीत भरी सिहरन से
पाने निजात देखो आया बसंत
खेतों में झूमे सरसों की डाली

Ruby Shome
Ruby Shome

कोयलिया बोले बागों में काली
झूम झूम जाए आम की अमराई
चूम चूम जाए बदन हवा की अंगड़ाई
फागुन के आने का संदेशा बसंत
माघ के महीने में आता बसंत
बागों में फूलों का खिलना बसंत
खेतों में नई फसलों का, आना बसंत
सजी है आज धरती, करके श्रंगार
प्रकृति का कैसा देखो, अनुपम उपहार
झूम झूम आया ऋतु राज बसंत
बरसे बदरिया नृत्य करे मोर
मन के किसी कोने में, होने लगा शोर
चहुं ओर उत्सव है आया बसंत
धरा पर है होता, आगमन शारदे का
करें हम पूजन वंदन, मां शारदे का
वरदान हमको, देना ए माता
अंधेरा घना है,मिटा दो ए माता
पीले वस्त्र पीले रंग है पीला सब वातावरण
करती है आज धरा ऋतु राज का वरण
तरुवर से पात झरे, मधुवन में फूल खिले
हरियाली लेके आज फिर आया बसंत
सर्दी से ठिठुरन से
शीत भरी सिहरन से
पाने निजात देखो आया बसंत।
रूबी शोम
7.
खेत खलिहान डगर डगर पे, छाया बसन्त हैं जम के
मौसम हैं ये सुहाना, संग गाओ गीत उमंग के
सरसों इठला रही हैं और अमुवा की डाल पे मैना

Neeraj Saxena
Neeraj Saxena

धरती हुई बासंती, लगे पहनें सुनहरा गहना
त्योहारों की है रौनक, सजना हैं और संवरना
ऋतुराज दे निमंत्रण, आयेगा फाग महीना
सूरज की सुनहरी किरणें, पड़ती मचल मचल के
खेत खलिहान डगर पे, छाया बसन्त हैं जम के
हुई शीत ऋतु समापन, माघ पंचमी हैं आयी
माँ शारदे का पूजन, हैं बुद्धि विवेक दायी
पुष्पद को मिल रही हैं, नये कोपलों की दौलत
बौरों से लद गए हैं, आम्र व्रक्ष हुए हैं मादक
सब कुछ नया नया सा, देख आत्मा मुस्करायी
हर ओर हैं हरियाली, रंगत धरा पे छाई
वसुधा भी जँच रही हैं, चूनर नई पहन के
कोमल खिली हैं कलियां, उपवन में पुष्प महकें
खेत खलिहान डगर पे, छाया बसन्त हैं जम के
मौसम हैं ये सुहाना, संग गाओ गीत उमंग के
नीरज सक्सेना
8.
अमृत रस लिए आया है बसंत
चहुं और फैलाने स्वर्णिम खुशहाली,
विदा हो गया शीत का कोहरा और पतझड़,
आए हैं ऋतुराज राग रंग लेकर

मधु रुस्तगी
मधु रुस्तगी

उर स्पंदन में भरती प्रकृति की छटा निराली।
क्षितिज पर चमक आया है सूरज
लिए किरणें उम्मीदों की
गदराया धरती का यौवन यू जैसे
चले कामिनी इठलाती लिए गगरिया खुशियों की।
अमृत रस लिए आया है बसंत

पेड़ों ने जब डाला हरियाली का पालना
तो झूम उठी धरा ये मतवारी,
मीठे मीठे गीत सुनाती कोयलिया
फुदक रही देखो अंबुआ की डारी डारी,
मीठी मीठी धूप भी उतर आई है अंगना,
तो झूला झुलाने भी आ गई है मदमस्त पवन,
उदास हृदय में छाई अब सृजन की फुहार
आया बसंत लिए प्यार भरी विविध गंध और विपुल रंग।
अमृत रस लिए आया है बसंत

नवजात कोपलें फूट पड़ी है सुखी शाखाओं में
देखो तो जरा चटकीले हरे रंग में मुस्काती
हर टहनी पर झूल रही है बाकी चितवन लिए,
कुछ खिली अधखिली सुकुमारी कलियां लज़्जाती।
अमले तास पलाश जूही चंपा चमेली
सरसों के महकते फूलों की सजी है जो बारात,
और गुलाबी फूलों की महकती रूमानी खुशबू,
आहत हृदय को देती है प्रेम की प्यारी सी सौगातl
छाई है हवाओं में ये उल्लास की गंन्ध
जो चित में बजा रही है उमंग की मृदंग,
हर जीवन दहक रहा अब गुलमोहर सा,
उड़ता जा रहा यह मन उन्मुक्त स्वच्छंद।
अमृत रस लिए आया है बसंत

मन के मधुबन में जो मेरे थी मौन उदासी पतझड़ की,
सांकल खोल हृदय के भर ली खुशबू मैने वो बासन्ती सी,
दहकते फूलों की रंगत लेकर अपने गीतों की लड़ियां पिरोकर,
बनाऊंगी मैं एक सुंदर सी बंधनवार,
सजाऊंगी हृदय का आंगन चौबारा,
लगाऊंगी चौखट पे सुंदर सी बंधनवार,
रखूंगी भाव भरा एक कलश, मैं अपने हृदय के द्वार,
करूंगी मैं यूं ही तेरा इंतजार, ए बसंतl
अमृत रस लिए आया है बसंतl

ओ प्रियतम बसंत, हर वर्ष यूं ही आना,
करते हो जैसे धरा को सुशोभित,
मेरे जीवन को भी ऐसे ही सजाना,
और चाहती हूं मैं बस इतना
आत्मा को मेरी ,अपना वसन बासन्ति दे जाना
अमृत रस लिए आया है बसंत

मधु रुस्तगी 
9.
आज बसन्त ने मेरे द्वार पर, दस्तक लगाई
नई कोपलें खिल उठी, हवा ने ली अंगड़ाई

Suman Maheshwari
Suman Maheshwari

मस्त बयार ने बुझे दिलों में आस जगाई
शीत लहर को विदा देती, हवा फागुनी आई

फूलों की महक ने ताजगी चहुं ओर फैलाई
रंग-बिरंगे फूलों की छटा मेरे मन को भाई

देख जन जन का हर्ष, बासंती हवा मुस्काई
हवा के शीतल झोंकों ने, कैसी ठंडक पहुंचाई

बसंत तो बसंत है, श्रेष्ठ ऋतु कहलाई
जीवन रहे बसंत सा, गुहार हमने लगाई।
सुमन माहेश्वरी
10.
सखी री फिर आया बसंत
नव पल्लव पा
डाली डाली झूम रही

Mrs. Banu Bansal
Mrs. Banu Bansal

कुहके कोयल
पी आए है
पी आए है
गई शरद की ठंडी पवन अब
मन मेंउठी हिलोर फिर से

देखो देखो नव पल्लव भी
झांक रहे है
ओट डाल की
नहीं कोई अवरोध

झूमे संग फूलों के
होके अब मद मस्त
भँवरे करते है गुंजार
चिड़िया भी अब फुदक रही है
गाती गीत भर उल्लास

आओ सखी अब हम मनाये
बसंत मन भावन का त्योहार
बानू बंसल
11.
और अब अन्त में कुछ हमारी स्वयं की लेखनी से🙂🙏💐
वसन्त का राग मनोहर
मन वीणा पर गाते जाते

आज पवन मस्ती में बहता
कलियों संग अठखेली करता

कात्यायनी डा पूर्णिमा शर्मा
कात्यायनी डा पूर्णिमा शर्मा

और हवा की देख मसखरी
हर पीला पत्ता मुस्काता

रूपसि बरखा भी मेघों के
मध्य खड़ी निज केश झटकती
मोती जैसी बूंदों का जल
हर घर आंगन में टपकाती

कुछ तो शीत लहर की ठण्डक
कुछ रिमझिम बूंदों की सिहरन
गोरी के मन नई उमंगे
मचल मचल कर हैं उमगातीं

किन्तु तभी अरूणिम उषा को
आगे करके भोर है आती
और प्रिया को मेघों की वह
रश्मिकरों से दूर भगाती

वातायन के पट खुलते ही
भोर सुहानी भीतर तकती
हिम शिखरों पर कलश धूप का
किरणें निज कर लेकर आतीं

धीरे धीरे धूप बिखरती
तितली पुष्पों पर मंडरातीं
कुसुमों के अधरों पर चुम्बन
जड़कर, मधुरस ले उड़ जातीं

और उधर भंवरे भी देखो
सुमनों से कुछ छन्द चुराते
और हरित पत्रों पर वासन्ती
कुछ गीत तभी रच जाते

गोरैया निज नयनों में है
नीलम जैसे नभ को भरती
और क्षितिज से मिलन हेतु वह
दूर गगन में उड़ती जाती

मलय समीरण भी नदिया के
जल में कुछ हलचल कर देता
और गोरी के नयनों में भी
प्रेम के अनगिन रंग भर देता

आम्र कुँज में कामदेव का
उसी समय नर्तन हो जाता
बौराया वसन्त तब प्रेमी
जन पर है निज बाण चलाता

धीरे धीरे धूप भास्कर
संग गगन के पीछे छिपती
और सिंदूरी संझा निज पग
हौले से निशि के घर धरती

झीलों के दर्पण में चन्दा
जैसा मुखड़ा रजनी तकती
और निशिकर के प्रेम पाश में
बंधकर सुध बुध भूली रहती

पर अनंग के बाणों से बिंध
प्रेमीजन बौराए जाते
और वसन्त का राग मनोहर
मन वीणा पर गाते जाते
—–कात्यायनी

 

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वसन्तोत्सव 2024

WOW India के साहित्यकृतिक मंच और मिथिलाक शिल्प

द्वारा आयोजित काव्य संगोष्ठी

की कुछ झलकियाँ

आज एक ओर जहां ज्ञान विज्ञान की दात्री मां वाणी के अवतरण दिवस के उपलक्ष्य में वाग्देवी के पूजन अर्चना का दिन है वहीं दूसरी ओर समस्त जड़ चेतन को मदमस्त कर देने वाले कामदेव के प्रिय सखा वसन्त के स्वागत का उल्लासमय पर्व है – वसन्त पंचमी… WOW India ने इसी उपलक्ष्य में “मिथिलाक शिल्प” संस्था के साथ मिलकर 11 फरवरी को दिल्ली के इन्द्रप्रस्थ विस्तार स्थित IPEX भवन में एक काव्य संगोष्ठी का आयोजन किया था…

इस संगोष्ठी में हिन्दी और मैथिली के जिन कवि – कवयित्रियों ने अपनी रचनाओं से सभी के मनों को केसर के वासन्ती धागों के रंग में रंग दिया उनके नाम हैं…

कार्यक्रम में WOW India की वर्ष्ठ उप सचिव श्रीमती बानू बंसल, उप सचिव श्रीमती अर्चना गर्ग, मिथिलाक शिल्प के संस्थापक श्री मुकेश आनन्द और संयोजक मिथिला मेसरी श्री मनोज मनोहर सहित दोनों संस्थाओं के पदाधिकारी और सदस्य उपस्थित रहे…

कार्यक्रम का सफलतापूर्ण संचालन श्रीमती रूबी शोम और इहा झा ने किया…

प्रस्तुत हैं कार्यक्रम के कुछ चित्र… बहुत शीघ्र कार्यक्रम का YouTube Link भी शेयर कर दिया जाएगा…

डा पूर्णिमा शर्मा

 

bookmark_borderUnderstanding Fatty Liver

Understanding Fatty Liver

—–Dr Deepika Kohli

Today I am sharing an article by Dr Deepika Kohli on Understanding Fatty Liver. Dr. Kohli is a Joint Secretary of WOW India and a well-known Dietitian/Nutritionist in Mayur Vihar Ph-I, Delhi and has an experience of 26 years in this field. Ms. Deepika Kohli practices at Deepika’s Diet Clinic in Mayur Vihar Ph-I, Delhi, Jeevan Anmol Hospital in Mayur Vihar Ph-I, Delhi and Life Care Centre in Preet Vihar, Delhi. She is a Certified Diabetes Educator ) from Pfizer in 2011. She is a member of Indian Dietetic Association. Some of the services provided by the doctor are: Diabetic diet, PCOD Diet, Weight Gain Diet Counselling, Therapeutic Diet’s and Weight Loss Diet Counselling etc. Must read… Dr. Purnima Sharma, Secretary General & Editor of WOW Website…

Understanding Fatty Liver

Causes, Symptoms, and Management

Fatty liver, also known as hepatic steatosis, is a condition characterized by the accumulation of fat in the liver cells. While a small amount of fat in the liver is normal, excessive fat build-up can lead to inflammation and liver damage. Fatty liver can be categorized into two main types: alcoholic fatty liver disease (AFLD) and non-alcoholic fatty liver disease (NAFLD).

*Non-Alcoholic Fatty Liver Disease (NAFLD)**

NAFLD is the most common form of fatty liver and is not related to excessive alcohol consumption. It often occurs in individuals who are overweight or obese, have type 2 diabetes, or have metabolic syndrome. NAFLD encompasses a spectrum of liver conditions, ranging from simple fatty liver (steatosis) to non-alcoholic steatohepatitis (NASH), which involves inflammation and liver cell damage. If left untreated, NASH can progress to more severe liver complications, such as cirrhosis and liver failure.

**Alcoholic Fatty Liver Disease (AFLD)**

As the name suggests, AFLD is caused by excessive alcohol consumption over an extended period. Alcohol is metabolized in the liver, and chronic alcohol abuse can lead to the accumulation of fat in liver cells, inflammation, and liver damage. AFLD may progress to more severe forms of liver disease, including alcoholic hepatitis and cirrhosis, if alcohol consumption continues.

*Causes of Fatty Liver* *

The exact cause of fatty liver is not fully understood, but several factors contribute to its development:

  1. * *Obesity and Metabolic Syndrome**: Excess weight, particularly abdominal obesity, and conditions like insulin resistance and high blood sugar levels are closely associated with NAFLD.
  2. **Type 2 Diabetes**: Insulin resistance and high blood sugar levels in individuals with type 2 diabetes can contribute to the accumulation of fat in the liver.
  3. * *High Cholesterol and Triglycerides**:

Elevated levels of cholesterol and triglycerides in the blood can increase the risk of fatty liver.

  1. * *Alcohol Consumption**: Chronic alcohol abuse is a significant risk factor for AFLD.
  2. * *Genetic Factors**: Some genetic factors may predispose individuals to develop fatty liver.

*Symptoms of Fatty Liver**

Fatty liver often does not cause noticeable symptoms in its early stages. However, as the condition progresses, individuals may experience:

  • Fatigue
  • Weakness
  • Abdominal discomfort or pain in the upper right side
  • Enlarged liver
  • Jaundice (yellowing of the skin and eyes) in severe cases
  • *Diagnosis and Management* *

Fatty liver is often diagnosed through blood tests, imaging studies (such as ultrasound or MRI), and sometimes a liver biopsy. Management of fatty liver focuses on addressing underlying risk factors and lifestyle modifications:

  1. **Weight Loss**: Achieving and maintaining a healthy weight through a balanced diet and regular exercise is essential for managing fatty liver, especially in individuals with NAFLD.
  2. * *Healthy Diet**: A diet low in saturated fats, refined carbohydrates, and added sugars, and high in fruits, vegetables, whole grains, and lean proteins can help reduce fat accumulation in the liver and improve liver health.
  3. * *Regular Exercise**: Regular physical activity can help improve insulin sensitivity, aid in weight loss, and reduce liver fat.
  4. * *Limit Alcohol Consumption**: Individuals with AFLD should limit or avoid alcohol consumption altogether to prevent further liver damage.
  5. * *Medications**: In some cases, medications may be prescribed to manage underlying conditions such as diabetes, high cholesterol, or metabolic syndrome.

In conclusion, fatty liver is a common condition characterized by the accumulation of fat in liver cells. While it may not cause noticeable symptoms in its early stages, fatty liver can progress to more severe liver complications if left untreated. Lifestyle modifications, including weight loss, healthy diet, regular exercise, and limiting alcohol consumption, are key components of managing fatty liver and improving liver health. Individuals with fatty liver should work closely with their healthcare providers to develop a personalized treatment plan tailored to their needs.

bookmark_borderगणतंत्र दिवस काव्य संकलन

गणतंत्र दिवस काव्य संकलन

अल्पानामपि वस्तूनां संहति: कार्यसाधिका

कात्यायनी डा पूर्णिमा शर्मा
कात्यायनी डा पूर्णिमा शर्मा

तॄणैर्गुणत्वमापन्नैर्बध्यन्ते मत्तदन्तिन: || हितोपदेश 1/35
अल्प वस्तुओं को भी यदि
एकत्र करें, एक डोर में गूंथे
कार्य सिद्ध उनसे हो जाए
गर्व से सर ऊंचा हो जाए
तिनकों से एक डोर बने जब
करि मदमत्त भी बंध जाता है
मनुज एकता भाव में बंधकर
बड़े लक्ष्य भी पा सकता है
जी हां, छोटी छोटी वस्तुओं को भी यदि एक स्थान पर एकत्र किया जाए तो उनके द्वारा बड़े से बड़े कार्य भी किये जा सकते हैं | उसी प्रकार जैसे घास के छोटे छोटे तिनकों से बनाई गई डोर से एक मत्त हाथो को भी बाँधा जा सकता है | वास्तव में एकता में बड़ी शक्ति है ऐसा हम सभी जानते हैं | तो क्यों न गणतन्त्र दिवस के शुभावसर पर हम सभी मनसा वाचा कर्मणा एक हो जाने का संकल्प लें ? इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि हम सब एक जैसे ही कार्य करें, एक जैसी ही बोली बोलें या एक जैसे ही विचार रखें | निश्चित रूप से ऐसा तो सम्भव ही नहीं है | प्रत्येक व्यक्ति की पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक, व्यावसायिक आदि विभिन्न परिस्थितियों की आवश्यकताओं के अनुसार हर व्यक्ति मनसा वाचा कर्मणा एक दूसरे से अलग ही होगा | हर कोई एक ही बोली नहीं बोल सकता | हर व्यक्ति की सोच अलग होगी | हर व्यक्ति का कर्म अलग होगा | मनसा वाचा कर्मणा एक होने का अर्थ है कि हम चाहे अपनी परिस्थितियों के अनुसार जो भी कुछ करें, पर मन वचन और कर्म से किसी अन्य को किसी प्रकार की हानि पहुँचाने का जाने अनजाने प्रयास न करें | और जब आवश्यकता हो तो पूरी दृढ़ता के साथ एक दूसरे को सहयोग दें | मनसा वाचा कर्मणा एक सूत्र में गुँथने का अर्थ है कि हम अपनी व्यक्तिगत समस्याओं और आवश्यकताओं के साथ साथ सामूहिक समस्याओं और आवश्यकताओं पर भी ध्यान दें… जैसे बच्चों और महिलाओं का सशक्तीकरण यानी Empowerment… और बच्चों तथा महिलाओं का स्वास्थ्य यानी Good Health… यदि इन दोनों विषयों के लिए हम सामूहिक प्रयास करते हैं तो हम मनसा वाचा कर्मणा एकता की डोरी में ही गुँथे हुए हैं… सर शान से उठाए लहराता तिरंगा भी यही तो सन्देश देता है कि कितनी भी विविधताएँ हो, कितने भी वैचारिक मतभेद हों, किन्तु अन्ततोगत्त्वा राष्ट्रध्वज के केन्द्र में चक्रस्वरूप सबके विचारों का केन्द्र देश ही होता है… अर्थात अपने अपने कार्य करते हुए, अपनी अपनी सोच के साथ, अपनी अपनी भाषा का सम्मान करते हुए साथ मिलकर आगे बढ़ते जाना… ऐसी स्थिति में न विचार बाधा बनेंगे, न भाषा, न वर्ण, न वेश, और न ही कर्म… ऐसे देश को निरन्तर प्रगति के पथ पर अग्रसर होने से कोई रोक नहीं सकता…

समानो मन्त्र: समिति: समानी, समानं मन: सहचित्तमेषाम्‌ |
समानं मन्त्रमभिमन्त्रयेव:, समानेन वो हविषा जुहोमि || – ऋग्वेद
हम सब कार्य करें संग मिलकर
एक समान विचार बनाकर
चित्त और मन एक जैसे हों
और मन्त्रणा भी हो मिलकर
तब ही सम निष्कर्ष पे पहुँचें
राष्ट्र के हित में हर पल सोचें
सद्भावों के यज्ञ से जग को
करें सुगन्धित साथ में मिलकर

मा भ्राता भ्रातरं द्विक्षन्‌, मा स्वसारमुत स्वसासम्यञ्च: सव्रता भूत्वा वाचं वदत भद्रया | – अथर्ववेद
भाई भाई में द्वेष रहे ना
दो बहनों में क्लेश रहे ना
जग सेवा संकल्पित हों सब
वाणी में कोई खोट रहे ना
प्रेममयी वाणी से जग को
स्नेहसरस आओ अब कर दें

ॐ सहनाववतु | सहनौ भुनक्तु | सहवीर्य करवावहै | तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै – कृष्ण यजुर्वेद
साथ में मिलकर कार्य करें सब
स्नेह भाव हो सबके मन में
साथ में मिलकर भोग करें सब
त्याग भाव हो सबके मन में
शौर्य करें सब, साथ खड़े हों
और अध्ययन तेजस्वी हो
द्वेष भाव का त्याग करें सब
राम राज्य हो सबके मन में

जनं बिभ्रती बहुधा विवाचसं,
नाना धर्माणां पृथिवी यथौकसम् |
सहस्रं धारा द्रविणस्य मे दुहां,
ध्रुवेव धेनु: अनपस्फुरन्ती || – अथर्ववेद
विविध धर्मं बहु भाषाओं का देश हमारा,
सबही का हो एक सरिस सुन्दर घर न्यारा ||
राष्ट्रभूमि पर सभी स्नेह से हिल मिल खेलें,
एक दिशा में बहे सभी की जीवनधारा ||
निश्चय जननी जन्मभूमि यह कामधेनु सम,
सबको देगी सम्पति, दूध, पूत धन प्यारा ||

हमारे वैदिक ऋषियों ने किस प्रकार के परिवार, समाज और राष्ट्र की कल्पना की थी – एक राष्ट्र एक परिवार की कल्पना – ये कुछ मन्त्र इसी कामना का एक छोटा सा उदाहरण हैं… अभी 26 जनवरी को हमारे देश के महान गणतंत्र दिवस का समारोह सभी देशवासियों ने पूर्ण हर्षोल्लास से मनाया… इस महान अवसर पर वैदिक ऋषियों की इस उदात्त कल्पना को हम अपने जीवन का लक्ष्य बनाने का संकल्प लें यही वास्तविक उत्सव होगा गणतंत्र का… और इसी भावना के साथ हमारे WOW India के कुछ सदस्यों ने अपने मन के भावों को शब्दों की माला में पिरोकर हमें भेजा जो प्रस्तुत हैं इस संकलन में… जयहिन्द… वन्देमातरम्…
—–कात्यायनी

जो भारत पर जान दिए फिर आजादी संजो लाए थे,

मीना कुण्डलिया
मीना कुण्डलिया

जो अपना सर्वस्व देश हित हंस कर यहां गवाएं थे,
है नमन उन्हें है नमन उन्हें शत बार नमन है वीरों को,
जो पहने माला फांसी की आजादी दुल्हन लाए थे,
– मीना कुण्डलिया

 

दिलो जाँ से प्यारा, चमन ये हमारा

Dr. Neelam Verma
Dr. Neelam Verma

है सोने की चिड़िया, वतन ये हमारा
है महफ़ूज़ अब ये जमीं, ये समंदर 
है महफ़ूज़ नीला, गगन ये हमारा
ये माना कि आसाँ नहीं राह आगे
है बेखौफ़ फिर भी तो मन ये हमारा
रहे परचम-ए-हिंद ऊंचा जहाँ में
ना टूटे कभी भी , वचन ये हमारा
– डा नीलम वर्मा

बलिदानी, रचनाकार थे कल
देकर स्वतंत्रता आगे बढ़े

P.N. Mishra
P.N. Mishra

प्रतिनियति रक्त दे भारत को
इस देश की रचना को भी गढ़े |
परिणाम है उनकी रचना का
हम प्रजातंत्र के देश में हैं
गणतंत्र विधाएं अपनी है
बलिदानी, भारत भेष में है |
करते हैं नमन उन वीरों को
जो आज का दिन दिखलाएं हैं
भारत स्वतंत्रता रक्त रचित
से प्रजातंत्र हम पाए हैं |
सम्मानित हो यह प्रजातंत्र
सम्मानित हो गणतंत्र दिवस
बच्चा बच्चा यह बोल रहा
जय भारत, जय भारत अंतस |
– प्राणेंद्र नाथ मिश्र

राष्ट्र ही आराधना है , राष्ट्र ही मेरा सुधर्म ,

Prabhat Sharma
Prabhat Sharma

राष्ट्र ही बस वन्दना है , राष्ट्र ही मेरा सुकर्म ,
राष्ट्र को ही हूं समर्पित ,मैं मेरे मन,क्रम ,वचन ,
राष्ट्र सबका राष्ट्र के सब,राष्ट्र को शत-शत नमन ।
धन-मन मेरा है राष्ट्र का , राष्ट्र को अर्पित यह तन ,
राष्ट्रवादी हों देशवासी , हो राष्ट्रवादी प्रत्येक जन ,
काट कर विद्वेष के तम , हो उदय नव भास्करम् ,
आज निकले हर हृदय से, बस एक वन्देमातरम् ।
अनेकता को एकता में हमने संवारा है ,
मूलमन्त्र पंचशील के भी तो हमारे हैं।
हिमगिरि-मुकुट शीश शोभित है देश के,
चरण पखारें हिन्द,अरब उदधि प्यारे हैं।।
नदियों की धाराएं ज्यों धमनी, शिराएं हों ,
वन-उपवन ज्यों हों फुफ्फुसीय रचनाएं ।
ज्यों हों मजबूत अस्थि पंजर भारत देश का,
वो हैं अरावली व दोनों घाट पर्वत-श्रंखलाएं।।
निगमागम,पुराणों की शुचि भूमि भारत
है,देवों के विविध अवतार बहु बखाने हैं।
सलिला,गिरि, मूर्तियां,सूर्य,चन्द्र पूज्य यहां ,
धर्म, सम्प्रदाय,पंथ, संस्कृति बहु जाने हैं ।।
वेद-चक्षु मानते हैं, ईश्वरीय विज्ञान ज्योतिष ,
ऋग्वेद से प्रतिष्ठित देश की ज्यों आत्मा हैै।
जैमिनी, पाराशरी,के पी,रमल हैं आंकिकी ,
विविध शाखा, विविध विधि स्वीकार्यता है।।
विविध हैं मन्दिर और पूजा स्थल भी विविध,
ग्रहस्थ-संत,फकीर,योगी,साधु भी धर्मात्मा हैं।
ध्यान,भक्ति, ज्ञान,हठ,लय, तंत्र,राज योग में ,
विविध योगी,साधनारत,मिशन में परमात्मा हैं।।
वेशभूषा भी विविध हैं और खान-पान भी ,
विविध हैं भाषा यहां, विविध उच्चारण भी हैं।
विविध सम्मिश्रण मृदा का,भूमिगत जल भी
विविध,प्रथकत: प्रदेशों का वातावरण भी है ।।
विविध भाषा,भाषी,साधक साधनाऐं भिन्न हैं,
खाना,पानी, वेशभूषा, गर्मी-ठण्डक भिन्न हैं ।
निगम,आगम,पुराण, ज्योतिष भी विविध हैं,
संस्कृति, साहित्य, देवी देवता भी विविध हैं।।
विविध राजनैतिक दलों की धारणाएं भिन्न हैं ,
भिन्न हैं सबके समर्थक, झण्डे,नारे भिन्न हैं।
विविधता में एकता ही इस देश की बस एक है,
बात हो जब देश की तो भारतीय सब एक हैं।।
एक है जन,गण,मन हमारा,एक ही विज्ञान है,
हरेक जन,गण के ही मन पर सभी का ध्यान है ।
अवसरों,अभिव्यक्ति, शिक्षा, आस्था, स्वतंत्र है,
विविध पुष्पों के गुच्छ सा अभिनव मेरा गणतंत्र है।।

प्रभात शर्मा

 

गण  के लिए ही गण  के द्वारा हिन्दोस्तान  है,

Jharna Mathur
Jharna Mathur

देशभक्तों की शहादत का ये हिंदुस्तान है।
रोजी रोटी के नाम पे वोट बिक रहे यहां,
फिर भी गरीबी, बेकारी कम क्यूँ ना है।
हर रोज नये कानून बन रहे हैं यहां,
फिर भी यहां पे बेटियां महफूज़ क्यूँ ना है।
शिक्षा,स्वास्थ्य, पानी भी बिकने लगा यहां,

आपा-धापी लूट है, चैन कयूँ ना है।
आम आदमी की जरूरते एक है यहां,
लहू का रंग एक है तो प्यार क्यूँ ना है।
संविधान में अधिकार है सबके लिए यहां,
उनके लेने देने में समता क्यूँ ना है।

  • झरना माथुररंग- बिरंगा देश है मेरा,
    Dr. Rashmi Chaube
    Dr. Rashmi Chaube

    वसुधा है चित्रकला सी।
    रंग -बिरंगे फूलों से सजी, धरती लगती दुल्हन सी,

झरने झर- झर बहते हैं, नदियाँ गातीं हैं कल-कल।

हरियाली का जब, रूप निखराता,
हवा से बातें करता है।
हिमालय रक्षा करता,
देश के मुकुट समान हैं।
सूरज आरती करता,
प्यार लुटाता चाँद है,
पैर पखारता सागर,
भारत माँ का करता गुणगान है ।
रंग बिरंगी वेश-भूषा,
कहीं साड़ी, कहीं लहंगा,
कहीं कुर्ती, कहीं वर्दी है,
शाल, दुशाला ओढ़े,
बेटियाँ भारत की जान है ।
हिंदी, उर्दू, बंगाली, गुजराती,
मराठी, पंजाबी,
अलग-अलग हैं भाषा,
लेकिन भाव एक समान हैं ।
कभी सावन के मेले तो,
कभी दिवाली के दीपक हैं,
कहीं ईद पर गले मिले सब,
होली के रंग में नहाए हैं।
संस्कृति, परंपरा,
से हमारी शान है।
कहीं गुरु ग्रंथ का मान हैं।
कहीं गीता और कुरान है।
भारतवासी इतने प्यारे,
सब धर्मों का करते सम्मान हैं।

  • डा रश्मि चौबेआजादी कैसे पाई हमने
    Ruby Shome
    Ruby Shome

    ये बतलाना मुश्किल है
    कितनों ने है जान गंवाई
    ये कह पाना मुश्किल है
    डट कर हम थे खड़े रहे
    बांध कफ़न सब अड़े रहे
    अंग्रेजों के जुल्मों सितम का
    कौन नहीं बना निशाना
    ये समझाना मुश्किल है
    शहीदों ने अपने लहू से
    लिखी आजादी की अमर कहानी
    ये बात अपनी जुबां पर लाना मुश्किल है
    सदा गगन पर लहराए तिरंगा
    देश धर्म पर तन मन वारा
    फिर से न आये कोई फिरंगी
    देश में, ये तय कर पाना मुश्किल है
    गणतंत्र रहे ये देश हमारा
    इस धरा पर सर्वस्व लुटाना
    जन गण मन हो ध्येय हमारा
    ये बात हर इंसा को कह पाना मुश्किल है।
    – रूबी शोम

राखी लिए हाथ

Sangeeta Gupta
Sangeeta Gupta

बहन जोह रही भाई की बांट
मां लगी रसोई में बना रही पकवान
आएगा उसका बेटा जो है देश का जवान
बहन सोच रही आज
भाई से लेगी क्या उपहार
बहन से ज्यादा दोस्त बनी हू
दोस्ती का लूंगी हिसाब
बहुत छिपाई भाई की बात
अब लूंगी बदला आ जाए एकबार

मां बैठी सोचे आएगा बेटा
करूंगी शादी की बात
बहुत रह लिया अकेला
अब ले आए बहु साथ
मरने से पहले खेल लू
उसके बच्चो के साथ
हुई दरवाजे पर दस्तक
भागी बहन दरवाजे तक
होश उड़ गए जब खोला दरवाजा
तिरंगे में लिपटा अपना भाई देखा
मुंह से निकल गई चींख
आंख से बह निकली अश्रु की धारा
दर्द से बोल उठी बहन रो रोकर कर रही पुकार
हे भगवान भाई से मैंने ना मांगा ये उपहार
अब लाऊंगी कहा से राखी के लिए हांथ
जो मुझे भर भरकर देते थे आशीर्वाद
मां बोली ना कर ऐसे विलाप
भाई गया नही कही
बस हुआ अपने देश के लिए शहीद
शहीद कभी मरते नहीं
अमर हो जाते है
देश की सेवा के लिए
बार बार जन्म लेते है
बांध हाथ पर राखी
कर माथे पर तिलक
जिस धरती के लिए हुआ शहीद
कर उस धरती के सुपुर्द
गर्व हमे उस जवान पर
जो देश के लिए मर मिट जाते
गर्व हमे उस मां बहन पत्नी पर
जो जिंदा रहकर अपना फर्ज निभाते
शत शत नमन वीरों की शहादत को
शत शत नमन हिंदुस्तान की मिट्टी को
ऐसे शेर जन्म है लेते

नमन वीर की मां को
वो शेरनी है तभी जियाले शेर कहलाते
वन्दे मातरम् वन्दे मातरम् वन्दे मातरम्
– संगीता गुप्ता

जब आजादी मिली मेरे भारत को

Nutan Sharma
Nutan Sharma

तो वीरों की गाथा गाई गई।
मातृभूमि की माटी भी।
मस्तक से यूं लगाई गई।
देते न आहुति वीर यदि
बलिदानों को कैसे जानते।
वीरों की वो कुर्बानी।
सबकी जुबानी गाई गई-2
जो मातृ भूमि के रखवाले।
मैं उनकी गाथा गाती हूं।
जो वीर शहीद बलिदानी थे।
मैं उनकी बात बताती हूं।
अपनी धरती मां के लिए
वीरों ने प्राण गवाए हैं।
जिनके बलिदानों को हम।
भूल कभी ना पाए हैं।
अपने खूं से इतिहास लिखा।
मैं उनको शीश नवाती हूं।
जो मातृ भूमि के रखवाले।
मैं उनकी गाथा गाती हूं।
जब तक सांसों में सांस रही।
तब तक हार न मानी है।
जान रहे न रहे तन में।
मन में बस यह ठानी है।
हर पल दिल में जुनूं यही।
मैं उन सी होना चाहती हूं।
जो मातृ भूमि के रखवाले।
मैं उनकी गाथा गाती हूं।

मेरे देश की रज को यहां।
माथे पे सजाया जाता है।
मां से पहले भारत मां को।
मां कहके बुलाया जाता है।
इतनी पावन है धरा मेरी।
इसमें ही मिल जाना चाहती हूं।
जो मातृ भूमि के रखवाले।
मैं उनकी गाथा गाती हूं।
अपने तो अपने हैं यहां।
गैरो का भी आदर होता है।
(गैर से मतलब यहां विदेशी मुल्क से है)
जहां बच्चों को संस्कार बता।
सम्मान सिखाया जाता हैं।
चरणों में झुकने की रीत यहीं।
यह देखके खुश हो जाती हूं।
जो मातृ भूमि के रखवाले।
मैं उनकी गाथा गाती हूं।
इस मिट्टी में ही जन्मे प्रभु।
कान्हा ने बचपन में खेला है।
यही रास रचाया गोपिन संग।
गैया को मैया बोला है।
ऐसी पावन है धरा यहां।
मैं हर पल पूजना चाहती हूं
जो मातृ भूमि के रखवाले।
मैं उनकी गाथा गाती हूं।
राधा ने यहीं वियोग सहा।
मीरा ने प्रेम निभाया है।
जहां द्रोपदी की रक्षा के लिए।
मोहन ने लाज बचाया है
जहां गीता ज्ञान दिया प्रभु ने।
मैं तृप्त वहीं हो जाती हूं
जो मातृ भूमि के रखवाले।
मैं उनकी गाथा गाती हूं।
जहां रोज सवेरे तुलसी को।
जल और दीप चढ़ाए जाते हैं।
जहां मां गंगा में डुबकी लगाकर।
सब पाप मिटाए जाते हैं।
हर तीज व्रत और त्यौहार।
सब संग मिलके मानाना चाहती हूं
जो मातृ भूमि के रखवाले।
मैं उनकी गाथा गाती हूं।
वाल्मीकि ने रामायण को रचा।
तुलसी ने काव्य को गाया है।
जहां देव तुल्य हर मानव ने।
हर धर्म ग्रंथ समझाया है।
जिनकी गाथा मैं सदियों से।
हर मुख से सुनती आई हूं।
जो मातृ भूमि के रखवाले।
मैं उनकी गाथा गाती हूं।
जो वीर शहीद बलिदानी थे।
मैं उनकी बात सुनाती हूं।
– नूतन नवल

कोटि कोटि वंदन है मेरा वीरों के सम्मान को

Sangeeta Ahlawat
Sangeeta Ahlawat

आंच जिन्होंने आने न दी भारत मां की शान को l
अत्याचारों को भी अपना खेल समझकर झेल गए
आजादी के दीवाने जो प्राणों पर भी खेल गए
कदमों से जो रौंद गए हर दुश्मन के अभिमान को
आंच जिन्होंने आने न दी भारत मां की शान को ll
लिए तिरंगा हाथों में जो वन्देमातरम को गाते
झंडे गाड़ दिए चोटी पर सीने पर गोली खाते
भुला नहीं सकते हैं हम उन वीरों के बलिदान को
आंच जिन्होंने आने न दी भारत मां की शान को ll
चूड़ी रोली कंगन बिछुए बेबस राह निहार रहे
घर आने की आशा में हो बेबस तुम्हें पुकार रहे
लेकर चले गए हो सबकी आंखों के अरमान को
आंच जिन्होंने आने न दी भारत मां की शान को ll
कोटि कोटि वंदन है वीरों के सम्मान को
आंच जिन्होंने आने न दी भारत मां की शान को ll
– संगीता अहलावत l

और अन्त में इन पंक्तियों के साथ संकलन का समापन…

गणतन्त्र दिवस फिर आया है, कुछ नया संदेसा लाया है |
भारत के हर एक कण कण ने कुछ नया राग अब गाया है ||

हम आतंकों से जूझे हैं, पर हार न हमने मानी है |
कोरोना को भी हमने हँसते हँसते दूर भगाया है ||
है तब ही तो परिधान नया धरती ने वासन्ती धारा |
और साज सजा है नया नया, कुछ नया राग गुँजाया है ||
है देश मेरा ऐसा जिसमें हैं रंग रंग के पुष्प खिले |
उन सबसे मिलकर बना हार भारत माँ को पहनाया है ||
इसके आँगन में लहराती नदियों ने नृत्य दिखाया है |
गंगा यमुना कावेरी ने सागर संग रास रचाया है ||
हर कोई कर्मप्रधान रहे, हों चाहे कितने भी तूफां |
हर जीवन में मधुमास रहे, संकल्प सभी ने पाला है ||

  • कात्यायनी डा पूर्णिमा शर्मा

 

 

bookmark_borderशबरी के बेर

शबरी के बेर

हम प्रायः बात करते हैं कि भगवान भाव के भूखे हैं – इस सन्दर्भ में एक लोक कथा भी हम सभी ने सुनी हुई है कि भगवान राम जब शबरी की कुटिया पर पहुँचे तो शबरी ने उन्हें चख चख कर मीठे बेर प्रस्तुत किए और भक्त की भावनाओं का सम्मान करते हुए भगवान श्री राम ने बड़े स्नेह और सम्मान के साथ शबरी के झूठे उन बेरों का भोग लगाया… लेकिन यह केवल एक जन श्रुति है और भारत की ही नहीं अपितु विश्व की किसी भी रामायण में यह कथा नहीं उपलब्ध होती, शबरी वास्तव में एक भील योद्धा थी और वनों में रहने के कारण उसे जड़ी बूटियों की अच्छी पहचान थी… इसी विषय पर विस्तार से उद्धरणों सहित बता रहे हैं पुणे से DRDO में कार्यरत वैज्ञानिक और एक वरिष्ठ साहित्यकार डॉ हिमाँशु शेखर… एक बार अवश्य पढ़ें… डा पूर्णिमा शर्मा…

शबरी के बेर

डॉ हिमाँशु शेखर, पुणे

दिनाँक 22 जनवरी 2024 को अयोध्या में भगवान राम की प्राण प्रतिष्ठा के बाद राम कथा की बाढ़ आ गई है | राम कथा में कई प्रकार की विसंगतियां भी देखने को मिली हैं | उनमें से एक दृष्टांत है शबरी के जूठे बेरो का | क्या वास्तव में भगवान राम ने शबरी के जूठे बेर खाए थे ?

अगर आपको टीवी पर आने वाला रामायण सीरियल याद होगा तो जब यह कथा शबरी के आश्रम में पहुँची थी, तब इसके निर्देशक रामानंद सागर ने कहा था कि इस घटना का जिक्र राम कथा के 5 मूल ग्रंथों में नहीं दिखता है | ये पांच ग्रंथ उनके हिसाब से थे – वाल्मीकि रामायण, महाकवि तुलसीदास की श्री रामचरितमानस, तमिल का कंबन रामायण, तेलुगु का रंगनाथ रामायण, और बंगाल का कृतिवास रामायण | इन सब में भगवान श्री राम को शबरी द्वारा जूठे बेर देने का जिक्र नहीं है |

आइए, एक बार उस प्रकरण को इन राम कथाओं में खोजने की चेष्टा करें, जहां शबरी के आश्रम में भगवान राम और लक्ष्मण जाते हैं | उनकी आवभगत माता शबरी किस प्रकार करती हैं, इसपर एक नजर डालते हैं | मातंग ऋषि के आश्रम में शबरी द्वारा भगवान राम और लक्ष्मण की सेवा सत्कार किस तरह की गई ?

वाल्मीकि रामायण में इस संदर्भ में लिखा हुआ है –
मया तु विविधं वन्यं संञ्चितं पुरुषर्षभ |
तवार्थे पुरुषव्याघ्र पम्पायास्तीर संभवम ||

यह 3.74.17 श्लोक संख्या है | इसमें लिखा है कि जो भी पंपा सरोवर के तट पर उपलब्ध था, जो भी संभव था, जो वन से संचित सामग्री थी, उनसे ही भगवान राम का स्वागत सत्कार किया गया | इसमें फलों का या जूठे होने का जिक्र नहीं है |

चलिए तुलसीदास की श्री रामचरितमानस के अरण्यकांड का दोहा 34 देखते हैं  | उसमें लिखा हुआ है कि –
कंद मूल फल सुरस अति दिए राम कहुँ आनि |
प्रेम सहित प्रभु खाए बारंबार बखानि ||
अर्थात कंद मूल फल ही राम को अर्पित किया गया था |

इसी तरह रंगनाथ रामायण जो 13वीं सदी में गोनबुद्ध रेड्डी ने लिखा है, उसमें भी राम को कंदमूल फल अर्पण करने का जिक्र है | बेर का तो कहीं जिक्र ही नहीं है | कृतिवास रामायण में भी फल अर्पण करने का प्रसंग ही नहीं है | कंबन रामायण में भी इसकी चर्चा नहीं है | इस तरह से अगर आप इसको सही ढंग से खोजेंगे तो कवितावली में भी इसका जिक्र कहीं पर नहीं दिखाई देता है |

एक और रचना है, गीतावली, जिसमें राम कथा के बारे में कुछ जानकारी है | गीतावली के 17 में पद में पांचवा गीत है | गीता प्रेस गोरखपुर के 1960 के संस्करण में पृष्ठ संख्या 246-247 पर जो पद लिखे हैं वह इस तरह के हैं कि –
पद पंकजात पखारि पूजे पंथ श्रम विरति भये |
फल फूल अंकुर मूल सुधारि भरि दोना नये ||
प्रभु खात पुलकित गात, स्वाद सराहि आदर जनु जये |
फल चारिहू फल चारि दहि, परचारि फल सबरी दये ||

अर्थात माता शबरी ने फल फूल अंकुर मूल से भरा दोना भगवान की सेवा में प्रस्तुत किया | भगवान ने उसमें से सिर्फ चार ही फल लिए और उन चार फलों के बदले में शबरी को चार चीजें, जो हमारे जीवन के लिए बहुत उपयोगी होती हैं – धर्म अर्थ काम और मोक्ष, ये चार वर दिए |

इस तरह अगर आप विभिन्न राम कथाओं को देखें तो शबरी के जूठे बेरों का जिक्र कहीं नहीं मिलता है | अब उन रचनाओं को देखें, जहां पर शबरी के जूठे बेरों का जिक्र है | एक कथा आती है उस ग्रंथ में, जिसे दांडी रामायण कहते हैं | ये उड़िया में बलराम दास ने लिखा था | इसमें उन्होंने लिखा है कि भगवान राम ने दांत के निशान वाले आम खाए थे | और ये दांत के निशान किसके थे ऐसा सीधे तो नहीं लिखा है परंतु माना जाता है कि ये शबरी के दांतों के निशान थे | यहाँ आम लिखा है | इसमें बेर का जिक्र नहीं है, आम का जिक्र है | इसी तरह चैतन्य महाप्रभु के शिष्य प्रियादास ने नाभादास रचित भक्तमाल पर भक्ति रसबोधिनी टीका में इसी तरह का वर्णन किया है |

एक और असमंजस में डालने वाली बात है कि एक राधेश्याम कथावाचक थे | उन्होंने वर्णन करते हुए लिखा है कि शबरी के जूठे बेरों का जिक्र सूरसागर में है | अब आप हमें सबको मालूम है कि सूरसागर सूरदास जी ने लिखा है | वे कृष्ण भक्त थे | तो कृष्ण भक्ति राम भगवान राम के कृतित्व पर अपनी सोच का आक्षेप कर रही हैं, ऐसा प्रतीत होता है | लेकिन सूरसागर के नवम स्कंध में जूठे फलों का जिक्र है | बेर का तो जिक्र नहीं है, लेकिन जूठे फलों का जिक्र है |
सबरी आस्रम रघुबर आए, अरधासन दै प्रभु बैठाए |
खाटे फल तजि मीठे ल्याई, जूठे भए सो सहुज सुहाई |
अंतरजामी अति हित मानि, भोजन कीने स्वाद बखानि |

तो इसमें खट्टे फल को छोड़कर मीठे फल लाई | खट्टे और मीठे के बीच का भेद जानने के लिए उसे खाना पड़ा होगा | इसके कारण वे फल जूठे हो गए | ऐसा जिक्र सूरसागर में है, जो कि राम कथा नहीं, कृष्ण की भक्ति का ग्रंथ है |

वैसे अगर आप वैज्ञानिक दृष्टि से इस पर एक नजर डालें तो ऐसा प्रतीत होता है और ऐसा कहा जाता है कि शबरी श्रमणा नाम की भील कन्या थी, जो अपने विवाह के दिन पशुबलि को रोकने के लिए घर छोड़कर चली गई थी | मातंग ऋषि के आश्रम में उन्होंने आश्रय लिया था और वे एक बहुत बड़ी वैज्ञानिक थी | साथ ही बहुत बड़ी गुप्तचर संस्था भी मातंग ऋषि के आश्रम से वे चलाती थी | जहां तक उन बेरो या उन फलों का जिक्र आता है तो ऐसा भी माना जा सकता है जूठा खाने से प्रेम बढ़ता है | शायद उस प्रेम को दर्शाने के लिए कभी-कभी कुछ कथा वाचकों ने राम कथा में इसका जिक्र सम्मिलित कर लिया है | परंतु अगर आप शबरी को एक वैज्ञानिक मानते हैं, गुप्तचर व्यवस्था की प्रमुख मानते हैं, तो ऐसा माना जा सकता है कि उसे पंपा सरोवर के आसपास उगने वाले जड़ी बूटियों का ज्ञान था | उन्हें पता था कि किस तरह की जड़ी बूटियों से सेहत अच्छी रहती है | किसके सेवन से आगे आने वाले युद्ध में राम और लक्ष्मण अजेय हो पाएंगे | ऐसी भी मान्यता है कि माता शबरी उन बेरों का चयन और उन फलों का चयन कर भगवान को दे रही थी जिससे उनका तेज बढ़े, उनका शौर्य बढ़े, उनका बल बढ़े | और कहा जाता है कि भगवान राम तो उन बेरो को, उन फलों को खा रहे थे, परंतु लक्ष्मण जी उसे नहीं खा रहे थे | कहा जाता है कि भगवान राम के कहने पर लक्ष्मण जी ने एक फल लिया भी, तो उसे राम की दृष्टि बचाकर उन्होंने फेंक दिया | वह फल प्राणदायक था | जब उन्हें मूर्छा आई तब संजीवनी बूटी लाने से उनकी मूर्छा टूटी थी | ऐसा भी माना जा सकता है कि माता शबरी एक चिकित्सा की जानकार थी | अगर लक्ष्मण जी उनके द्वारा दिए गए फल को अरण्य काण्ड के दौरान ही खा लेते तो, शायद उन्हें मूर्छा नहीं आती | भगवान राम इसी कारण अजेय थे और तमाम अस्त्र, शस्त्र झेलकर भी वह लगातार युद्ध रत रह पाए थे | 

इस व्याख्या से चार तथ्य सामने आते हैं | पहला प्रामाणिक राम कथा में शबरी के जूठे बेरों का जिक्र नहीं है | दूसरा श्रुति ग्रंथ होने के कारण जनता को आकृष्ट करने के लिए कथावाचकों ने जूठे बेरों को राम कथा में जोड़ दिया है | तीसरा भावुकता पूर्ण संवेदना का संदर्भ हो सकता है, जो जूठा खाने से प्रेम से जोड़ता है | चौथा पंपा सरोवर के पास बहुत सारी जड़ी बूटियां थी और वाल्मीकि रामायण में जिक्र है कि भगवान राम माता शबरी से अनुरोध करते हैं कि वे पेड़ पौधे भगवान राम को दिखाएं | उन जड़ी बूटियां की पहचान शबरी को थी | इसी कारण जो शारीरिक बल बढ़ाने वाली औषधियां थी, उसी तरह की जड़ी बूटी उन्होंने भगवान राम को अर्पित किया था | तो मेरे विचार से शबरी के जूठे बेरों का दोनों पक्ष है | एक पौराणिक पक्ष है जो सफलतापूर्वक स्थापित नहीं किया जा सकता है, लेकिन एक आधुनिक वैज्ञानिक पक्ष भी रखा जा सकता है, जिसमें भगवान राम को अर्पित फल उनके बल को बढ़ाने वाले साबित हुए हैं |

 

(तो ये तो था शबरी के झूठे बेरों का प्रसंग डॉ हिमाँशु शेखर की दृष्टि से… अब भगवान श्री राम मन्दिर अयोध्या में मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा के अवसर पर कोलकाता से श्री प्राणेन्द्र नाथ मिश्रा जी की एक छोटी सी रचना…)

 

P.N. Mishra
P.N. Mishra

राम मंदिर

यह न सोचो यह नया कोई साज था
राम मंदिर का पुराना ब्याज था |
म्लेच्छों को सीख देने के लिए
राम का यह भी नया अंदाज़ था |
टेंट भी बन जाते हैं एक दिन महल
भक्तों में बैठा हुआ एक बाज़ था |
कौन जाने किसकी शामत आ रही है
पांच सौ सालों का कोई राज़ था |
सूर्यवंशी को, नमन करती शफक़
उनके जैसा क्या कोई सरताज था ?

bookmark_borderCertificate of Participation

Certificate of Participation

साँझ सकारे कोयल कूके, लो वसन्त आया |

रंग बिरंगे फूल खिलाता लो वसन्त आया ||

पाँच फरवरी को वसन्त पञ्चमी का उल्लासमय पर्व था… ऋतुराज वसन्त के स्वागत हेतु WOW India ने साहित्य मुग्धा दर्पण के साथ मिलकर डिज़िटल प्लेटफ़ॉर्म ज़ूम पर दो दिन काव्य संगोष्ठियों का आयोजन किया… द्वितीय कड़ी 5 फरवरी को आयोजित की गई जिसमें दोनों संस्थाओं के सदस्यों स्वरचित रचनाओं का पाठ किया… काव्य पाठ प्रस्तुत वाले वाले सदस्यों को सम्मानस्वरूप एक प्रशस्ति पत्र भी प्रदान किया गया है… सादर: डॉ पूर्णिमा शर्मा…

Anubha Pandey

 

 

 

 

bookmark_borderFestival of Hindi Poetry on Spring

Festival of Hindi Poetry on Spring

वसन्त पर हिन्दी कविताओं का उत्सव

नमस्कार ! WOW India के सदस्यों की योजना थी कि कुछ कवि और कवयित्रियों की वासन्तिक रचनाओं से वेबसाइट में वसन्त के रंग भरेंगे, लेकिन स्वर साम्राज्ञी भारत

Lata Mangeshkar
Lata Mangeshkar

कोकिला लता मंगेशकर जी के दिव्य लोक चले जाने के कारण दो दिन ऐसा कुछ करने का मन ही नहीं हुआ… जब सारे स्वर शान्त हो गए हों तो किसका मन होगा वसन्त मनाने का… लेकिन दूसरी ओर वसन्त भी आकर्षित कर रहा था… तब विचार किया कि लता दीदी जैसे महान कलाकार तो कभी मृत्यु को प्राप्त हो ही नहीं सकते… वे तो अपनी कला के माध्यम से जनमानस में सदैव जीवित रहते हैं…

नाम गुम जाएगा, चेहरा ये बदल जाएगा
मेरी आवाज़ ही पहचान है, गर याद रहे

और यही सब सोचकर आज इस कार्य को सम्पन्न कर रहे हैं… लता दीदी वास्तव में माता सरस्वती की पुत्री थीं… तभी तो उनका स्वर कभी माँ वाणी की वीणा जैसा प्रतीत होता है… कभी कान्हा की बंसी जैसा… तो कभी वासन्तिक मलय पवन संग झूलते वृक्षों के पत्रों के घर्षण से उत्पन्न शहनाई के नाद सरीखा… तभी तो नौशाद साहब ने अपने एक इन्टरव्यू में कहा भी था “लता मंगेशकर की आवाज़ बाँसुरी और शहनाई की आवाज़ से इस क़दर मिलती है कि पहचानना मुश्किल हो जाता है कौन आवाज़ कण्ठ से आ रही है और कौन साज़ से…” उन्हीं वाग्देवी की वरद पुत्री सुमधुर कण्ठ की स्वामिनी लता दीदी को समर्पित है इस पृष्ठ की प्रथम रचना… माँ वर दे… सरस्वती वर दे…
माँ वर दे वर दे / सरस्वती वर दे…
वीणा पर वह भैरव गा दे, जो सोए उर स्वतः जगा दे |
सप्त स्वरों के सप्त सिन्धु में सुधा सरस भर दे ||
माँ वर दे वर दे / सरस्वती वर दे…
गूँज उठें गायन से दिशि दिशि, नाच उठें नभ के तारा शशि |

Vasant Panchami
Vasant Panchami

पग पग में नूतन नर्तन की चंचल गति भर दे ||
माँ वर दे वर दे / सरस्वती वर दे…
तार तार उर के हों झंकृत, प्राण प्राण प्रति हों स्पन्दित |
नव विभाव अनुभाव संचरित नव नव रस कर दे ||
माँ वर दे वर दे / सरस्वती वर दे…
वीणा पुस्तक रंजित हस्ते, भगवति भारति देवि नमस्ते |
मुद मंगल की जननि मातु हे, मुद मंगल कर दे ||
माँ वर दे वर दे / सरस्वती वर दे…

अब, वसन्त का मौसम चल रहा है… जो फाल्गुन मास से आरम्भ होकर चैत्र मास तक रहता है… फाल्गुन मास हिन्दू वर्ष का अन्तिम महीना और चैत्र मास हिन्दू नव वर्ष का प्रथम माह होता है… भारतीय वैदिक जीवन दर्शन की मान्यता कितनी उदार है कि वैदिक वर्ष का समापन भी वसन्तोत्सव तथा होली के हर्षोल्लास के साथ होता है और आरम्भ भी माँ भगवती की उपासना के उल्लास और भक्तिमय पर्व नवरात्रों के साथ होता है… तो प्रस्तुत हैं हमारे कुछ साथियों द्वारा प्रेषित वासन्तिक रचनाएँ… सर्वप्रथम प्रस्तुत है डॉ ऋतु वर्मा द्वारा रचित ये रचना… प्रेम वल्लरी
हवाओं को करने दो पैरवी,
हौले हौले फूलों को रंग भरने दो
बस चुपचाप रहो तुम,
प्रेम वल्लरी अंबर तक चढ़ने दो
किरनों आओ, आकर धो दो हृदय आंगन
अब यहां आकर रहा करेंगे, सूर्य आनन
धड़कनों को घंटनाद करने दो,
विवादों को शंखनाद करने दो
प्रेम वल्लरी…..
सौंदर्यमयी आएगी पहनकर / नीहार का दुशाला
तुम भी दबे पांव आना / अति सजग है उजाला
प्रेम प्रालेय को देह पर गिरने दो,
चश्म के चश्मों को नेह से भरने दो
प्रेम वल्लरी….
ये हृदयहीन जाड़ा, क्यूं गलाये स्वप्न?
तेरा अलाव सा आगोश, पिघलाये स्वप्न
कहीं दूर शिखरों पर बर्फ गिरती है, तो गिरने दो
जलती है दुनिया पराली सी, तो जलने दो
प्रेम वल्लरी…..

और अब, रेखा अस्थाना जी की रचना… सखी क्या यही है वसन्त की भोर?

सखि क्या यही है वसन्त की भोर ?

खोल कपाट अलसाई नैनों से / देखा मैंने जब क्षितिज की ओर |
सुगंध मकरंद की भर गई / चला न पाई संयम का जोर ||
सखी कहीं यही तो नहीं वसन्त की भोर? |
फिर चक्षु मले निज मैंने / लगी तकन जब विटपों की ओर |
देख ललमुनियों का कौतुक / प्रेमपाश में मैं बंध गई
भीग उठे मेरे नयन कोर |
सखी यही तो नहीं वसन्त की भोर ||
फिर पलट कर देखा जब मैंने / बौराए अमुआ गाछ की ओर,
पिक को गुहारते वेदना में / निज साथी को बुलाते अपनी ओर |
देख उनकी वेदना, पीड़ा उठी मेरे पोर पोर |
सखी क्या यही है वसन्त की भोर ||
सुनकर भंवरे की गुंजार / पुष्प पर मंडराते करते शोर
अंतर भी मेरा मचल उठा |
सुन पाऊँ शायद मैं इस बार सखी
अपने प्रियतम के बोल |
लग रहा मुझको तो सखी यही है
अब वसन्त की भोर ||
मृदुल, सुगंधित, सुरभित बयार ने
आकर जब छुआ मेरे कोपलों को,
तन ऊर्जा से भर गया मेरा |
खुशी का रहा नहीं मेरा ओर-छोर |
अलि अब तो समझ ही गयी मैं,
यही तो है वसन्त की भोर ||

अब डॉ नीलम वर्मा जी का हाइकु…

बसंत-हाइकु

उन्मुक्त धरा

गा दिवसावसान

बसंत- गान

– नीलम वर्मा

अब पढ़ते हैं गुँजन खण्डेलवाल की रचना… पधार गए रति नरेश मदन…

माघ पौष से ठिठुरी, शुष्क धारा रति,

रूठी, उदास, फीकी, मन की जान रही गति,

सर्द तीखी हवा में बिखराए दूर्वा कुंतल,

रात भर तृण तृण पर बिछा तुहिन,

बुझाती विरह अनल,

श्वेत हिम के बगूलो से स्वयं जम गई,

नव सूर्य की प्रथम रश्मि से धीरे से पिघल गई,

उत्तरायण में ज्यों ली दिनकर ने करवट,

संवारने लगी वसुंधरा रूप अपना झटपट,

डगर, द्वार सजने लगी बलखाती लतिकाओं की बंदनवार,

कहे वसुधा – उठ अलि, उठ कलि, कर मेरा सोलह श्रृंगार,

सखी कोयल लगी कुहुकने, कीट भृंग करें गुंजार,

सुप्त तितलियों ने त्याग निद्रा सतरंगी पंख दिए पसार,

सरसों ने फैलाया उन्मुक्त पीला आंचल, दी लज्जा बिसार

रंग बिरंगे पुष्पों से शोभित हुए उपवन – अवनि,

बालियों से अवगुंठित पहन हार, ऋतुराज ढूंढे सजनी,

झटक कर अपने पुराने वसन,

नूतन पत्र पंखों से वृक्ष करते अगुवाई,

आंख मिचौली खेलती धूप, स्निग्ध ऊष्म से देती बधाई,

लहलहाने लगे खेत, उपवन करते अभिनंदन,

ईख उचक उचक लहराते, झुक झुक करते वंदन,

आम्रमंजरी, नव नीम पल्लव, पीपल कर रहे नमन,

चिड़ियों की चहक बजाएं ढोल शहनाई,

प्रफुल्ल पक्षियों ने जल तरंग बजाई,

लचकती टहनियां झूमें, छेड़े जो मलय पवन,

आनंद, प्रेम रस में हिलोरे लेते धरती गगन,

कामदेव प्रिया पीत अमलतास बिछाए,

शीश पर धर मयूर पंख किरीट रतिप्रिय मुस्काए,

कुमकुमी उल्लास, गुनगुनाते प्रेम राग पधार रहे ऋतुराज मदन,

पधार गए रति नरेश मदन।।

और अब प्रस्तुत है अनुभा पाण्डे जी की रचना… लो दबे पाँव आ गया वसन्त है…

धरती की हरिता पर यौवन अनंत है,

दिनकर की छाँव में प्रस्फुटित मकरंद है, पल्लवित कोंपलों में मंद हलचल बंद है,

लो दबे पाँव आ गया बसंत है |

शुष्क पत्र के छोड़ गलीचे,

झुरमुट हटा निस्तेज डाल की,

उल्लास की पायल झनकाती,

नव-जीवन मदिरा छलकाती,

धनी चूनर पहने धरती सराबोर रसरंग है…

लो दबे पाँव आ गया बसंत है |

झूम रहीं डाली, कलियाँ,

पत्ते सर-सर कर डाल रहे,

खेतों में नाचे गेहूँ, सरसों,

नभचर उन्मुक्त हुए, गगन मानो तोल रहे,

धरती, बयार दोनों थिरक रहे संग हैं…

लो दबे पाँव आ गया बसंत है |

फिर से कोयल कूकेगी,

फिर से अमरायी फूटेगी,

ओट से जीवन झांकेगा,

शैथिल्य की तंद्रा टूटेगी,

सुप्त तम का क्षीण-क्षीण हो रहा अंत है…

लो दबे पाँव आ गया बसंत है |

नयनाभिराम, अनुपम ये दृश्य,

रति- मदन मगन कर रहे हों नृत्य,

देव वृष्टि कर रहे ज्यों पुष्य,

मधु-पर्व की रागिनी पर सृष्टि की लय- तरंग,

शीत के कपोल पर कल्लोल कर रहा बसंत है,

लो दबे पाँव आ गया बसंत है |

माँ झंकृत कर दो मन के तार,

अलंकृत हों उद्गार, विचार,

हे वीना- वादिनी! दे विद्या उपहार,

धनेश्वरी, वाक्येश्वरी माँ! प्रार्थना करबद्ध है…

लो दबे पाँव आ गया बसंत है |

लो दबे पाँव आ गया बसंत है ||

अब प्रस्तुत कर रहे हैं रूबी शोम द्वारा रचित ये अवधी गीत… आए गवा देखो वसन्त…
आय गवा देखो बसंत, पिया नहीं आए रे
देखो सखी मोर जिया, हाय घबराए रे -3
फूल गेंदवा से चोटी, मैंने सजाई रे,
देख देख दरपन मा खुद ही लजाई रे |
अंजन से आंख अपन आंज लिंहिं आज रे
पर मोर गुइयां देखो साजन अबहुं नहीं आए रे |
आय गवा देखो बसंत सखी पिया नहीं आए रे |
पियर पियर सारी और लाल च चटक ओढ़नी
पहिन मै द्वारे के ओट बार बार जाऊं रे |
आय गवा देखो बसंत पिया नहीं आए रे -3
पियर पियर बेर शिव जी को चढ़ाऊं रे
पूजा के बहाने अब तो पिया का पंथ निहारूं रे
आय गवा देखो बसंत पिया नहीं आए रे |
पांती लिख लिख भेज रही मै हृदय की ज्वाला जल रही
आ जाओ पिया फाग में रूबी तुमरी मचले रे |
आय गवा देखो बसंत पिया नहीं आए रे
देखो सखी मोर जिया हाय घबराए रे |
ये है नीरज सक्सेना की रचना… बसंत…
सखी आया वसंत सखी छाया वसंत
धरती से पतझड़ की सायें का अंत
बेलों में फूलों की खुशबू अनंत
सखी आया वसंत सखी छाया वसंत
रचा सरसों के खेतों में बासंती रंग
इठलाई अमुआ की डाली बौरों के संग
कोयलियां कि कुह कुह जगावें उमंग
सखी आया वसंत सखी छाया वसंत
बहे मंद मंद पवन लेके भीनी सुगंध
घटी सर्दी की चादर कुहासें का अंत
दिनकर की आभा से चमचम दिगंत
सखी आया वसंत सखी छाया वसंत
गूंजे भौरें की गुंजन मधुप चखें मरकंद
देख मौसम के रंग जुड़े प्रेम के प्रसंग
जगे आशा की किरणें जगे भाव जीवंत
सखी आया वसंत सखी छाया वसंत
बसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएं!

ये रचना श्री प्राणेन्द्र नाथ मिश्रा जी की है… आनन्द हो जीवन में…

नीरसता थी, नीरव था विश्व
हर ओर मौन छाया तब तक
मां सरस्वती की वीणा से
गूंजी झंकार नहीं जब तक |
अभिलाषा! ले आ राधातत्व
जीवन हो जाए कृष्ण भक्त,
शारदे की वीणा झंकृत हो
आलोक ज्ञान रस धरा सिक्त |
हो, कुसुम कली का कलरव हो
मन मारे हिलोरें दिशा दिशा
ढूंढती फिरे अमावस को
उत्सुक हो कर ज्योत्सना निशा |
झूमे पलाश, करे मंत्र पा
आहुति दे पवन, लिपट करके
नृत्यांगना बन कर वन देवी
नाचे पीपल से सिमट कर के |
यह पर्व है या यह उत्सव है
पावन मादकता है मन में
छूती वसंत की गलबहियां
कहतीं, आनंद हो जीवन में!

 

अब पढ़ते हैं नीरज सक्सेना जी की रचना… आया वसन्त…

सखी आया वसंत सखी छाया वसंत

धरती से पतझड़ की सायें का अंत

बेलों में फूलों की खुशबू अनंत

सखी आया वसंत सखी छाया वसंत

रचा सरसों के खेतों में बासंती रंग

इठलाई अमुआ की डाली बौरों के संग

कोयलियां कि कुह कुह जगावें उमंग

सखी आया वसंत सखी छाया वसंत

बहे मंद मंद पवन लेके भीनी सुगंध

घटी सर्दी की चादर कुहासें का अंत

दिनकर की आभा से चमचम दिगंत

सखी आया वसंत सखी छाया वसंत

गूंजे भौरें की गुंजन मधुप चखें मरकंद

देख मौसम के रंग जुड़े प्रेम के प्रसंग

जगे आशा की किरणें जगे भाव जीवंत

सखी आया वसंत सखी छाया वसंत

 

और अन्त में, डॉ रश्मि चौबे की रचना… देखो सखी, आया बसंत

यहाँ मौन निमंत्रण देता, देखो ,सखी आया बसंत !

धरती का यौवन देख सखी, फिर मुस्काया बसंत |

यहाँ मौन निमंत्रण देता, देखो, सखी आया बसंत |

वीणा वादिनी की धुन पर, कोकिला पंचम स्वर में गाती,

गुलाब सा चेहरा खिलाए, कोपलों से मेहंदी रचाती,

सरसों की ओढ़ चुनरिया, मलयगिरि संग चली है,

आम्र की डाल बौराई है, जैसे कंगना पहन चली है,

और स्वर्णिम रश्मियों से, नरमाई, कुछ शरमाई सी,

धरती का यौवन देख सखी, फिर मुस्काया बसंत |

हरियाली का लहंगा देखो, कितने रंगों से सजाया है,

पीली-पीली चोली देखो, गेंदों ने हार पहनाया है,

पाँव में छोटे फूल बिछे, जैसे कालीन बिछाया है,

देखो सब मदहोश हुए हैं, मदन ने तीर चलाया है,

आज वसुधा ने दुल्हन बन, बसंत से ब्याह रचाया है,

यहां मौन निमंत्रण देता, देखो फिर मुस्काया बसंत |

चलो सखी हम नृत्य करें, आओ यह त्योहार मनाते हैं,

मन सप्त स्वरों में गाता है, पग ठुमक- ठुमक अब जाता है,

राधा -श्याम की मुरली में, मेरा हृदय रम जाता है |

गुप्त नवरात्रों में माँ दुर्गे ने, योगियों के सहस्रार खिलाए है,

आ चल विवाह के मंडप में सखी, आत्मा को परमात्मा से मिलाएं |

संकलन – डॉ पूर्णिमा शर्मा…

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A tribute to Veteran Singer Lata Mangeshkar

from some of our Friends

अभी कल ही की तो बात है जब WOW India और साहित्य मुग्धा दर्पण द्वारा आयोजित वसन्तोत्सव में WOW India की अध्यक्ष डॉ लक्ष्मी ने लता जी का फिल्म “स्वप्न सुन्दरी” के लिया गाया कोयल के जैसा मधुर गीत “कुहू कुहू बोले कोयलिया” गाकर सुनाया था और हम सबने उनके शीघ्र स्वास्थ्य लाभ के लिए ईश्वर से प्रार्थना की थी… लेकिन ऐसा सम्भव न हो सका और लगभग एक महीने का जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष – और अन्त में विजय मृत्यु की हुई – जीवन हार गया – आज सुबह ही समाचार मिला कि लगभग एक महीने तक स्वास्थ्य लाभ के लिए संघर्ष कर रही स्वर कोकिला भारत रत्न लता मंगेशकर जी परम धाम को प्रस्थान कर गई हैं… वास्तव में सभी की आँखें नम हैं इस समाचार से… ऐसा लगता है जैसे भारत की आवाज़ ही कहीं गुम हो गई है… आजीवन स्वर की साधना में लीन रही लता मंगेशकर जी का निधन वास्तव में देश की कला और संस्कृति के लिए एक अपूरणीय क्षति है… किन्तु ये भी सत्य है कि ऐसी महान आत्माएँ कभी मरती नहीं… लता जी अपने स्वरों के माध्यम से सदा जीवित रहेंगी… नाम गुम जाएगा, चेहरा ये बदल जाएगा, मेरी आवाज़ ही पहचान है… ऐसे ही कला के साधकों के लिए लिखा गया है… वास्तव में समझ नहीं आ रहा कि माँ सरस्वती के प्रादुर्भाव के दूसरे दिन ही वाग्देवी की वरद पुत्री लता मंगेशकर जी के पार्थिव का पञ्चतत्व में विलीन हो जाना मात्र एक संयोग कहें या क्या कहें…? अश्रुपूरित नेत्रों से विदा देते हुए हमारे कुछ साथियों ने श्रद्धा सुमन समर्पित किये हैं दिवंगत आत्मा के प्रति…

सरस्वती विसर्जन वाले दिन ही आज की सरस्वती का निधन एक संयोग मात्र है या कोई ईश्वरीय तय घटना..🙏… सरिता रस्तोगी

 

Veteran Lata ji passed away on such an auspicious day of maà Saraswati s visarjan… RIP🙏🏻🙏🏻How symbolic… she was maà Saraswati ji herself…. सुनन्दा श्रीवास्तव

 

थम गई गीत की सुर सरिता

लय टूट गई, गति हुई मन्द

छन्दों  का मान करें अब क्या

हो गया बन्द हर पद्यबन्ध

माँ वाणी की वीणा निस्तब्ध

सूनी है गोद भारती की

कोकिला सदा के लिए सुप्त

कैसी आई ये ऋतु वसन्त

पर सदा प्रवाहित वह धारा

निःसृत जो कण्ठ से थी उसके

और सदा करेगा मान जगत

उस सरगम को जो हुई रुद्ध

माँ वाणी की मानस पुत्री कोकिलकण्ठी स्वर साम्राज्ञी भारत रत्न लता मंगेशकर जी को अश्रुपूर्ण भावभीनी श्रद्धांजलि…. डॉ पूर्णिमा शर्मा

 

माँ सरस्वती का पूजन कल, आज लता जी कर गई विकल।

स्वर कोकिला भी गईं निकल, श्रद्धा में नत हो खड़े सकल।

आँख में नीर भी भर लेना, वतन के लोगों ठहर लेना।

सुर साम्राज्ञी थी भर लेना, याद को उनकी लहर देना।

भारत रत्न वही पुरस्कार, शोभा उनसे मिलती अपार।

वो भी उनको रहता निहार, स्वर, गीत, ताल का कर विचार।

श्रद्धा से अर्पण करे फूल, सुर सागर की बनी मस्तूल।

संगीत के वन की शार्दूल, वो अमर गीत दे बनीं धूल।

करबद्ध हुए, दिल आहत है, शान्त ईश्वर करे, चाहत है।

दुख है पर नहीं मसाहत है, वो गीत बचे ये राहत है।

आँखों से बहा हर काजल है, सुर पर अब छाया बादल है।

शेखर दुख ये दावानल है, ये अश्रुपूर्ण श्रद्धा जल है।

डॉ हिमांशु शेखर, पुणे

 

लता ताई संगीत की पहचान थी

वह तो वाणी वीणा की प्राण थी

पीढ़ी दर पीढ़ी का मधुर गान थी

हर ह्रदय बसी स्वर लहरी तान थी

उनकी आवाज देश की पहचान थी

भोर की पहली किरण जिस स्वर से हमे जागती थी

दोपहर की धूप जिनकी तान से शीतलता बांट जाती थी

जिसके सतरंगी गीतों से सज के सांझ उतर आती थी

जिनकी मीठी लोरियों से अखियों में नींद पसर जाती थी

थकी देह जिनके गीतों को सुनके सुकून से सुस्ताती थी

थम गई मधुर आवाज जो हर मन उमंग जगाती थी

सर्द रातों में जिनके गीतों से गरमाहट सी आ जाती थी

रिमझिम बारिश को जो आवाज ख़ुशगवार बना जाती थी

वो प्यार का तराना वो माँ की लोरी के गीतों की थाती थी

वो देश को समर्पित वो भाई बहन के रिश्तों को जगाती थी

अर्चना आरती वो संदेशो के गीतों से मन मे उतर जाती थी

जिनकी स्वर लहरी बुझते रिश्तों मे भी उम्र बढ़ाती थी

जिनके गीत उम्र के आखरी पड़ाव को जवां बना जाती थी

थम गई वह आवाज जो हर उम्र उमंग जगाती थी

नीरज सक्सेना, ग़ाज़ियाबाद

 

शारदा विसर्जन का दिन है

संग चली गईं, सुर साम्राज्ञी,

चिन्मयी कोकिला कंठ दिव्य

मृणमयी माते की अनुरागी।

तुम कितना भी दूर रहो,

दीदी! न तुम्हें हम भूलेंगे

जब भी गूंजेंगे तुम्हारे स्वर

हम नमन तुम्हें कर छू लेंगे।

🙏भावभीनी श्रद्धांजलि🙏

पी एन मिश्रा, कोलकाता

 

अपूर्णीय क्षति, हमारे देश की कोकिला कंठी का जाना हृदय शोक से भर गया। अत्यंत दुखद ,उनकी कमी कोई नहीं पूरी कर पाएगा , परन्तु उनकी आवाज अजर,अमर रहेगी। ईश्वर उनकी आत्मा को श्री चरणों में स्थान दें।🙏

ॐ शांति 🙏नूतन शर्मा, दिल्ली

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Padmashree Harekala Hajabba

Gunjan Khandelwal
Gunjan Khandelwal

पद्मश्री हरेकला हजब्बा: अक्षरसंथ

इतिहास के पन्नों में न खो जाएँ – गुँजन खण्डेलवाल

सूती लुंगी व साधारण सी कमीज़ पहने, गले में गमछा डाले हजब्बा जब अपनी चप्पल उतारकर राष्ट्रपति कोविंद जी से अवॉर्ड लेने पहुंचे तो दर्शकों को कौतूहल और विस्मय हुआ | “सामने राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और कई बड़े बड़े लोग बैठे थे, मैं भला उनके सामने चप्पल कैसे पहन सकता हूं”, ऐसा विनम्रता की प्रतिमूर्ति हजब्बा का कहना था |

कर्नाटक के मंगलुरू के समीप न्यूपाडपु गांव के हजब्बा प्रतिदिन उधारी से संतरे लेकर बस डिपो पर बेचा करते थे | करीब 30 वर्ष पहले की एक छोटी सी घटना ने उनके मन पर गहरा प्रभाव डाला | एक विदेशी ने उनसे अंग्रेज़ी में संतरे का दाम पूछा, वे समझ नही पाए और चुप रह गए | अपने पढ़े लिखे नहीं होने की शर्मिंदगी को उन्होंने एक पॉजिटिव मिशन के रूप में लिया और अपने विद्यालय रहित गांव में स्कूल बनाने की ठान ली ताकि वे वहां के निर्धन बच्चों को शिक्षित कर सकें | अपनी स्वयं की बहुत मामूली बचत और अन्यों से सहयोग लेकर उन्होंने ये स्वप्न साकार किया | एक मस्जिद में छोटे बच्चो का पहला स्कूल बना जो आज बढ़ते बढ़ते बड़ा विद्यालय बन गया है |

Selling Oranges on the Street Harekala Hajabba
Selling Oranges on the Street Harekala Hajabba

हजब्बा के इस बिग ड्रीम को साकार करने में लोगों का बहुत सहयोग रहा | कृतज्ञता स्वरूप उनकी नाम पट्टिका स्कूल में लगवाई गई है | उन्हें अपने इस मिशन से संबंधित प्रत्येक घटना व व्यक्ति आज भी याद है | उनका एक कक्ष देश विदेश से प्राप्त अवार्डों से सज्जित है पर प्राप्त धनराशि वे स्कूल की ही मानते हैं |

शिक्षा का धर्म अन्य धर्मों से बड़ा है, संभवतः इसी लिए हर जाति के लोगों से उन्हें मदद मिली |

अल्जाइमर से ग्रस्त बीमार पत्नी, दो विवाह योग्य बेटियों और ‘पेड लेबरर’ बेटे के पिता हजब्बा प्रति दिन ये सब भूल कर स्वयं स्कूल के कक्ष खोलते हैं और भीतर जाने के पूर्व चप्पल उतरना नहीं भूलते और फिर निकल जाते हैं आज भी संतरे बेचने के काम पर, आंखों में अपने विद्यालय को कॉलेज बनता देखने का स्वप्न लिए जो कल साकार होगा |

स्वयं अशिक्षित होने पर भी, अन्यों को शिक्षित करने का हज्जबा का जज़्बा और विश्वास समाज सेवा के रूप में मिसाल बन गया है | इसी निश्चय और प्रयत्नों ने लोगों को उन्हें मदद देने को प्रेरित किया है |

“मैं तो अकेले ही चला था जानिब – ए मंज़िल मगर लोग साथ आते गए और कारवां बनता गया” | जय हिंद… गुँजन खण्डेलवाल